गांव का व्यापारी अमरीक सिंह क्या था, पूरा डकैत। आतंक मचा रखा था। दिखने बोलने में बड़ा मीठा पर जैसे ही कहीं लेन-देन की बात हो साम-दाम दंड-भेद सारे हथकंडे अपना लेता। पंचायत को पहले ही काबू कर रखा था।
कहने को गांव का बड़ा दानवीर बनता फिरता पर उसमें भी इल्म कर चंदे से कमाई का इंतजाम कर देता।
अपना मकान भी हवेली जैसा बना रखा था। शहर से कोई आते तो ठहरने खाने पीने का इंतजाम भी कर देता। आसपास की छोरियां उनका मनोरंजन भी कर देती। खुला दरबार था। गांव में हर किसी को बुला देता, लोग दौड़ के आते, काम भी लेता और दाम भी खूब देता, मौज मस्ती के साथ।
गांव वालों से फसल भी खरीद लो, हुनर भी खरीद लो और कोई नहीं बेचें तो लट्ठ चलवा दो। उठा के ले आओ। उच्च श्रेणी की दादा गिरी से लेकर निकृष्ट श्रेणी तक के सभी हथकंडे अपनाते देर नहीं लगाता। गांव में बस मेरी ही बात चलें, अहं की बू अब बदबू सी हो गयी पर ज़वाब कौन दे? कोई सिर उठाता तो फोड़ देता। रिजल्ट यह कि मैदान खाली था।
गांव में कोई, पढ़-लिख गया हो उसे अपने यहां बुला लेता। नौकरी देता, हां -काम भी ख़ूब लेता। उनकी बुद्धि के प्रयोग से अपने बिजनेस को और विस्तार देता।
वैसे भी कहते हैं पैसा पेसै को खींचता है। अमरीक सेठ बहुत बड़ा धन्ना सेठ बन गया। खेती भी करवा देता तो मशीनें भी खरीद लेता। ब्याजिना धंधा ऐसा कि अगला ज़िन्दगी भर चुकाता ही रहे पर कर्जा न उतरे। गांव वालों की ज़मीन गिरवी से ज़ब्ती होते होते एक चौथाई से ज्यादा गांव पर हक़ जमा दिया था।
आदमी जब पैसा कमा लेता है तो मन में आता है कि एक शक्ति मिल गई तो अब लोग हमें मान दे, सम्मान दे , हमारे चर्चें हो , कहीं मीटिंग में जाएं तो सब खड़े हो जाय, और मालाएं पहनाएं। कुछ करे तो उनसे पूछें और कुछ न भी करें वो भी तो पूछें।
गांव में जो भी लाभान्वित थे उनको तो कोई आपत्ति नहीं थी। वे सब वैसा ही करते थे पर ऐनाराम ऐसा कि अमरीक सिंह को राम-राम तक न करें। इधर उधर से , रिश्तेदारों से सहायता ले-ले, पर अमरीक सेठ से सहायता तो क्या ले, हमेशा उसको आडा तिरछा ही बोलें।
गांव के लोग अंदर से तो ऐनाराम के साथ थे खुले में कोई साथ नहीं देता था। बिचारे सभी खौफजदा थे। ऐनाराम का चाचा कभी कभी अमरीके की कोठी चला जाता जब भी वापस लौटता हमेशा दारु से धुत हो, लौटता।
अमरीक सिंह उससे घर की बातें पूछता रहता। घर में फूट आ गई थी।
पहले तो ऐनाराम सिर्फ आंख की किरकिरी था पर धीरे धीरे गांठें पड़ती गई और अब तो वह आंख का फूला होगया। अमरीके के दिमाग में एक ही बात – किसी तरह ऐनाराम को डब्ल्यू बनाना है।
स्लाला नमस्कार क्यों नहीं करता? इसकी ईंट से ईंट बजानी होंगी। दीपावली आने से पहले ही खुला बारुद मंगवा लिया और देशी पाइप से जुगाड बना एक हवाई पटाखा उसके घर पर फुड़वा दिया। उससे भैंसों के लिए रखें चारें में आग लग गई। आधा मकान फूस का था। आग लग गई, बुझाये तो कैसे। बीस पच्चीस पानी भरी बाल्टियां भी डाली पर आग तो आग थी।
लगाई आग सरलता से बुझती नहीं, और भभकती है। ऐनाराम के दिल वाली आग अब बुझने वाली नहीं थी।
ऐनाराम को अंदेशा था कि ये सब खेल भले अमरीक सिंह करवाता है पर उसके कहने पर करने वाला उसका गली वाला पड़ोसी कतरिया है। पहले भी उसके खिलाफ छोटी-मोटी घटनाएं कर चुका था। उसकी लुगाई अमरीके के यहां आती जाती रहती थी।
आज ऐनाराम ने कतरिये को अच्छा खासा ठोक दिया। फिर गुस्से में अमरीके के ट्रक का कांच फोड़ आया। बीच में सईदिये को भी लात मार दी। “स्साले बिकाऊ चमचे कहीं के।” सबको गाली देता रहा।
इस तरह से बात बढ़ती गईं,गांव में दो ग्रुप बन गये। अमरीके वाला ग्रुप भारी था पर अभी तक ऐनाराम की अकड़ को तोड़ नहीं पाया था। यही चिंता खायें जा रही थी। उसके घर का रास्ता ऐनाराम के घर के आगे से ही जाता था। पता नहीं पत्नी बच्चों के साथ क्या कर बैठें?
