विरासत बनाम विपणन — परिमाण में वृद्धि, गुणवत्ता में गिरावट

डॉ मुकेश 'असीमित' Nov 4, 2025 आलोचना ,समीक्षा 0

“साहित्य के बाजार में आज सबसे सस्ता माल है ‘महानता’। पहले पहचान विचारों से होती थी, अब फॉलोअर्स और लॉन्च-इवेंट से होती है। व्यंग्य अब साधना नहीं, रणनीति बन गया है। व्यवस्था की आलोचना करने वाला अब उसी व्यवस्था का पीआर एजेंट बन बैठा है। असली लेखक कोने में खड़ा है, और मंच पर नकली लेखक चमक रहा है। विरासत अब शाल और शिलालेख में सिमट गई है — सवालों में नहीं। व्यंग्य की परंपरा विरोध में जन्म लेती है, करुणा में जीती है — और उसी करुणा को अब मार्केटिंग ने निगल लिया है।”

 गरमा-गरम फुल्के की तलाश

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 30, 2025 Blogs 0

मध्यमवर्गीय घरों में शादी अब दहेज या कुंडली से नहीं, फुल्का-कला से तय होती है। बब्बन चाचा का सपना था — एक ऐसी बहू जो गरमा-गरम फुल्के बनाए। पर आज की बहुएँ फुल्के नहीं, फॉलोअर्स सेंक रही हैं। जब इंस्टाग्राम ने रसोई संभाल ली, तो चूल्हा खुद ही बेरोज़गार हो गया।

दोस्ती की सीमा और फेसबुक का परिवार नियोजन कार्यक्रम

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 30, 2025 व्यंग रचनाएं 0

फेसबुक अब भावनाओं पर भी पाबंदी लगाने वाला पहला सोशल प्लेटफॉर्म बन गया है। पाँच हज़ार दोस्त पूरे होते ही दिल कहता है “Accept,” और सिस्टम कहता है “Limit Reached!” अब दोस्ती भी जनसंख्या नियंत्रण का शिकार हो गई है — और हम सब “Friends in Waiting” की सूची में खड़े हैं।

गालों की लाली- हो गई गाली

Ram Kumar Joshi Oct 20, 2025 संस्मरण 0

“कभी सूर्योदय से पहले नहीं उठने वाले अब मुंह-अंधेरे ‘हेलो हाय’ करते जॉगिंग पर हैं। ट्रैक सूट, डियोडरेंट और महिला ट्रेनर ने जैसे रिटायरमेंट में नई जवानी फूंक दी हो। पर पत्नी का वीटो जब लगा, तो प्रभात भ्रमण से सीधा ‘लिहाफ भ्रमण’ पर लौटे।”

जीनीयस जनरेशन की ‘लोल’ भाषा

Vivek Ranjan Shreevastav Oct 18, 2025 व्यंग रचनाएं 0

“जेन ज़ी की ‘लोल भाषा’ ने व्याकरण के सिंहासन को हिला दिया है। अब भाषा नहीं, भावना प्राथमिक है। अक्षरों का वजन घट रहा है, इमोजी विचार बन रहे हैं — यह सिर्फ बातचीत नहीं, एक सांस्कृतिक क्रांति है।”

जा तू धन को तरसे — एक व्यंग्यात्मक धनतेरस कथा

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 18, 2025 व्यंग रचनाएं 0

धनतेरस के शुभ अवसर पर जब जेबें खाली हैं और बाज़ार भरा पड़ा है, तब लेखक हंसी और व्यंग्य से पूछता है — “धनतेरस किसके लिए शुभ है?” यह रचना बताती है कि असली उल्लू कौन है — वह जो लक्ष्मी जी के साथ उड़ता है या वह जो उनकी प्रतीक्षा में खाली वॉलेट थामे बैठा है। हास्य, कटाक्ष और सटीक सामाजिक टिप्पणी से भरा व्यंग्य।

शुभ लाभ-फटूकड़ियां – 2025

Prahalad Shrimali Oct 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

दीपावली की यह व्यंग्यात्मक ‘फटूकड़ियां 2025’ केवल रोशनी का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र, राजनीति, न्याय और समाज की मानसिकता पर तीखा हास्य है। लेखक प्रह्लाद श्रीमाली ने पटाखों की जगह बयानों, दीपों, और विचारों को जलाकर एक ऐसी दीपमाला रची है जिसमें नागरिक विवेक, राजनैतिक धुआं और आत्मावलोकन की झिलमिलाहट सब एक साथ चमकते हैं।

काम वाली बाई — एक व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

पहले आदमी अपनी कुंडली देखकर तय करता था कि आज दिन कैसा रहेगा; अब बस यही देखता है — बाई आ रही है या नहीं! अगर नहीं आ रही तो समझ लीजिए — आज का दिन शुभ नहीं है। घर में बर्तन, झाड़ू और रिश्ते — सब एक साथ बजते हैं। गृहस्थी के इस धर्मयुद्ध में ‘काम वाली बाई’ ही असली दुर्गा है — जो झाड़ू को त्रिशूल और पोछे को शंख बनाकर कलह रूपी राक्षस का संहार करती है।”

पालतू कुत्ता — इंसान का आख़िरी विकास चरण

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 16, 2025 व्यंग रचनाएं 0

अब मनुष्य “सामाजिक प्राणी” से “पालतू प्राणी” में विकसित हो चुका है। पट्टा अब कुत्ते के गले में नहीं, बल्कि उसकी ईएमआई और सोशल मीडिया की आदतों में है। बच्चों से बचत कर, जिम्मेदारियों से बचकर जब जीवन में भावनात्मक खालीपन आता है — तो इंसान “टॉमी” पाल लेता है और धीरे-धीरे खुद ही कुत्तानुकरण काल में प्रवेश कर जाता है।

हम आपका लेख छापेंगे… किसी दिन

Wasim Alam Oct 14, 2025 व्यंग रचनाएं 2

लेखन भेजना आसान है, लेकिन उसके बाद की प्रतीक्षा ही असली ‘कहानी’ बन जाती है। संपादक का “यथासमय” जवाब लेखकों के जीवन का सबसे रहस्यमय शब्द है — न वह आता है, न जाता है, बस उम्मीदों के गोदाम में लटका रहता है। हर लेखक अपने मेलबॉक्स में “प्रकाशन” नहीं, बल्कि व्यंग्य ढूंढता है — क्योंकि लेख छपे या न छपे, व्यंग्य तो मन में खुद-ब-खुद छप ही जाता है।