डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 4, 2026
कहानी
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सड़क चौड़ी करने की सरकारी मुहिम में एक टीन की छोटी दुकान उजड़ जाती है। उसके साथ बिखर जाते हैं एक विधवा माँ के सपने, दो पढ़े-लिखे बेरोज़गार बेटों की उम्मीदें और वर्षों की मेहनत। यह व्यंग्य विकास के नाम पर होने वाले मानवीय विस्थापन की संवेदनशील पड़ताल है।
Dr Shailesh Shukla
Mar 29, 2026
India Story \बात अपने देश की
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भारत के शहरों में फुटपाथों का गायब होना सिर्फ अव्यवस्था नहीं, बल्कि शहरी नियोजन की विफलता और सामाजिक असमानता का प्रतीक बन चुका है।
Pradeep Audichya
Dec 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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चौराहे पर बैठा वह कोई साधारण जानवर नहीं था—वह डर, लापरवाही और व्यवस्था की मिली-जुली पैदाइश था। उसकी गुर्राहट में कानून की चुप्पी और उसके सींगों में सत्ता की स्वीकृति चमक रही थी।
Vivek Ranjan Shreevastav
Aug 16, 2025
व्यंग रचनाएं
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"शहर की गलियों में लोकतंत्र आवारा कुत्ते के रूप में बैठा है। अदालत आदेश देती है, नगर निगम ठेका निकालता है, मोहल्ला समिति बहस करती है और सोशल मीडिया पर नारे गूँजते हैं। असल समस्या कचरे, नसबंदी और जिम्मेदारी की है—पर हम शॉर्टकट और कॉन्ट्रैक्ट में उलझे रहते हैं।"