वैलेंटाइन घाट पर ढेंचू-ढेंचू प्रेमकथा
फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!
फरवरी की गुलाबी ठंडक में वैलेंटाइन घाट पर इंसान प्रेम का प्रदर्शन कर रहे थे, और दो भोले गधे इंसान बनने की कोशिश में पकड़े गए। भला हो धोबी का—कम से कम दो गधों को इंसान बनने से बचा लिया!
आज रिश्ते तय नहीं होते, डेमो दिए जाते हैं। बायोडाटा अब परिचय नहीं, प्रोडक्ट कैटलॉग है—जिसमें माइलेज, एसेट्स और फ्री एक्सेसरीज़ गिनाई जाती हैं। सवाल बस इतना है: क्या संस्कार भी EMI पर मिलते हैं?
बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”
“कुत्ते पाल लो, मुगालते पाल लो— लेकिन सफेद हाथी मत पालो, उसके दाँत अच्छे-अच्छों को पसीना ला देते हैं।”
1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया। सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने। आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था। दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है। लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।
भूमिका वह साहित्यिक ढाल है जिसके पीछे लेखक अपनी रचना की सारी कमजोरियाँ छुपा लेता है। यह किताब का परिचय नहीं, बल्कि लेखक की अग्रिम क्षमायाचना होती है—जहाँ दोष शैली का होता है, लेखक का कभी नहीं।
इस देश में विकास कार्य अब सड़क, स्कूल और दरी से नहीं, सीधे प्रतिशत से तय होते हैं। विधायक विकास नहीं देखते, वे सिर्फ़ यह पूछते हैं—“हमें कितना प्रतिशत मिलेगा?” यह व्यंग्य लेख उसी आत्मविश्वासी भ्रष्टाचार का दस्तावेज़ है, जहाँ लोकतंत्र चार स्तंभों पर नहीं, चालीस प्रतिशत पर टिका है।
भगवान के पास और कोई काम नहीं? हर परेशानी पर लोग इतना ही कहते हैं—धैर्य रखो, भगवान परीक्षा ले रहे हैं…मानो ऊपर कोई परीक्षा बोर्ड बैठा हो, और हम सब उसके आजीवन परीक्षार्थी हों।” 2. “हर आदमी का प्रश्नपत्र अलग—न टाइम टेबल, न सिलेबस, न नोटिस। बस सुबह उठो और पता चले—भगवान ने आज पॉप क्विज रख दी है!” 3. “पड़ोसी, रिश्तेदार, सलाहवीर—सबको लगता है भगवान ने सवाल-पत्र इन्हीं से पूछा है। खुद के पेपर तकिये के नीचे छुपाएँगे, पर दूसरों की कॉपी में झाँकना नहीं छोड़ेंगे!”
इस व्यंग्यात्मक यात्रा संस्मरण में लेखक ने अमरनाथ यात्रा के अनुभव को व्यंग्य, यथार्थ और करुणा के त्रिकोण में पिरोया है। हेलिकॉप्टर टिकट से लेकर खच्चर की पीठ तक, और फिर पालकी से 500 सीढ़ियों तक की इस यात्रा में न केवल शरीर की थकान है, बल्कि मन के द्वंद्व भी हैं। दर्शन की लालसा, टपकती टेंट, टूटती कोहनी, और बाबा बर्फानी की एक झलक—सब कुछ मानो एक दर्शनशास्त्र बन जाता है। अंत में लेखक का वाक्य “बाबा जिसे बुलाते हैं, वही जाता है” इस पूरे अनुभव को आध्यात्मिक रूप में समेट देता है।
पुरस्कारों की चमक साहित्यकारों को अक्सर पितृसत्ता की टोपी पहना देती है। ये ‘गुप्त रोग’ बनकर छिपाया भी जाता है और पाया भी जाता है, झाड़-पोंछकर अलमारी में रखा जाता है। साहित्यिक संसार में आज पुरस्कार एक ‘औषधि’ है – बिना मांगे मिल जाए तो शक होता है, न मिले तो रोग गहराता है।