डॉ मुकेश 'असीमित'
May 29, 2026
व्यंग रचनाएं
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आज के समय में सिर्फ बात करना काफी नहीं है, बात में वज़न भी होना चाहिए। राजनीति से लेकर मीडिया, ज्योतिष, अर्थव्यवस्था और चिकित्सा जगत तक हर जगह "भारी" शब्द का बोलबाला है। डॉ. मुकेश असीमित का यह व्यंग्य उसी मानसिकता पर चुटीला कटाक्ष है, जहाँ हल्की बातों की कोई कीमत नहीं और हर चीज़ को खबर बनने के लिए भारी होना ज़रूरी है।
Dr Shailesh Shukla
May 22, 2026
शोध लेख/विमर्श
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लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति सत्ता से प्रश्न पूछने की स्वतंत्रता में निहित होती है। यह लेख अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, प्रेस की स्वायत्तता, मीडिया की जिम्मेदारी और लोकतांत्रिक मूल्यों पर गहन चिंतन प्रस्तुत करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 24, 2026
व्यंग रचनाएं
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“भाइयो-बहनो, आज अगर हम रपट जाएँ… तो हमें न उठइयो।” लोकतंत्र के इस विचित्र महोत्सव में हर वर्ग अपनी-अपनी शैली में फिसल रहा है—कोई वादों पर, कोई सच्चाई पर, कोई सिद्धांत पर… और आम आदमी, वह तो रोज़ की आदत से फिसल ही रहा है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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मुद्दा कोई साधारण प्राणी नहीं — यह राजनीति की चुहिया है, जिसे वक्त आने पर पिंजरे से निकालकर भीड़ में छोड़ दिया जाता है। झूठे वायदों की हवा और घोषणाओं के पानी से यह फूली-फली जाती है, और फिर चुनाव आते ही इसका खेल शुरू होता है। नेता डुगडुगी बजाते हैं, जनता तालियाँ पीटती है — और “मुद्दा” लोकतंत्र का मुख्य पात्र बनकर सबका मनोरंजन करता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 14, 2025
शोध लेख/विमर्श
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हिंदी का भविष्य केवल भावनाओं से तय नहीं होगा, बल्कि छह खानों में इसकी ताक़त और चुनौतियाँ दिखती हैं—संस्कृति, व्यापार, न्याय, शिक्षा, मीडिया और सद्भाव। बोलचाल और मनोरंजन में हिंदी मज़बूत है, पर न्याय-व्यवस्था और उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी का प्रभुत्व चुनौती बना हुआ है। समाधान है मातृभाषा-आधारित शिक्षा, द्विभाषिक पुल, देवनागरी-प्रथम मानक और अंतरभाषिक सम्मान। हिंदी तभी लोकतांत्रिक धड़कन बनेगी जब आत्म-सम्मान और समावेशन साथ चलेंगे।