डॉ मुकेश 'असीमित'
May 30, 2026
व्यंग रचनाएं
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क्या होगा जब रिश्वत भी UPI, EMI और क्रेडिट स्कोर पर मिलने लगे? प्रस्तुत है एक तीखा हास्य-व्यंग्य, जिसमें भ्रष्टाचार 2.0, BribeSync, रिश्वत क्रेडिट स्कोर और डिजिटल घूस की कल्पना के माध्यम से व्यवस्था की विडंबनाओं पर करारा कटाक्ष किया गया है।
Ram Kumar Joshi
Nov 23, 2025
व्यंग रचनाएं
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सरकारी अस्पताल से बाहर निकलता छेदी लाल सिर्फ़ दवा की कमी से नहीं, टूटी परंपराओं और बदलती नीतियों से भी परेशान है। संधाणा के दिनों से लेकर आरजीएचएस की च्यवनप्राश छूट तक, और अब आयुर्वेदिक दवाओं के कटते नामों से लेकर एलोपैथिक सूची के फैलते आकार तक—उसकी शिकायत में जनता का असली दर्द झलकता है। व्यंग्य का सीधा सवाल यही है कि जब “स्वदेशी” के नाम पर वोट माँगे गए थे, तो देसी दवाओं का गला किस टेबल पर घोंटा जा रहा है?
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 22, 2025
आलोचना ,समीक्षा
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पश्चिमी साहित्य में ऑस्टेन, स्विफ्ट, ऑरवेल और हक्सले जिस तीक्ष्ण हास्य से समाज और सत्ता की विसंगतियों को खोलते हैं, वहीं हिंदी में परसाई, शरद जोशी और चतुर्वेदी उसी परंपरा को देसी अंदाज़ में आगे बढ़ाते हैं। व्यंग्य भाषा नहीं देखता—वह मनुष्य की आदतों, पाखंड, लालच, दिखावे और सामाजिक मूर्खताओं पर चोट करता है। यही कारण है कि व्यंग्य वैश्विक भी है और गहरे स्थानीय भी।