टंकी का बयान : एक गिरावट की आत्मकथा
यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
यह टंकी सिर्फ़ कंक्रीट का ढाँचा नहीं थी, यह व्यवस्था का आईना थी। उद्घाटन से पहले गिरकर इसने बता दिया कि जब नीयत खोखली हो, तो सबसे मज़बूत ढांचा भी बैठ जाता है।
मरना तय था, यह हम मान चुके थे— पर किस तत्व से मरना है, यह विकल्प भी अस्पताल तय करेगा, यह हमें बताया नहीं गया। पहले आग, अब पानी… लगता है अस्पताल पंचतत्व को सीरियल-वाइज टेस्ट कर रहा है।
दुनिया की कूटनीति कभी-कभी इतनी जटिल नहीं होती, जितनी एक रूसे फूफा की नाराज़गी। एक फोन कॉल, थोड़ी तारीफ़ और ज़रा-सा अपनापन— न हो तो टैरिफ, ट्वीट और ताने वैश्विक स्तर पर चलने लगते हैं।
आज के समय में नाम समाधान नहीं, विकल्प बन गया है। जहाँ समस्याएँ हटाना कठिन हो, वहाँ नाम बदल देना सबसे आसान नीति है। यह व्यंग्य उसी नाम-प्रधान विकास दर्शन पर एक तीखा मुस्कुराता कटाक्ष है।
भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
इस देश में विकास कार्य अब सड़क, स्कूल और दरी से नहीं, सीधे प्रतिशत से तय होते हैं। विधायक विकास नहीं देखते, वे सिर्फ़ यह पूछते हैं—“हमें कितना प्रतिशत मिलेगा?” यह व्यंग्य लेख उसी आत्मविश्वासी भ्रष्टाचार का दस्तावेज़ है, जहाँ लोकतंत्र चार स्तंभों पर नहीं, चालीस प्रतिशत पर टिका है।
लोकतंत्र की गाड़ी पम-पम-पम करती आगे बढ़ रही है—टायरों में हवा नहीं, पर वादों की फुलावट है। ड्राइवर बूढ़ा है पर जीपीएस नया, जो सिर्फ उसी की सुनता है। जनता सीट बेल्ट बाँधकर सफ़र का आनंद ले रही है—मंज़िल का सपना है ‘2047 का भारत’। इंजन पुराने भाषणों से गरम है, और भोंपू झूठे वादों का गान गा रहा है।