पुरस्कार को नमस्कार है: साहित्यिक पुरस्कारों की राजनीति और सम्मान संस्कृति पर करारा व्यंग्य

डॉ मुकेश 'असीमित' Aug 20, 2026 व्यंग रचनाएं 0

आज साहित्य में लेखक बढ़ रहे हैं, पाठक घट रहे हैं और पुरस्कारों की संख्या दोनों से तेज़ी से बढ़ रही है। उम्र, वजन, लेखन गति से लेकर डिजिटल रिचार्ज तक—यदि सम्मान बाँटने की यही रफ्तार रही तो हर लेखक के लिए कोई-न-कोई पुरस्कार तय मिलेगा। साहित्यिक पुरस्कार संस्कृति पर एक चुटीला और धारदार व्यंग्य।

लेखक की साहित्यिक होली

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”