पुरस्कार को नमस्कार है
– डॉ. मुकेश असीमित
पुरस्कार को नमस्कार है। जी हाँ, आपने बिल्कुल ठीक पढ़ा। यह न टाइपिंग की भूल है, न व्याकरण की चूक। आप कह सकते हैं कि भई, सुना तो हमने हमेशा “चमत्कार को नमस्कार” ही है, यह पुरस्कार कहाँ से बीच में आ गया? तो जनाब, समय के साथ समीकरण बदलते रहते हैं। आजकल चमत्कृत वही है जो पुरस्कृत है और जो पुरस्कृत है वही सर्वव्यापी सर्वग्राही नमश्क्रत है । इसलिए हमने भी सीधे निष्कर्ष पर पहुँचकर कह दिया-पुरस्कार को नमस्कार है।
अपनी भी चाह कोई बहुत बड़ी नहीं है-
चाह मुझे बस इतनी है, कागज़ पर छा जाऊँ,
कुछ लिखा हो ऐसा मेरा, पुरस्कार मैं पा जाऊँ।
पड़े गले में मालाएँ, दो-चार फोटो खिंच जाएँ,
पाठक भले न मिलें मगर, सब वाह-वाह कर जाएँ।
वैसे आजकल पाठक मिलें, यह भी कोई जरूरी शर्त नहीं रही। लिखने वाले पाठकों से बहुत आगे निकल चुके हैं। साहित्य का ऐसा स्वर्णिम काल आया है कि हर गली, हर मोहल्ले, हर व्हाट्सएप ग्रुप और हर फेसबुक प्रोफाइल के पीछे कम-से-कम एक लेखक छिपा बैठा है। किसी समारोह में गलती से माइक किसी के हाथ दे दीजिए, संभव है पाँच मिनट में वह कवि और दस मिनट में साहित्यकार बनकर उतर जाए। साहित्यिक मंचों पर लेखकों की भीड़ देखकर रेलवे के जनरल डिब्बे की याद आ जाती है।धक्कामुकी सामान को लेकर या सम्मान को लेकर क्या फर्क पड़ता है l
हर किसी की बगल में पांडुलिपि है, जेब में परिचय-पत्र है और निगाह मंच पर। कहीं माला दिखी नहीं कि गर्दन अपने-आप थोड़ी आगे बढ़ जाती है। अब इतनी विशाल साहित्यिक आबादी का सम्मान करना भी कोई छोटी जिम्मेदारी नहीं है। पुरस्कार देने वाली संस्थाओं की मजबूरी समझिए। आखिर वे कितनों को सम्मानित करें? इसलिए मेरा सरकार से विनम्र सुझाव है कि “मेक इन इंडिया” के अंतर्गत पुरस्कार उद्योग को विधिवत मान्यता दी जाए। हर जिले में ट्रॉफी निर्माण इकाई, हर तहसील में प्रशस्ति-पत्र प्रिंटिंग सेंटर और हर ब्लॉक स्तर पर माला-शॉल वितरण केंद्र खोला जाए। साथ में एक नया मंत्रालय भी होना चाहिए-सार्वजनिक लेखक एवं पुरस्कार प्रबंधन विभाग।
यह विभाग सबसे पहले आयु के अनुसार सम्मान बाँटे। जन्म से पाँच वर्ष तक “नव पल्लव सम्मान”, पाँच से दस तक “अंकुर साहित्य पुरस्कार”, किशोरों के लिए “चंचल कलम सम्मान”, युवाओं के लिए “उड़ान रचनाकार सम्मान”, प्रौढ़ों के लिए “सारगर्भिता पुरस्कार” और वरिष्ठों के लिए “साहित्यिक धरोहर सम्मान”। लेकिन इससे भी काम पूरा नहीं चलेगा, क्योंकि आजकल प्रतिभा जन्म के बाद ही सामने आए, यह जरूरी नहीं। गर्भस्थ शिशु भी संगीत सुन रहे हैं, कहानी सुन रहे हैं, मोबाइल की रिंगटोन पहचान रहे हैं; इसलिए उनके लिए “अभिमन्यु साहित्य सम्मान” रखा जाना चाहिए। गर्भावस्था के तीनों त्रैमास में अलग-अलग सम्मान दिए जा सकते हैं। सोनोग्राफी में यदि बच्चा हाथ कुछ इस तरह हिलाता दिख जाए जैसे कलम पकड़ रखी हो, तो उसे तत्काल “उदीयमान रचनाकार” घोषित कर देना चाहिए।
