रिश्ते -कविता हिंदी रचियता महादेव प्रेमी Hindi Poem Rishte
जब रिश्तों में स्वार्थ और लोभ का ज़हर घुल जाता है, तब वर्षों से सहेजे संबंध भी टूटने लगते हैं। मनुष्यता की नींव पर जब निजी लाभ हावी हो जाता है, तो नाते सिर्फ समझौते बनकर रह जाते हैं। यह पंक्ति आज के स्वार्थी सामाजिक परिवेश की सच्चाई बयां करती है।