किसका विकास ,किसका विनाश

डॉ मुकेश 'असीमित' Jul 4, 2026 कहानी 0

सड़क चौड़ी करने की सरकारी मुहिम में एक टीन की छोटी दुकान उजड़ जाती है। उसके साथ बिखर जाते हैं एक विधवा माँ के सपने, दो पढ़े-लिखे बेरोज़गार बेटों की उम्मीदें और वर्षों की मेहनत। यह व्यंग्य विकास के नाम पर होने वाले मानवीय विस्थापन की संवेदनशील पड़ताल है।

“हम ही हैं राष्ट्र, हमसे ही है राष्ट्र”

Dr Shailesh Shukla May 15, 2026 व्यंग रचनाएं 1

“जनता भविष्य नहीं देख पाती, इसलिए जनता है; और हम भविष्य पहले देख लेते हैं, इसलिए अधिकारी हैं।” “व्यवस्था नहीं सड़ी… व्यवस्था तो बहुत फलदायी है।” “मैंने केवल अवसर लिए, नियमों को समझा और संबंध निभाए।” “जब ‘मैं ही राष्ट्र’ हूँ, तो राष्ट्र की संपत्ति और मेरी संपत्ति में अंतर कैसा?” “पहले जमीन अपने नाम कराओ, फिर विकास का इंतजार करो।”

फ़ाइलों में दबे चेहरे और खोती मानवीयता : भूमिपुत्र पवनघुवारा 

Pawan Ghumara Dec 29, 2025 Blogs 0

“बीच में है नौकरशाही — जो पुल नहीं, दीवार बन चुकी है।” “फ़ाइलों और कानूनों की दुनिया में ‘संवेदना’ को ‘अपवाद’ मान लिया गया है।” “लोकतंत्र का सौंदर्य उसकी करुणा में है, उसकी कठोरता में नहीं।”