Prem Chand Dwitiya
May 19, 2026
व्यंग रचनाएं
0
कॉकरोच बिरादरी पर सिस्टम पर हमले का आरोप लगते ही तिलचट्टों की आपात बैठक बुला ली गई। बैठक में वृद्ध, युवा, पर्यावरण प्रेमी और राजनीतिक चेतना से लैस कॉकरोचों ने मनुष्य जाति पर पलटवार किया। उनका सीधा सवाल था—हम तो किचन वेस्ट खाते हैं, जंगलों की तबाही झेलते हैं, मिट्टी को उर्वर बनाते हैं; असली निकृष्ट जीव कौन है?
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 8, 2026
व्यंग रचनाएं
0
शोक सभा में जाना भी एक सामाजिक परीक्षा है। बाब्बन चाचा इस परीक्षा में इतने अनुभवी हैं कि संवेदना व्यक्त करते-करते रिश्ता, पुट्टी और प्रॉपर्टी तक की चर्चा छेड़ देते हैं।
Prem Chand Dwitiya
Apr 8, 2026
व्यंग रचनाएं
1
रंग बदलने के पुराने उस्ताद गिरगिट भी आजकल इंसानों की रंगबाज़ी से हैरान हैं।
सुरक्षा के लिए रंग बदलने वाले जीव अब अपनी साख बचाने की बैठक कर रहे हैं।
व्यंग्य यह है कि बदनाम गिरगिट हैं, मगर रंग बदलने की असली महारत इंसानों ने हासिल कर ली है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Apr 4, 2026
व्यंग रचनाएं
0
बब्बन चाचा ने परदादा की संदूक में रखी मूँछें निकालकर इतिहास को चेहरे पर चिपका लिया। अब वे हर सुबह ‘इतिहास अलाप’ करते हैं और वर्तमान को ताले में बंद कर देते हैं—क्योंकि आजकल असली मेहनत से ज्यादा आसान है विरासत पहन लेना।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 30, 2026
व्यंग रचनाएं
0
नेताजी कर्मदास की राजनीति जनसेवा से नहीं, फीता-कटिंग से संचालित होती है। कैंची उनकी पहचान है और उद्घाटन उनका धर्म। लेकिन जब बाबा धर्मदास ने उनकी जगह ले ली, तो नेताजी के राजनीतिक अस्तित्व पर ही कैंची चल गई।
Prem Chand Dwitiya
Mar 29, 2026
व्यंग रचनाएं
1
वैश्विक युद्ध की चिंगारी जब चूल्हे तक पहुँची, तो गैस सिलेंडर अचानक ‘राम रतन धन’ बन गया—और आम आदमी लाइन, लाचारी और व्यंग्य के बीच झूलता रह गया।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 24, 2026
व्यंग रचनाएं
1
“भाइयो-बहनो, आज अगर हम रपट जाएँ… तो हमें न उठइयो।” लोकतंत्र के इस विचित्र महोत्सव में हर वर्ग अपनी-अपनी शैली में फिसल रहा है—कोई वादों पर, कोई सच्चाई पर, कोई सिद्धांत पर… और आम आदमी, वह तो रोज़ की आदत से फिसल ही रहा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 17, 2026
Blogs
0
“आपने प्रशासन को जगाया है न? अब भुगतो।
विकास की सुरसा अब खुले मुँह आपके नथुनों तक पहुँच चुकी है।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 16, 2026
व्यंग रचनाएं
0
फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 9, 2026
व्यंग रचनाएं
0
पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।