बालम, आवो हमारे गेह रे: भागती जिंदगी के बीच भीतर बसे प्रियतम की खोज
आज का मनुष्य पहले से अधिक व्यस्त है। सुबह मोबाइल की घंटी से आँख खुलती है और रात भी किसी अंतिम संदेश, ईमेल या अधूरे काम के साथ समाप्त होती है। दिनभर बैठकों, जिम्मेदारियों, लाभ-हानि, पद-प्रतिष्ठा और संबंधों का हिसाब चलता रहता है। लोगों की भीड़ हमारे आसपास होती है, फिर भी मन का आँगन अक्सर सूना रह जाता है।
इसी आधुनिक अकेलेपन और भीतर बसे दिव्य प्रियतम की खोज को स्वर देता है नया कबीर-भाव से प्रेरित निर्गुण लोक–सूफ़ी भजन—
“बालम, आवो हमारे गेह रे”
यहाँ ‘बालम’ किसी सांसारिक प्रेमी का नाम नहीं, बल्कि आत्मा के उस परम प्रिय का प्रतीक है जिसे कभी राम, कभी पीव, कभी साँवरा, कभी साहिब और कभी सतनाम कहा गया है। मनुष्य उसे संसार में खोजता रहता है, जबकि वह उसकी प्रत्येक साँस और धड़कन में पहले से उपस्थित है।
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जब सबके द्वार सजाते-सजाते अपना द्वार छूट जाए
गीत की कथा उस व्यक्ति से आरंभ होती है जो बाहर से सफल और प्रसन्न दिखाई देता है। उसके पास काम है, पहचान है, रिश्ते हैं और उपलब्धियाँ हैं। वह दूसरों की अपेक्षाएँ पूरी करता है, सबके लिए समय निकालता है और संसार के अनेक द्वार सजाता है। इस भागदौड़ में वह अपने मन का द्वार खोलना भूल जाता है।
गीत की ये पंक्तियाँ इसी विडंबना को व्यक्त करती हैं—
दिन भर जग के द्वार सजाए,
अपना द्वार भुलावे रे।
हँसते मुख के भीतर मनवा,
चुपके नीर बहावे रे॥
हममें से कितने लोग बाहर से मुस्कराते हुए दिखाई देते हैं, जबकि भीतर कोई अनकहा दुःख चुपचाप बहता रहता है। सोशल मीडिया पर तस्वीरें चमकती हैं, उपलब्धियों की घोषणाएँ होती हैं और संबंधों की लंबी सूची दिखाई देती है; लेकिन मन से कौन निकट है—इस प्रश्न का उत्तर प्रायः नहीं मिलता।
लोग बहुत हैं संग हमारे,
मन से कौन करीब रे?
मीठे बोलों के इस मेले में,
दिल से सभी गरीब रे॥
यही इस भजन की समकालीनता है। यह केवल आध्यात्मिक विरह की बात नहीं करता, बल्कि आधुनिक जीवन की उस भावनात्मक रिक्तता को भी सामने लाता है, जिसमें व्यक्ति भीड़ के बीच रहकर भी अकेला हो जाता है।
पद, प्रतिष्ठा और उपलब्धियों के बीच बेचैन मन
आज सफलता का अर्थ प्रायः ऊँचा पद, बड़ा कार्यालय, बढ़ती आय और सामाजिक प्रतिष्ठा मान लिया गया है। इन सबकी अपनी उपयोगिता है, लेकिन यदि इनके बीच मन का चैन खो जाए तो उपलब्धियों का वैभव भी अधूरा लगता है।
गीत कहता है—
सुबह हुई तो काम पुकारे,
भूला मन का चैन रे।
बैठक, लाभ, हिसाब सँभाले,
दिल हुआ बेचैन रे॥ऊँची कुर्सी, बड़ा दफ्तर,
नाम हुआ गंभीर रे।
बालम बिन यह वैभव सारा,
सूखे तट का नीर रे॥
यह संसार छोड़ देने का आह्वान नहीं है। गीत यह नहीं कहता कि जिम्मेदारियों, परिवार या कार्य से दूर हो जाइए। उसका संदेश केवल इतना है कि बाहरी संसार सँभालते हुए अपने भीतर के संसार को मत भूलिए। दूसरों के द्वार पर दीप जलाते समय अपने मन के आँगन में भी एक दीप अवश्य रखिए।
“बालम” का अर्थ—भीतर बसा परम प्रिय
भजन का मुखड़ा एक विरहपूर्ण पुकार के रूप में सामने आता है—
बालम, आवो हमारे गेह रे,
तुम बिन दुखिया देह रे।
बालम, आवो हमारे गेह रे,
तुम बिन दुखिया देह रे॥
आरंभ में साधक को लगता है कि उसका प्रिय उससे बहुत दूर है। वह प्रार्थना करता है कि कोई उसका संदेश प्रियतम तक पहुँचा दे। लेकिन गीत के मध्य आने वाली साखी पूरे भाव को बदल देती है—
