डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 13, 2026
Music Songs
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भारत की मातृभूमि, नदियों, खेतों, पर्वतों और प्राकृतिक सौंदर्य को समर्पित ‘वंदे मातरम्’ की मूल भावना का सरल हिंदी में गीतात्मक रूपांतरण। इस भावपूर्ण देशभक्ति गीत के बोल पढ़ें और इसकी संगीतमय प्रस्तुति YouTube पर सुनें।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jul 13, 2026
Lifestyle
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शब्दों में व्यंग्य, सुरों में संवेदना और रचनाओं में अपने समय की धड़कन—‘Dr. Mukesh Aseemit Creations’ साहित्य, मौलिक संगीत, कविता, भक्ति और सामाजिक चिंतन का एक रचनात्मक YouTube मंच है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 19, 2026
हिंदी कविता
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“छंटे कुहासा, सूरज निकले,
मन का हर अंधकार पिघले…
नव विचारों के साथ यह संवत्सर केवल तिथि नहीं,
बल्कि चेतना का एक नया उदय है।”
Dr Shailesh Shukla
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
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यह कविता आधुनिक जीवन की अंधी दौड़ से उपजी थकान, आंतरिक रिक्तता और आत्मचिंतन की आवश्यकता को कोमल लेकिन गहरे दार्शनिक स्वर में व्यक्त करती है। यश, धन और शक्ति की आकांक्षाओं से मुक्त होकर शांति, प्रेम और करुणा को जीवन का वास्तविक सौभाग्य बताया गया है। मीरा, राम और वैराग्य के प्रतीकों के माध्यम से यह रचना विकास और शांति के संतुलन पर प्रश्न उठाती है और पाठक को ठहरकर अपने भीतर झाँकने का अवसर देती है।
Ram Kumar Joshi
Feb 11, 2026
हिंदी कविता
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यह कविता महानगर दिल्ली की चकाचौंध, अव्यवस्था और आम आदमी की असहजता पर तीखा, लेकिन हल्का-फुल्का व्यंग्य है। ‘बीबी कहाँ छिटक गई’ सिर्फ़ एक व्यक्ति के खोने की बात नहीं, बल्कि उस आम नागरिक की स्थिति का रूपक है, जो महानगरीय भीड़, जेबकतरी, शोर और भ्रम में स्वयं को खो बैठता है। हाथी की पूँछ और हिलती डोर जैसी प्रतीकात्मक पंक्तियाँ सत्ता, व्यवस्था और भ्रमजाल पर करारा कटाक्ष करती हैं। कविता सरल भाषा में शहरों की जटिल सच्चाई उजागर करती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 6, 2026
हिंदी कविता
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“रास्ते मिल गए हैं,
पर मंज़िल गुम हो गई है कहीं।”
“हम आगे इसलिए नहीं बढ़े
कि सबको साथ ले जाएँ,
बल्कि इसलिए
कि पीछे छूटे लोग
दिखाई न दें।”
“वे लोकतंत्र के पहियों तले कुचले गए—
लेकिन ट्रैफिक नहीं रुका।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 31, 2025
हिंदी कविता
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वर्ष पच्चीस एक ही नहीं था—वह हर व्यक्ति के लिए अलग निकला।
कहीं हँसी थी, कहीं आँसू;
कहीं खजाना भरा, कहीं खाली हाथ।
यह कविता समय की उसी भीड़ को दर्ज करती है
जहाँ हर जीवन अपना-सा सच लेकर चलता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 26, 2025
हिंदी कविता
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“मंच पर मैं फूलों में लिपटी हूँ, और व्यवहार में हाशिए पर सिमटी हूँ।”
“‘राजभाषा’ कहलाती मैं, फिर क्यूँ हर वाक्य के बाद खिचड़ी सी हो जाती मैं।”
“ये तालियाँ हैं या सिर्फ़ एक दिन का उत्सव—हिंदी दिवस।”
“हमें हिंदी से मोहब्बत है—जीती-जागती, सुलगती, बोलती-लड़ती मोहब्बत!”
Prahalad Shrimali
Dec 26, 2025
हिंदी कविता
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“हमसे हर ओर उजाले हैं, क्योंकि हम दिलवाले हैं!”
“चेहरे पर कोई चेहरा नहीं, जो हैं, हम हूबहू हैं वही!”
“प्रेम हमारा जीवन सार, प्रकृति से करते हैं प्यार!”
“अनुपम यह आत्म-उपहार, तुकबंदी भरे ये प्रिय उद्गार!”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
People
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यह कविता अटल बिहारी वाजपेयी के उस दुर्लभ व्यक्तित्व को रेखांकित करती है, जहाँ कविता और राजनीति एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि सहचर बन जाते हैं। सत्ता के उतार–चढ़ाव के बीच भी भाषा की मर्यादा, संवाद की गरिमा और लोकतंत्र के प्रति अटूट निष्ठा—इस रचना में श्रद्धा नहीं, वैचारिक स्मरण है।