Vivek Ranjan Shreevastav
Jan 30, 2026
Book Review
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यह पुस्तक भारत के उस आदिवासी राबिनहुड की कथा है, जिसने जंगलों से निकलकर अंग्रेजी सत्ता और जमींदारी शोषण को खुली चुनौती दी।
टंट्या मामा केवल योद्धा नहीं, बल्कि आध्यात्मिक मार्गदर्शक और दूरदर्शी जननायक थे, जिनका जीवन जल-जंगल-जमीन के संघर्ष को समर्पित रहा।
उपन्यास आदिवासी समुदाय की सामूहिक चेतना, साहस और न्यायप्रियता को सरल, रोचक और प्रभावशाली भाषा में प्रस्तुत करता है।
Vivek Ranjan Shreevastav
Dec 19, 2025
व्यंग रचनाएं
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जब साहित्य अकादमी में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बिना प्रेस और बिना कॉन्फ़्रेंस के खत्म हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति बोल रही है—और व्यंग्य चुप नहीं रह सकता।
Vivek Ranjan Shreevastav
Sep 27, 2025
हिंदी लेख
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लोकतंत्र का आधार जनता का शासन है, परंतु जब जनसंख्या की संरचना बदलती है तो लोकतंत्र का संतुलन डगमगाने लगता है। भारत जैसे विविध देश में यह चुनौती और गहरी है। यदि किसी समुदाय की संख्या अत्यधिक बढ़े और अन्य हाशिये पर जाएँ, तो लोकतंत्र बहुमत का खेल बन जाता है। सच्चा लोकतंत्र तब ही सम्भव है जब अवसर, संसाधन और प्रतिनिधित्व में संतुलन कायम रहे।
Vivek Ranjan Shreevastav
Jul 5, 2025
व्यंग रचनाएं
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आज की डिजिटल दुनिया में अधजल गगरी का छलकना नए ट्रेंड का प्रतीक बन गया है। सोशल मीडिया पर ज्ञान कम और आत्मविश्वास ज़्यादा दिखाई देता है। व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी, ट्विटर वॉरियर्स और इंस्टाग्राम फिलॉसफर — सभी अधूरे ज्ञान से ज़ोरदार शोर करते हैं, जबकि असल ज्ञानी मौन रहते हैं।