हर समय टेंशन।
लडा़ई हमेशा की अच्छी नहीं। कहीं तो फुल स्टॉप लगें।
समय बीतते अमरीक सिंह भी परेशान होगया पर बेचारा ऐनाराम तो थक सा गया। हुआ यह कि ऐनाराम की बड़ी बच्ची जवानी की दहलीज पर पांव रखे खड़ी थी। एक दो बार चुपके से चाची के साथ अमरीके के हवेली हो आयी। लौटी तब रंग-ढंग बदले हुए थे। अमरीके ने षड्यंत्र पूर्वक उसके परिवार को तोड़ सा दिया। ऐनाराम समझ गया कि अब सरेंडर में ही सार है। उपर वाले ने अब बर्बादी की कहानी लिखनी शुरू कर दी है।
आखिर अब दोनों ही पंचों को कहने लग गए रोज रोज़ का झंझट ठीक नहीं। फैसला करवा दो।
पंचायत बैठी, पंचों ने दोनों पक्षों को आमने-सामने बिठाकर पहले अमरीके से बोलने को कहा।
अमरीक सिंह – ऐनाराम अपने घर में तलवार धारिये रखता है। क्या जरूरत है जब हमारे पास है तो गांव में और कोई क्यों रखें। इससे गांव में दहशत रहती है। ये और इसका भाई दारुबाज है कब हथियार निकाल सबको मार दे? ऐसों के पास हथियार नहीं होने चाहिए। इसकी ज़ब्ती की जाय।
फिर रुककर बोला – ये गांव वालों को कुछ नहीं समझता। दूसरे गांव वालों को फसल बेचता है।
अरें! हम जब है तो औरों से क्यों धंधा करें। गांव की फ़सल गांव की और रकम उधारी भी गांव की।
इसने गांव की मर्यादा तोड़ दी। इसलिए साफ और सच्चा कहता हूं कि मुझे इसके घर में लोंपा लगवाना पड़ा। अगर ये चाहें तो झोंपा फ्री में ठीक करवा देंगे पर अगली फसल मुझे ही बेचनी होंगी। एक बार इसके घर में आना-जाना हो तो जाहो जल्लाली ले आयेंगे।
ऐनाराम ने बोलना चाहा पर उसे दो मुस्टंडो ने पकड़ के रोक दिया और कहा- ठंड रख तेरे भले के लिए ही करेंगे। ज्यादा उछाल ठीक नहीं।
पंचायत के पांच में से तीन पंच अमरीके के यहां खाते पीते थे सो एक साथ ही बोल पड़े – “हम सब जानते हैं और एक राय होकर तय करते हैं कि ऐनाराम ने जो कुछ किया गांव वालों के विरुद्ध किया। फ़सल बाहर बेचना, बेटी बेचने जैसा है गांव का धंधा गांव में ही होगा। दूसरी बात गांव में हथियार एक के पास ही रहेंगे। अमरीक सिंह भले आदमी और गंभीर प्रकृति के है। हथियार उन्हें ही शोभा देते हैं। ऐनाराम अपना तलवार धारियां आज ही सौंप दें।
रही बात झोपड़ छपरैल को ठीक करने की तो अमरीक सिंह से पैसे उधार लेकर ठीक करवाएं। और किसी से उधार लेना गांव की बदनामी होगी। ब्याज तो जो सभी देते हैं, देना होगा।”
इस तरह पंचायत ने यूएनओ की माफिक फैसला देकर अमरीक सिंह को पूरे गांव का पट्टा लिखने का रास्ता साफ कर दिया।
सब कहते हैं “संक्रांति उत्सव लट्ठ मारों का ही होता है।”
शेष दो पंच मरदुएं से बैठे रहे।
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डॉ मुकेश 'असीमित'
2 hours agoडॉ. राम कुमार जोशी की व्यंग्य-कथा ‘यूएनओ की माफ़िक’ सत्ता, धनबल, भय और पक्षपाती पंचायत के माध्यम से उस न्याय-व्यवस्था पर प्रहार करती है, जिसमें कमजोर को ही हथियार छोड़ने और समझौता करने का आदेश मिलता है।