यदि उम्र की श्रेणियों से भी भीड़ कम न हो तो वजन का सहारा लिया जा सकता है। मंच के एक कोने में तराजू रख दीजिए। लेखक आए, पहले खुद तुले, फिर उसकी पुस्तक तौली जाए। आयोजक पूछे-“आपका वजन?” वह कहे-“बयासी किलो।” “पुस्तक?”-“तीन किलो दो सौ ग्राम।” बस, उसे तत्काल “भारी-भरकम साहित्य सम्मान” दिया जा सकता है। दुबले लेखक के लिए “लघुभार रचनाकार पुरस्कार” और सौ किलो पार वालों के लिए “महाकाव्य भारती सम्मान”। इससे विवाद भी कम होगा। कम-से-कम चयन समिति यह तो कह सकेगी कि हमने साहित्य के वजन का निष्पक्ष मूल्यांकन किया है।
फिर लेखन की गति के आधार पर भी पुरस्कार दिए जा सकते हैं। सुबह घटना देखी, दोपहर में लेख लिखा, शाम तक पुस्तक तैयार-तो “फटाफट लेखन सम्मान”। तीन वेबसाइट से सामग्री उठाकर चौथी जगह अपना नाम चिपका दिया-“कट-कॉपी-पेस्ट गौरव पुरस्कार”। दो पंक्तियों में ज्ञान बाँटने वाले “सूक्ष्म साहित्य रत्न”, रील बनाने वाले “रील साहित्य शिरोमणि” और बाथरूम में कविता गाने वाले “स्नानागार काव्य सम्मान” के अधिकारी हों। वैसे बाथरूम कवि सबसे आत्मनिर्भर साहित्यकार है। खुद कवि, खुद वाचक, खुद श्रोता और अंत में खुद ही “वाह!” भी कह देता है। आलोचक का कोई खतरा नहीं, समीक्षा का झंझट नहीं।
अब पुरस्कार व्यवस्था को डिजिटल बनाना भी समय की माँग है। क्यों न सालभर के “पुरस्कार रिचार्ज कूपन” जारी किए जाएँ? सिल्वर पैक में साल में दो सम्मान, गोल्ड पैक में हर तिमाही एक और प्लैटिनम पैक में हर महीने पुरस्कार। प्रीमियम पैकेज में माला, शॉल, मोमेंटो, मंचीय फोटो, प्रेस नोट और “राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित साहित्यकार” कहलाने की सुविधा भी जोड़ दी जाए। ग्राहक संतुष्टि के लिए एक सेल्फी स्टैंड अलग से लगाया जा सकता है।
यदि किसी श्रेणी में दावेदार ज्यादा हो जाएँ तो नीलामी करा दीजिए। आखिर जब बहुत कुछ बोली से तय हो सकता है तो पुरस्कार क्यों नहीं? और यदि दो दावेदार बराबर की बोली लगा दें तो प्रतिभा परीक्षण भी हो सकता है-लंगड़ी टांग, रस्साकशी, टांग-खिंचाई, थूकम-थुकाई और सबसे प्रतिष्ठित “चरणचाट प्रतियोगिता”। आयोजक के चरणों के आसपास जो सबसे अधिक समय टिके, वही सच्चा समर्पित साहित्यकार माना जाए।