बाहर-बाहर खोजता,
भीतर बैठा पीव।
मन का परदा खोल दे,
मिल जाए अपना जीव॥
यही निर्गुण भक्ति का केंद्रीय बोध है। परमात्मा को किसी बाहरी आकार या एक निश्चित स्थान तक सीमित नहीं किया जा सकता। वह घट-घट में, प्रत्येक जीव में और हमारी चेतना के भीतर उपस्थित है। दूरी प्रियतम ने नहीं बनाई; दूरी मन के पर्दों ने बनाई है।
जब अहंकार, भय, दिखावा और निरंतर भागते रहने की आदत थोड़ी शांत होती है, तब साधक अनुभव करता है—
बालम बाहर कौन से आवें,
बालम घट के माहीं रे।
मन का परदा हटते ही फिर,
दूरी रहै न काहिं रे॥
इस क्षण गीत की विरहपूर्ण पुकार आत्मिक मिलन में परिवर्तित हो जाती है। जिसे बाहर से बुलाया जा रहा था, वह भीतर ही प्रकट हो जाता है।
कबीर की निर्गुण परंपरा और लोक–सूफ़ी संगीत
“बालम, आवो हमारे गेह रे” कबीर की निर्गुण चेतना से प्रेरित एक मौलिक रचना है। कबीर की वाणी की सबसे बड़ी विशेषता उसकी सहजता है। उसमें गूढ़ आध्यात्मिक सत्य भी घर, आँगन, चादर, कुम्हार, जुलाहा, दीपक, पानी और प्रेम जैसे सामान्य प्रतीकों के माध्यम से व्यक्त हो जाते हैं।
इस गीत में भी ‘गेह’ केवल ईंट-पत्थर का घर नहीं है। यह मनुष्य का अंतर्मन है। ‘मन का आँगन’ उसकी चेतना है, ‘मन का परदा’ अहंकार और भ्रम है तथा ‘बालम’ भीतर उपस्थित परम सत्य का प्रतीक है।
संगीत में लोक और सूफ़ी दोनों धाराओं का सुंदर संगम रखा गया है। इसकी रचना धीमी 6/8 दादरा लय, लगभग 70 BPM, तथा मिश्र पीलू, पहाड़ी और काफी के भावों पर आधारित है।
तानपुरा और एकतारा इसकी निर्गुण आत्मा को स्वर देते हैं। सारंगी और बाँसुरी विरह को गहराती हैं, जबकि ढोलक, खमक और संयमित सूफ़ी कोरस गीत को धीरे-धीरे सामूहिक आध्यात्मिक उत्कर्ष तक ले जाते हैं। अकॉस्टिक गिटार, विरल पियानो और सेलो पारंपरिक भाव को आधुनिक श्रोता की संवेदना से जोड़ते हैं।
गीत की शुरुआत में सुनाई देने वाली दूर की शहरी हलचल, घड़ी की टिक-टिक और मोबाइल की सूचनाएँ आज के यांत्रिक जीवन का प्रतीक हैं। आध्यात्मिक साखी आते ही ये सभी यांत्रिक ध्वनियाँ रुक जाती हैं। केवल तानपुरा और एकतारा शेष रह जाते हैं—मानो संसार का शोर थमते ही भीतर की आवाज सुनाई देने लगी हो।
मन का शोर कैसे मिटता है?
गीत के अंत तक साधक समझ जाता है कि प्रियतम को बाहर से आने की आवश्यकता नहीं थी। जरूरत केवल मन के बंद किवाड़ खोलने की थी।
तन मंदिर है, मन है दीपक,
प्रेम बने जब नेह रे।
भीतर जागे ज्योति पिया की,
यही तुम्हारा गेह रे॥
और अंत में वही सूना आँगन उजाले से भर जाता है—
मन का आँगन सूना था,
जग का मेला घोर।
भीतर जागे साँवरे,
मिट गया मन का शोर॥
शायद हमारी बेचैनी का कारण संसार में किसी वस्तु की कमी नहीं, बल्कि स्वयं से बढ़ती हुई दूरी है। जब व्यक्ति कुछ क्षण रुककर अपने भीतर उतरता है, तब उसे अनुभव होता है कि जिस शांति, प्रेम और अपनत्व को वह बाहर खोज रहा था, उसका स्रोत भीतर ही उपस्थित है।
एक विनम्र संगीतमय आमंत्रण
“बालम, आवो हमारे गेह रे” केवल सुनने का गीत नहीं, बल्कि कुछ क्षण ठहरने का निमंत्रण है। इसे शांत वातावरण में, आँखें बंद करके और शब्दों के भाव के साथ सुनिए। संभव है कि गीत में सुनाई देने वाली पुकार कहीं आपके अपने मन की पुकार बन जाए।
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गीत एवं संकल्पना: Dr. Mukesh Aseemit
प्रस्तुति: Music with Mukesh
शैली: Kabir-inspired Nirgun Folk–Sufi Bhajan
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