वस्तु और विषय : बंधन और मुक्ति के बीच का सूक्ष्म अंतर

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 7, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

मनुष्य की चेतना वस्तुओं को केवल वस्तु की तरह नहीं देखती, वह उनसे इच्छा, आसक्ति और पहचान जोड़ देती है। यही वस्तु को विषय बना देता है और यहीं से बंधन की शुरुआत होती है। वस्तु और विषय के इस सूक्ष्म अंतर को समझना ही मुक्ति की दिशा में पहला कदम है।

अयोध्या और लंका के बीच मनुष्य का धर्म

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 26, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

अयोध्या हमारी पहचान है, लंका हमारी उपलब्धि। धर्म इन दोनों के पार है—जहाँ साहस और विवेक मिलते हैं। रामत्व अधिकार से बड़ा है, और सत्ता से मुक्त होने का नाम है।

होड़ से परे फकीरी में ठहरा मन

Dr Shailesh Shukla Feb 11, 2026 हिंदी कविता 1

यह कविता आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ से उपजी थकान, आंतरिक रिक्तता और आत्मचिंतन की आवश्यकता को कोमल लेकिन गहरे दार्शनिक स्वर में व्यक्त करती है। यश, धन और शक्ति की आकांक्षाओं से मुक्त होकर शांति, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक सौभाग्य बताया गया है। मीरा, राम और वैराग्य के प्रतीकों के माध्यम से यह रचना विकास और शांति के संतुलन पर प्रश्न उठाती है और पाठक को ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है।

ज़िंदगी: एक बोझिल कहानी या खुलता हुआ बैग?

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 6, 2026 Darshan Shastra Philosophy 3

ज़िंदगी घटनाओं की नहीं, व्याख्याओं की शृंखला है। हर इंसान अपने कंधे पर एक बैग उठाए चढ़ रहा है—यह मानकर कि उसमें सोना है। पर ऊँचाई बढ़ते ही जब साँस फूलने लगती है, तब सवाल उठता है— क्या सच में बोझ की क़ीमत थी, या हम सिर्फ़ कहानी ढो रहे थे?