चिट्ठी-पाती का ज़माना: जब काग़ज़ों में रिश्तों की खुशबू बसती थी
चिट्ठियों का वह दौर, जब नीली स्याही में रिश्तों की गर्माहट होती थी, डाकिए का इंतज़ार एक उत्सव होता था और एक काग़ज़ पूरे घर की खुशबू साथ ले आता था। आज की तेज़ डिजिटल दुनिया में आइए याद करें चिट्ठी-पाती के उसी आत्मीय ज़माने को।