संसदीय गलियारों में दिवंगत कवियों का महासम्मेलन-विषय बजट और बसंत:
बसंत आ गया है, और बजट भी! सत्ता पक्ष इसे स्वर्णिम वसंत कह रहा है, विपक्ष इसे आर्थिक पतझड़ बता रहा है, मध्यम वर्ग अहो अहो..वसूली ताई की रहमो करम रही ,इस बार कम निचोड़ा गया.. , और गरीब बेचारा सोच रहा है कि ये ‘बजट’ नामक परिंदा हर बार उसके हिस्से का दाना लेकर उड़ क्यों जाता है?
सत्ता पक्ष के लिए बजट हमेशा वसंत की बहार लाता है। जैसे कोयल बासंती आगमन पर आत्म मुग्ध होकर अपने ही मीठे स्वर में मगन रहती है, वैसे ही सत्ता पक्ष के नेता,उपनेता, लन्गेटा सभी बजट को लेकर राग दरबारी गायन शुरू कर दिए है ।
इस बार बजट की घोषनोपरांत एक अनोखी बात हुई..महामहिम राष्ट्रपति जी द्वारा शाम को राष्ट्रपति भवन में सभी राजनीतिक दल के सांसदों के लिए एक महा भोज का आयोजन हुआ
इस महाभोज में एक अनोखा काव्य सम्मेलन आयोजित हुआ है। आयोजन विशेष है, क्योंकि इसमें शामिल होने के लिए कवियों को ‘स्वर्गीय’ होना अनिवार्य था! मरणोपरांत साहित्यिक सम्मान का इससे बढ़िया तरीका भला और क्या हो सकता था? इस सम्मेलन की थीम थी “बजट और बसंत”—और हर कवि को अपनी विशिष्ट शैली में चार पंक्तियाँ कहनी थी । आइए, सुनते हैं लाइव कोवेरेज वहीँ से ..
संत कबीर
“बजट बगिया अमीर की, सबही सुख समाय,
कोयल ठण्ड में ठिठुर रही , कौवा गीत सुनाय ।”
“बजट देख सब हर्षित भये, नेता अफसर अमीर ,
निर्धन रोवत धुप में, कोऊ नहीं जाने पीर ।”
“बजट आयो, बसंत भी आयो, छाए रंग हजार,
पर निर्धन के आँगन में, भूख का वही संहार।”
कबीर जी है जी मजाक है क्या- जो घर फूंके आपनो, चले हमारे साथ…जो भी बोलेंगे कडुवा ही बोलेंगे ….
गोस्वामी तुलसीदास
“सुनु हो राजन! कहौं मैं बाता,
बजट बसंत अमीरी गाता।
निर्धन रोवत, करै पुकारा,
कब होइ है दिन मोर उजारा?”
सूरदास
“नटवर नागर नाचे अंगना,
बजट बनि आयो सोनहिं चंगना।”
“कहत सुरदास गरीब को गच्चा ,
सपना बड़ो पर होय न सच्चा।”
“आयो बसंत बगियन फूले,
धनि-धनि घर रस बरसे झूले।”
“हम ज्यों करील खड़े मुरझाए,
बजट बसंत न हमरे आए।”
रामधारी सिंह ‘दिनकर‘
“है बसंत या ज्वालामुखी, यह प्रश्न बड़ा विकराल,
रोटी-दाल को मोहताज है, फिर भी महंगा हर माल।”
“समर शेष है, नहीं दोषी बस सत्ता के साज,
जो मौन हैं, बजट के दावों पर, लिखेगा समय इतिहास।
जो जब बसंत और पतझड़ को, इक जैसा मान रहे,
वे नीति नहीं, केवल छल का महिमा गान रहे।”
सुमित्रानंदन पंत
“ “कोषागार में छिपा बसंत,
महलों में बिखरी मधु गंध,
विप्र, कृषक, श्रमिक हैं सूने,
बजट बसंत या निर्मम द्वंद!”
सुभद्रा कुमारी चौहान
“खिल गए अमीरों के उपवन, गरीबों के टूटे सपने,
यह कैसी नीति बनाई रे, बसंत बने क्यों अपने?”
(वीर रस की कवयित्री यहाँ भी गरीबों के पक्ष में तलवार भांज रही हैं।)
गोपालदास ‘नीरज‘
“गुलों की महक है उन्हीं के लिए,
जिनके गुले महफिल शबाब हैं।”
“हमारे लिए तो बजट का बसंत,
बस बिखरे हुए कुछ ख्वाब हैं!”
काका हाथरसी
बजट वंदना करूँ , हाथ जोड़ मनाय।
हर साल नई चाल से, जनता को भरमाय॥
जनता को भरमाय, शब्दों के खुले पिटारे ।
“जनता को दिख जाये दिन में ही तारे ।।
जानता भरे टैक्स, बजट रचे दलाली।
फटे लिथड़े और झाँकें खाली थाली॥“
कह काका कविराय बजट उनको ही भाये ।
जो मोटी तनख्वाह और मलाई खाएँ॥
अज्ञेय (सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन)
“बजट की थाली में रखा अन्न,
किसके हिस्से में आएगा?
वो जिनके हाथों में सत्ता है,
या वो जो दो रोटी को तरसता है?”
(अज्ञेय जी के दर्शन और बजट का यथार्थवाद यहाँ मिलकर नए प्रश्न खड़े कर रहे हैं।)
गजानन माधव मुक्तिबोध
“यह बजट नहीं, एक परछाईं है,
धन की, सत्ता की, बाजार की।”
“गरीब का जीवन कोई न पूछे,
बस बहसें हैं आंकड़ों की!”
(मुक्तिबोध अपने खास अंदाज में बता गए कि बजट गरीब के लिए कोई राहत नहीं, बस एक परछाईं है।)
धर्मवीर भारती
“अंधायुग में फिर घिर गया आम आदमी,
बजट का रथ, कर्ण को नहीं मिला कभी।”
(धर्मवीर भारती महाभारत के दृष्टांत में बता गए कि यह बजट ‘अंधायुग’ से कम नहीं!)
आखिरकार कवि सम्मेलन के समापन की घोषणा हुई..
सांसदों ने अपनी-अपनी कुर्सियों से चिपके हुए ज़ोरदार तालियाँ बजाईं। कवि सम्मेलन का असली समापन महाभोज के साथ संपन्न हुआ। कवियों को सम्मानस्वरूप तालियों से नवाज़ा गया, साथ ही लिफ़ाफ़े भी भेंट किए गए।
लेकिन… लिफ़ाफ़ों में रखा बजट कवि सम्मेलन की व्यवस्थाओं के पेटे समा गया। अगली बार ‘भरे हुए लिफ़ाफ़ों’ के वायदे को निभाने के लिए अगले बजट में विशेष प्रावधान करने का प्रस्ताव पारित हुआ।
कवि भी प्रसन्न थे, व्यवस्थापक भी संतुष्ट, और आयोजक तो पहले से ही निहाल थे! 🚀🎤👏
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