कलियुग का रावण-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Oct 2, 2025 व्यंग रचनाएं 1

अख़बार ने लिखा — इस बार रावण 'मेड-इन-जापान'! पुतला बड़ा, वाटरप्रूफ, और दोनों पैरों से वोट माँगने तैयार। हम रोते नहीं, तमाशा देखते हैं: रावण की लकड़ी दूर से चमकती है, बच्चे खिलौने समझकर गले लगाते हैं, आयोजक स्टेज पर तालियां खाते हैं। असली रावण तो अंदर छिपा है — वह मुस्कुराता है और हर साल नया रूप धारण कर वोट, पैसा और शो भुनाता है। और सब शांत बैठे।

हिंदी हैं हम हिंदोस्ता हमारा

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 14, 2025 हिंदी लेख 0

हिंदी दिवस कोई स्मृति-लेन नहीं, आत्मगौरव का वार्षिक एमओयू है—जिसमें हम तय करें कि अदालत, विज्ञान, स्टार्टअप और दफ्तर की फाइल तक हिंदी का सलीका पहुँचे। भाषा मैनेज की जा सकती है, नियंत्रित नहीं; वह बारात है—जहाँ रोकोगे, वहीं ऊँची ‘हुर्र’ निकलेगी। एआई के युग में भी संवेदना की मुद्रा इंसान ही छापता है; इसलिए हिंदी को रोज़मर्रा, रोज़गार और रोज़दिल में उतारना होगा। यही उसका असली दिवस, कंठ का।

मैं और मेरी हिंदी-व्यंग्य रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 13, 2025 व्यंग रचनाएं 0

मैं, अंग्रेज़ी दवा लिखने वाला डॉक्टर, अब हिंदी में लिखने लगा तो शहर के ‘हिंदी प्रहरी’ गुरुजी मेरी हर पोस्ट में बिंदी-अनुस्वार ढूंढते फिरते हैं। फेसबुक की वॉल अब क्लासरूम बन गई है—खद्दर कुर्ता, झोला, फाउंटेन पेन और ‘हिंदी की टूटी टांग’ का स्थायी दर्द। मैं त्रिशंकु-सा, हिंग्लिश और देसी मुहावरे के बीच लटका, गूगल इनपुट से जूझता, फिर भी लिखने की खुजली शौक से खुजाता हूँ। बेखौफ़, मुस्कुराते हुए.

रायता पुराण : रायता फ़ैल गया

डॉ मुकेश 'असीमित' Sep 3, 2025 व्यंग रचनाएं 2

“रायतपुराण” भोजन-संस्कृति का हास्य-व्यंग्यात्मक आख्यान है। सागर-मंथन से जन्मा यह दधि-व्यंजन कभी पंगत का गौरव था, तो आज बुफ़े की प्लेट के कोने में सहमा पड़ा है। कभी भूखे बारातियों का उद्धार करता, तो कभी फूफा के हाथों विवादों में फैलाया जाता। अब यह थालियों से निकलकर सोशल मीडिया की दीवारों पर अफ़वाहों और राजनीति का प्रतीक बन चुका है।

जगाते है-कविता-बात अपने देश की

Sanjaya Jain Jun 29, 2025 Poems 0

यह आत्मपरिचयात्मक कविता एक लेखक के अंतरमन की झलक देती है — जहाँ लेखनी के गुण-दोष, धनहीनता में भी मन की समृद्धि, और समाज को जाग्रत करने की शक्ति निहित है। यह भावनाओं, चेतना और सभ्यता को एक नए रूप में ढालने का आह्वान करती है।

मकान मालिक की व्यथा –व्यंग रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 12, 2024 व्यंग रचनाएं 7

किराए के लिए उन्हें फोन करता हूँ तो पता लगता है, वो बहुत दुखी हो गए हैं, उनकी सात पुश्तों में भी कभी किसी ने ऐसे टटभुजिये मकान में शरण नहीं ली , मकान उनकी नजर में पनौती है ,कह रहे थे इस माकन में घुसते ही उनकी बेटी बीमार हो गयी ,डेड लाख रु […]

“लिखें तो लिखें क्या ?”–व्यंग रचना

डॉ मुकेश 'असीमित' Jun 3, 2024 व्यंग रचनाएं 0

एक लेखक के लिए क्या चाहिए? खुद का निठल्लापन, उल-जलूल खुराफाती दिमाग, डेस्कटॉप और कीबोर्ड का जुगाड़, और रचनाओं को झेलने वाले दो-चार पाठकगण। कुछ जानकार प्रकाशकों से भी जुगाड़ बिठा ही लिया है, बस अब तो विषय चाहिए, जिस पर लिखना है ।कुल मिलकर शतरंज की बिसात तो बिछा ली लेकिन मोहरे अभी गायब […]