डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 6, 2026
संस्मरण
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बचपन की सर्दियाँ कोई निजी स्मृति नहीं होतीं—वे सामूहिक अनुभव होती हैं। अंगीठी की आँच, ढिबरी की लौ, उल्टे पैर खोजती आँखें और अलाव के चारों ओर सुलगती किस्सागोई—सब मिलकर वह गर्माहट रचते थे, जिसे आज के रूम हीटर भी नहीं दे पाते।
Ram Kumar Joshi
Jan 5, 2026
हिंदी कविता
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सम्मान, पुरस्कार और नोटों की थैलियों से सजे कवि सम्मेलन,
जहाँ कविता की तलाश में गए श्रोता
मसखरी लेकर लौटे।
यह व्यंग्य उन बड़े नामों पर है,
जिनकी आवाज़ भारी है
और अर्थ हल्का।
Wasim Alam
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है,
इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है।
AI जवाब दे रहा है—
पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।
Ram Kumar Joshi
Jan 2, 2026
व्यंग रचनाएं
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1971 का चुनाव हार-जीत से नहीं, एक पीए के भाषण से इतिहास बन गया।
सत्ता के गलियारों में बोले गए शब्द, जनता ने जेलों में गिने।
आपातकाल की कीमत उन लोगों ने चुकाई, जिनका भाषण से कोई लेना-देना नहीं था।
दिल्ली से नागौर तक—हर चुनाव में कोई न कोई पीए इतिहास लिख ही देता है।
लोकतंत्र में कई बार कर्म किसी के होते हैं, फल किसी और को भुगतने पड़ते हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 1, 2026
India Story \बात अपने देश की
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नया साल कोई तारीख नहीं, भीतर की एक हल्की-सी हलचल है।
उत्सव का सवाल नहीं, चेतना का सवाल है।
जो छूट गया, वही नया है; जो थाम लिया, वही बोझ।
कैलेंडर बदलते रहते हैं, साल तभी बदलता है जब दृष्टि बदलती है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Dec 24, 2025
Culture
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यह व्यंग्यात्मक चिट्ठी एक मध्यमवर्गीय व्यक्ति की उन इच्छाओं का दस्तावेज़ है, जो सरकारों, बैंकों और व्यवस्थाओं से निराश होकर सीधे सांता क्लॉज़ तक पहुँचती हैं। मोज़ों से लेकर स्विस अकाउंट, बिजली बिल से लेकर बॉस की मीटिंग तक—यह रचना हास्य, विडंबना और करुणा के बीच झूलती एक सच्ची सामाजिक तस्वीर पेश करती है।
Vivek Ranjan Shreevastav
Dec 19, 2025
व्यंग रचनाएं
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जब साहित्य अकादमी में प्रेस कॉन्फ़्रेंस बिना प्रेस और बिना कॉन्फ़्रेंस के खत्म हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि साहित्य से ज़्यादा राजनीति बोल रही है—और व्यंग्य चुप नहीं रह सकता।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Nov 10, 2025
व्यंग रचनाएं
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कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं—क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। उनका आदर्श वाक्य है — “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।”
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जहाँ नेता प्रचार से मशहूर होते हैं, वहाँ कंजूस बिना खर्च के ही चर्चा में रहते हैं। मोहल्ले की चाय की थड़ियों पर उनके नाम के किस्से चलते हैं।
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कहते हैं, ये लोग लंबी उम्र जीते हैं — शायद इसलिए कि ज़िंदगी भी बहुत संभालकर खर्च करते हैं।
Wasim Alam
Oct 14, 2025
व्यंग रचनाएं
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लेखन भेजना आसान है, लेकिन उसके बाद की प्रतीक्षा ही असली ‘कहानी’ बन जाती है। संपादक का “यथासमय” जवाब लेखकों के जीवन का सबसे रहस्यमय शब्द है — न वह आता है, न जाता है, बस उम्मीदों के गोदाम में लटका रहता है। हर लेखक अपने मेलबॉक्स में “प्रकाशन” नहीं, बल्कि व्यंग्य ढूंढता है — क्योंकि लेख छपे या न छपे, व्यंग्य तो मन में खुद-ब-खुद छप ही जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Sep 18, 2025
Blogs
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दोस्ती अमृत है, मगर उधार की चिपचिपाहट इसे छाछ बना देती है। वही दोस्त जो आपकी माँ का हाल पूछता था, अचानक आपकी क्रेडिट कार्ड लिमिट साफ़ कर देता है। रिकवरी के लिए आप गुड मॉर्निंग भेजते हैं और जवाब का इंतज़ार वैसा ही करते हैं जैसे पहले क्रश के ‘हम्म्म’ का। और जब वह अंडरग्राउंड हो जाए, तो समझिए आपकी दोस्ती अब एक व्हाट्सऐप ग्रुप की भावनात्मक कर्ज़ बैठक बन चुकी है।”