Dr Shailesh Shukla
Jun 23, 2026
समसामयिकी
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लोकतंत्र : संवैधानिक प्रावधान और वास्तविक व्यवहार में बड़ा अंतर डॉ. शैलेश शुक्ला लोकतंत्र को विश्व की सर्वाधिक जनोन्मुख और उत्तरदायी शासन व्यवस्था माना जाता है। इसकी मूलअवधारणा अत्यंत सरल और आकर्षक है—सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता होती है। जनता अपनेप्रतिनिधियों का चुनाव करती है, सरकार बनाती है और अंततः वही शासन की अंतिम स्वामिनी होती […]
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 11, 2026
Health And Hospitals
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“यह समस्या केवल चिकित्सा जगत तक सीमित नहीं है।
यह समाज, मनुष्य, राजनीति, पर्यावरण और नैतिकता—सबमें एक साथ फैली हुई बीमारी है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि हर जगह इलाज चल रहा है,
पर बीमारी ठीक नहीं हो रही—क्योंकि इलाज ही ग़लत है।”
आज की दुनिया में सबसे बड़ा संकट बीमारी का नहीं,
बल्कि बीमारी की पहचान का संकट है।
मन की बीमारियों के लिए मोटिवेशनल वीडियो,
पर्यावरण के लिए सम्मेलन,
राजनीति के लिए भावनात्मक नारे—
ये सब प्लेसीबो हैं।
जब नक़ली इलाज सामान्य हो जाता है,
तब असली मौतें सिर्फ़ आँकड़े बनकर रह जाती हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 10, 2026
समसामयिकी
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सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।