पायोजी मैंने ,सिलेंडर पायो ,!
वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।
वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।
सामाजिक विडंबनाओं पर करारा व्यंग्य करती ये कविता ‘वाह भाई वाह’ हमें उन विसंगतियों का एहसास कराती है जहाँ ज़िंदगी त्रासदी बन चुकी है, फिर भी आमजन तमाशबीन बना बैठा है। गड्ढों, महंगाई, रिश्तों की दूरी और शिक्षा की मार के बीच भी मुस्कुराता देश – ‘वाह भाई वाह’!