खाओ और खाने दो-पापी पेट का सवाल

खाओ और खाने दो-पापी पेट का सवाल

पापी पेट का सवाल है जी। पापी पेट को क्या चाहिए? खाना। देखिए, भरे पेट की समस्याएँ अनंत होती हैं, पर खाली पेट की केवल एक ही समस्या होती है—उसे खाना चाहिए। सरकार भी इसीलिए गरीब का पेट खाली रखती है, ताकि वह सिर्फ खाने की माँग करे, और कुछ न पूछे। पेट भरा हो जाए तो जनता दस चीज़ों पर ध्यान देने लगती है—सरकार की नीति-अनीति, उठा-पटक, भ्रष्टाचार—सब समस्या बन जाते हैं।

मेरे पड़ोस के बब्बन चाचा को ही ले लीजिए। वे खाली पेट के साथ ही पैदा हुए थे—यह पेट का सवाल है। खाली पेट पापी हो जाता है, और पापमुक्ति के लिए खाना ज़रूरी हो जाता है। सरकार भी तभी खिलाएगी, जब उसे खुद खाना हो। इसलिए वह जनता को थोड़ा-थोड़ा दाना चुगाने देती है। इसी से रेबड़ीवाद का जन्म हुआ—तात्कालिक  पेट भरने के लिए। इतना कि पेट बस इतना भर जाए कि आदमी वोट डाल आए।

बब्बन चाचा का पेट प्रगति पर है। देश आगे निकला या नहीं—यह आप बब्बन चाचा के पेट से जान सकते हैं। मेरे घर में भी उनका पेट पहले पहुँचता है, बब्बन चाचा बाद में। भरा पेट दरअसल पेट-भ्रम होता है। पेट का संबंध आत्मा से है, और आत्मा कभी तृप्त नहीं होती।

चाचा अक्सर जपते रहते हैं—“मुफ़्त का खाना चाहे पराया हो, पेट तो अपना है। अपने-पराए का भेद मिटाने के लिए मुफ़्त का खाना ठूँसना पड़ता है।” अब इस वाक्य में जो दार्शनिक गहराई है, वह उपनिषदों में नहीं मिलेगी। उसे आप बब्बन चाचा जैसे लोगों की उस लालसा-भरी नज़र में समझ सकते हैं, जो बुफ़े काउंटर के सामने लाइन में खड़े होकर प्लेट का भविष्य तय कर रही होती है।

भूख कोई निजी भावना नहीं, यह एक सार्वजनिक आंदोलन है। जहाँ खाना दिखा, वहाँ चाचा सरीखे लोग पहुँच ही जाएँगे—चाहे वह शादी हो, श्रद्धांजलि सभा हो, उद्घाटन समारोह हो या किसी नेता का “जन-संवाद”। चाचा कहते हैं—“कार्यक्रम का विषय कुछ भी हो सकता है, छुपे एजेंडे कुछ भी हों, पेट का एजेंडा एक ही होता है।” सच पूछिए तो पेट कभी विपक्ष में नहीं बैठता, वह हमेशा सत्ता में रहता है। वह निर्विकल्प है—खाने के अलावा उसके पास कोई दूसरा विकल्प नहीं। नारे और घोषणाएँ मन की भूख मिटा सकती हैं, पेट की नहीं।

चाचा को मुफ़्त खाने से कोई वैचारिक आपत्ति नहीं। पेट भी तो सरकार ही है—और सरकार का अधिकार है टैक्स वसूली। पेट की सत्ता बनी रहे, इसलिए चाचा समझाते हैं—“हम दूसरों के हक़ का भी खा लेते हैं, अगर वह प्लेट में आ जाए।” यह कहकर वे इत्मीनान से बगल वाली प्लेट में झाँकते हैं, जैसे कोई समाजशास्त्री समता का सर्वे कर रहा हो। सभी प्लेटों को एक-समान देखना लोकतांत्रिक चेतना का द्योतक है।

पेट का पापी होना एक सैद्धांतिक मजबूरी है। यह भरे पेट के साथ होता है। खाली पेट पापी नहीं होता—उसे तो बस एक अदद खाना चाहिए। लेकिन पेट भरते ही आदमी नाक चढ़ाने लगता है, तन तनाने ,गरियाने ,गलियाने ,लतियाने  लगता है। तब उसे दस अनैतिक काम सूझते हैं—मर्यादा, प्रतिष्ठा और न जाने कितने खटकर्म।

“खाओ और खाने दो” दरअसल सामाजिक सौहार्द का सूत्र है। जब सब खा रहे हों, तब कोई किसी से नहीं पूछता—तुम कौन हो, कहाँ से आए हो, किस विचारधारा के हो। प्लेट के सामने सब बराबर होते हैं। जब सब खा रहे होते हैं, तो कोई किसी के खाने पर सवाल नहीं करता।

एक बार किसी ने बब्बन चाचा से पूछ लिया—“चाचा, इतना खाते हो, सेहत का ध्यान नहीं रखते?” चाचा हँसे—वह हँसी नहीं, पेट की गूँज थी। बोले—“सेहत का ध्यान रखने के लिए ही तो खाते हैं। भूखे पेट भजन नहीं होते। भगवान को भजन करवाना होगा तो भोजन भेज ही देगा—निश्चिंत है बब्बन चाचा।”

खाना स्मृतियाँ देता है। कई रूठे फूफाओं का हथियार है खाना—मीन-मेख निकालने का साधन। कई फूफा सिर्फ इसलिए नाराज़ हैं कि पकौड़ियों में नमक कम था या खीर में चीनी। ये स्मृतियाँ फूफाओं की अस्मिता और उनके अस्तित्व को शाश्वत बनाती हैं—किस उद्घाटन में समोसे थे, किस सम्मान समारोह में रसगुल्ले, और किस शोकसभा में लड्डू। चाचा कहते हैं—“भावनाएँ क्षणिक होती हैं, स्वाद स्थायी।”

उनका दर्शन सीधा है—जो मिले, खाओ। जितना मिले, खाओ। और अगर ज़्यादा मिल जाए, तो दूसरों को देखने दो कि तुम खा रहे हो। असली सुख खाने में नहीं, दूसरों के सामने खाने में है। पेट तो भर ही जाता है, अहंकार भी तृप्त हो जाता है।

देखिए, दुनिया बहुत स्वार्थी है। कोई किसी को यूँ ही कुछ नहीं देता। ‘फ्री लंच’ जैसा कुछ नहीं होता जी। कोई मुफ़्त का खाना दे रहा है, तो बदले में कुछ न कुछ ले ही रहा होगा—मुफ़्त का टिकट, मोक्ष का प्रवेश-पत्र या दिल्ली की सत्ता का। अगर कोई दे रहा है, तो उसका अपमान मत कीजिए—खा लीजिए। पापी पेट का सवाल है।

और सच कहूँ, बब्बन चाचा गलत भी नहीं हैं। इस देश में विचार पालने से ज़्यादा ज़रूरी है पेट पालना। इसलिए खाइए…और खाने दीजिए। बाकी सब बाद में देखा जाएगा—खाने के बाद।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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