वैसे आजकल पुरस्कार ढूँढ़ने के लिए इतना परिश्रम भी जरूरी नहीं। व्हाट्सएप खोलिए, कोई न कोई संस्था आपको सम्मानित करने को व्याकुल मिलेगी। फेसबुक पर पोस्ट चमकती दिखेगी-“राष्ट्रीय सम्मान हेतु प्रविष्टियाँ आमंत्रित।” नीचे छोटे अक्षरों में लिखा होगा-“सहयोग राशि मात्र 2100 रुपये।” आप सहयोग दीजिए, वे सम्मान देंगे। दोनों पक्ष प्रसन्न। आप साहित्य की सेवा करके लौटेंगे और संस्था अर्थव्यवस्था की।
और अब लिखने का काम भी पहले जैसा कठिन कहाँ रहा? आज तो “एआई मेरा भाई” हर समय हाजिर है। आप कहिए-“प्रेमचंद जैसा कुछ लिख दो”, वह लिख देगा। “थोड़ा परसाई वाला तंज लगा दो”, वह तंज भी लगा देगा। “ग़ालिब की उदासी, कबीर का फक्कड़पन और सोशल मीडिया का मसाला मिला दो”-वह भी तैयार। लेखक का असली श्रम अब लिखने में कम, निर्देश देने में ज्यादा रह गया है। “जो हुक्म मेरे आका, बताइए क्या लिखना है?” वाली सुविधा उपलब्ध है।
परेशानी दूसरी है-लेखक बढ़ते जा रहे हैं और पाठक दुर्लभ प्रजाति बनते जा रहे हैं। भविष्य में कोई व्यक्ति पार्क की बेंच पर मोबाइल छोड़कर सचमुच किताब पढ़ता मिल जाए तो संभव है “पाठक संरक्षण विभाग” उसे पकड़कर किसी पाठक अभ्यारण्य क्षेत्र में पहुँचा दे। लेखक टिकट खरीदकर वहाँ उसे देखने जाएँ-“दूर से पाठक दर्शन सौ रुपये, अपनी पुस्तक पढ़वानी हो तो पाँच सौ अतिरिक्त।” जिस गति से साहित्य पैदा हो रहा है, पर्यावरण मंत्रालय को भी जल्द “साहित्यिक प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड” बनाना पड़ सकता है। ई-कचरे के बाद ई-साहित्य कचरा भी आखिर कोई छोटी समस्या थोड़े ही है।
मैं तो कहता हूँ मित्रा ,केवल लिखते मत रह जाइए । कलम अपनी जगह है, पुरस्कार अपनी जगह। साहित्य का भविष्य किसने देखा है, अपना वर्तमान सँभालिए। इधर-उधर निगाह दौड़ाइए, संपर्कों को पानी देते रहिए, आयोजकों की पोस्ट पर समय-समय पर “अद्भुत”, “अनुपम”, “अविस्मरणीय” लिखते रहिए। कहीं न कहीं कोई संस्था, परिषद, मंच, महासंघ या अंतरराष्ट्रीय-राष्ट्रीय-अखिल भारतीय समिति आपकी प्रतीक्षा में बैठी होगी।
और हाँ, पुरस्कार लेते समय सेल्फी लेना कतई न भूलिए। बिना फोटो का सम्मान वैसा ही है जैसे बिना काजी पंडित की शादी-हुई भी कि नहीं, कौन मानेगा?
तो आप लिखना तो छोड़ चुके हैं ,अब इसे पढ़ना भी छोडिये और एक अदद पुरस्कार का जुगाड़ लगाइए। निगाह मारिए इधर-उधर। कहीं न कहीं कोई पुरस्कारी लंगर खुला ही होगा। थाली उठाइए, लाइन में लग जाइए और जब आपका नंबर आए तो पूरी श्रद्धा से झुककर कहिए-
पुरस्कार को नमस्कार है!
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