Prem Chand Dwitiya
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
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पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
May 18, 2024
व्यंग रचनाएं
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इस व्यंग्यात्मक रचना में आधुनिक समय में नामकरण की प्रक्रिया के व्यापारीकरण पर कटाक्ष किया गया है। यहाँ बताया गया है कि कैसे परंपरागत रीति-रिवाजों का स्थान अब न्यूमेरोलॉजी और ऑनलाइन प्लेटफार्मों ने ले लिया है, जहाँ नाम न केवल एक शब्द बल्कि एक ब्रांड बन गया है। लेखक ने विडंबना दिखाई है कि किस तरह से लोग अपने नाम में अक्षर जोड़ या घटाकर खुद को अधिक भाग्यशाली समझने लगे हैं। यहाँ यह भी व्यक्त किया गया है कि पहले नामकरण एक साधारण और संवेदनशील प्रक्रिया हुआ करती थी, जिसमें धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता था, पर अब यह केवल व्यावसायिक और सतही रीति बन चुकी है। इस प्रक्रिया के जरिये, व्यंग्यकार ने हमारी आधुनिक सामाजिक संरचनाओं पर गहरी टिप्पणी की है, जिसमें नाम के पीछे की असली पहचान और महत्व को भुला दिया गया है।