डॉ मुकेश 'असीमित'
Jun 29, 2026
व्यंग रचनाएं
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बजट आया, बसंत आया, सत्ता ने इसे बहार कहा, विपक्ष ने पतझड़ और आम आदमी ने अपनी खाली थाली देखी। इसी बीच राष्ट्रपति भवन में दिवंगत कवियों का काल्पनिक महासम्मेलन सजता है, जहाँ हर कवि अपने अंदाज़ में बजट का हिसाब पूछता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Aug 6, 2025
व्यंग रचनाएं
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बजट और बसंत का यह राग अब प्रकृति से नहीं, सत्ता की चौंखट से संचालित होता है। सत्ता पक्ष ढोल-ताशे के साथ लोकतंत्र के मंडप में राग बजट-भरतार गा रहा है, जबकि आम आदमी खाली थाली में चटनी की एक बूंद देखकर संतोष कर रहा है। गरीब अपने मरसिये में बजट को मज़ाक बता रहा है — एक सड़ा हुआ राग, जिसे हर साल दोहराया जाता है।