बात में वज़न होना चाहिए
देखिए, बात करने से ही बात बनती है, लेकिन शर्त बस इतनी है कि बात “वज़नी” होनी चाहिए। अब बिना वज़न की बात और बिना वज़न की सरकारी फ़ाइल — दोनों का हाल लगभग एक जैसा होता है। दोनों हवा में उड़ती रहती हैं और किसी को गंभीरता से लेने का मन नहीं करता।
बात कहने से पहले भी सोचना पड़ता है कि यह साधारण बात है या “भारी बात” है। वरना बातें तो हर कोई करता है। किसी को यह कहते देर नहीं लगेगी— “क्या यार! कर दी न हल्की बात!”
अब देखिए, बात अगर वज़नी हो तो झूठ भी म्यान पहनकर सच का किरदार निभाने लगता है। आपके हालात चाहे कंगाली में आलू-पकोड़े तलने जैसे हों, लेकिन यदि आपने बाज़ार में यह बात फैला दी कि — “हम एक स्टार्टअप के सीईओ हैं, जो गोलगप्पों की डिजिटल डिलीवरी कर रहे हैं” — तो लोग भी प्रभावित होकर पूछने लगेंगे, “बाप रे! अब यह बताइए कि फंडिंग कब मिलने वाली है?”
हालात चाहे लस्त-पस्त हों, मगर यदि आपने बाज़ार में अपनी “बात” चला रखी है तो लाखों-करोड़ों की कमाई, घोटाले और घपले — सब कुछ संभव है। आप बैंकों से करोड़ों का लोन उठा सकते हैं और फिर इस देश से फुर्र भी हो सकते हैं।
आजकल “मन की बात” भी वही मानी जाती है जिसमें जनता को भारी-भरकम बातों से लुभाया जाए। आखिर “भारी बात” ही तो भारी बहुमत की नींव होती है।
अब देखिए न—
अगर कोई प्राकृतिक आपदा आ जाए तो वह जब तक “भारी” नहीं होगी, टीवी न्यूज़ और अख़बार वाले उसे गिनते ही नहीं। ब्रेकिंग न्यूज़ बनने के लिए ज़रूरी है कि जो भी हो, भारी हो। मसलन बाढ़ हो तो भारी बाढ़, सूखा हो तो भारी सूखा, मानसून हो तो भारी मानसून, गर्मी हो तो भीषण और भारी गर्मी, बमबारी हो तो भारी बमबारी। यहाँ तक कि भीड़ भी तभी खबर बनती है जब वह “भारी भीड़” हो। हल्की भीड़-भाड़ से किसी का क्या लेना-देना?
सरकार भी इस “भारी भीड़” के लिए भारी-भरकम इंतज़ाम करती है ताकि यदि कहीं भगदड़ मचे तो वह भी “भारी किस्म” की ही मानी जाए।
मौसम विभाग भी मौसम की सूचना तब ही देता हुआ प्रभावशाली लगता है जब कुछ “भारी” घटित होने वाला हो। पहले मौसम विभाग की सूचना आती थी — “जहाँ-जहाँ बादल छाए हैं, वहाँ हल्की गरज के साथ छींटे पड़ेंगे।” यही कारण था कि लोग मौसम विभाग की भविष्यवाणियों को भी हल्के में लेते थे।
राजनीति में भी “भारी” का बोलबाला है।
यहाँ तक कि यदि नेता “भारी बहुमत” से न जीतें तो उनकी जीत को टीवी पर विशेष कवरेज भी नहीं मिलता। और यदि हारें भी तो “भारी मतों” से हारना आवश्यक है। मामूली हार में न ग्लैमर है, न विश्लेषण।
ज्योतिषी भी कहता है — “आप पर भारी ग्रह चल रहे हैं।”
वह बड़े आत्मविश्वास से बताता है — “इस समय शनि भारी हैं, राहु भारी हैं, मंगल भारी हैं…”
जब तक वह ग्रहों की दशा भारी नहीं बताएगा, उसकी भारी-भरकम फीस कौन अदा करेगा भला?
रामायण में भी बात “भारी” ही होती थी।
सीता माता ने हनुमान जी को संदेश भेजा था। उसमें भी “भारी” शब्द का प्रयोग करना नहीं भूलीं, ताकि संदेश में पर्याप्त वज़न बना रहे—
“संकट भारी आन पड़ा है, अब तो दया करें दीननाथ।”
हम रोज़ ही तो सुनते और पढ़ते हैं—
“दीनदयाल विरद सम्भारी,
हरहु नाथ मम संकट भारी।”
सरकार भी इस “भारी” शब्द से विशेष प्रेम करती है।
मान लीजिए पेट्रोल 20 रुपये महँगा हुआ और फिर सरकार 5 रुपये घटा दे। बस अगले ही क्षण ब्रेकिंग न्यूज़ चलने लगती है—
“सरकार ने पेट्रोल के दाम में भारी राहत दी।”
हर तरफ “भारी” शब्द की महिमा फैली हुई है।
निवेश भारी है, सेंसेक्स में जो कुछ होता है वह भी भारी ही होता है। गिरावट भी भारी, तेजी भी भारी। लगता है अख़बारों के ऑफ़सेट प्रेस पर “भारी” शब्द स्थायी रूप से चिपका दिया गया है। बस उसके आगे विषय बदलते रहते हैं।
बच्चों के कंधों पर भारी बस्ता है, कॉलेजों में भारी फीस है और नौकरी में भारी प्रतिस्पर्धा।
हम भी भरी हुई ओपीडी में भारी पेशोपेश में पड़ जाते हैं। जब तक मरीज को जाँच में कोई “भारी बीमारी” न बताई जाए, उसका मन कुछ भारी-सा हो जाता है।
वह शिकायत भरे स्वर में कहता है—
“क्या यार डॉक्टर साहब! दस हज़ार की जाँच करवाई और बीमारी कुछ निकली ही नहीं। बोले हल्का-सा ज़ुकाम है!”
अरे भाई! इतनी भारी जाँच में कोई भारी-भरकम बीमारी निकलनी चाहिए कि नहीं?
भारत देश आजकल ‘भारी’ बातों से भरा पड़ा है।
इसलिए अगली बार जब कोई बात कहें तो ध्यान रखिए—
बात सिर्फ़ कहनी नहीं है…
उसे “भारी” भी बनाना है।
क्योंकि इस देश में हल्की बातों का वज़न अब कोई तौलता ही नहीं।
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