बीबी कहां छिटक गई-कविता रचना

Ram Kumar Joshi Feb 11, 2026 हिंदी कविता 2

यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।

मैं और मेरी हिंदी: पोस्टर से उतरकर जीवन में आने की पुकार

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 26, 2025 हिंदी कविता 1

“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।” “‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।” “ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।” “हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”

 ‘समय के साये ’ : समय की कविताएं

डॉ मुकेश 'असीमित' Dec 22, 2025 Book Review 0

समय के साए’ कविता को भावुकता से निकालकर विचार की ज़िम्मेदारी सौंपता है। यह संग्रह पाठक से सहानुभूति नहीं, आत्मालोचन की माँग करता है। जब तालियाँ अन्याय पर भी बजने लगें, तब लोकतंत्र केवल अभिनय बनकर रह जाता है। डॉ. असीमित का समय कोई अमूर्तन नहीं, बल्कि अख़बार, संसद और बाज़ार में साँस लेता जीवित समय है। यह कविता राहत नहीं देती—यह प्रश्न देती है।