डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 12, 2026
व्यंग रचनाएं
0
सरकार की पशुपालन योजना में गाय-भैंस को तो जगह मिल गई, पर गधे को अभी भी पहचान का इंतजार है। गधा गणना में घटती संख्या ने विशेषज्ञों को चौंका दिया है। इस व्यंग्य में गधा संरक्षण, पति पंजीकरण और पड़ोसी देशों की गधाग्राही अर्थव्यवस्था के बहाने समाज और व्यवस्था पर हल्का-फुल्का कटाक्ष किया गया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Mar 2, 2026
व्यंग रचनाएं
0
“रंग लगाने गया था, पर हर दरवाज़े पर रंगों की परिभाषा बदल गई। संपादक ने रंग सुरक्षित रख लिए, समीक्षक ने विमर्श पूछ लिया, आलोचक ने कालजयी होने की शर्त लगा दी। अंततः बचा हुआ गुलाल घर की चौखट पर ही काम आया।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 19, 2026
व्यंग रचनाएं
0
लोकतंत्र की डाल पर हम खड़े नहीं हैं,
अपनी-अपनी पूँछ से लटके हुए हैं।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 10, 2026
समसामयिकी
0
सोना कोई उपयोगी वस्तु नहीं, बल्कि मानव आकांक्षाओं और असुरक्षाओं का सबसे चमकदार प्रतीक है। न वह भूख मिटाता है, न ठंड से बचाता है, फिर भी सदियों से उसे सबसे अधिक मूल्य दिया गया। इस लेख में सोने की बढ़ती कीमतों को बाज़ार की चाल नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक मान्यताओं का परिणाम बताया गया है। कैसे हमने सोने को सम्मान, सुरक्षा, प्रतिष्ठा और विश्वास का पर्याय बना दिया—और बाज़ार ने इन्हीं भावनाओं को भुनाना सीख लिया। मंदिरों, बैंकों और आभूषणों में सिमटे सोने के माध्यम से यह रचना भारतीय संस्कृति, अध्यात्म और अर्थव्यवस्था के अंतर्संबंधों पर गहन वैचारिक दृष्टि डालती है। यह लेख सोने से ज़्यादा मानव मन की कीमत पर सवाल उठाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 9, 2026
व्यंग रचनाएं
0
पेट की राजनीति बड़ी सीधी है—खाली पेट सिर्फ़ खाना माँगता है, भरा पेट सवाल। बब्बन चाचा के पेट से देश की प्रगति नापी जा सकती है, क्योंकि जहाँ खाना दिखा, वहाँ लोकतंत्र अपने आप चुप हो जाता है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 8, 2026
Book Review
0
यह भूमिका लेखक के आत्म-व्यंग्य, समाज से संवाद और व्यंग्य की सीमाओं पर एक चुटीला दार्शनिक वक्तव्य है। लेखक गंभीरता के पारंपरिक आग्रह को चुनौती देता हुआ बताता है कि व्यंग्य का उद्देश्य न तो अंतिम सत्य देना है, न उपदेश—बल्कि मुस्कान के बीच सोच का एक क्षण पैदा करना है। पुस्तक, पाठक और समाज—तीनों के बीच चलने वाली इस शाश्वत गलतफहमी को लेखक ने हल्के लेकिन तीखे अंदाज़ में प्रस्तुत किया है।
डॉ मुकेश 'असीमित'
Feb 5, 2026
Book Review
0
‘बाराखड़ी’ केवल व्यंग्य-रचनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि हमारे समय की नैतिक, सामाजिक और राजनीतिक विसंगतियों की वर्णमाला है। डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी अपने तीखे लेकिन संतुलित व्यंग्य के माध्यम से पाठक को हँसाते नहीं, बल्कि सोचने को विवश करते हैं।
इस समीक्षा में ‘लड़की का बाप’, ‘घोटालाटूर’, ‘खाली देगची और भूखी पंगत’, ‘गरीबी हटेगी’, ‘पहचान हो तो ठीक रहता है’ जैसी रचनाओं के चयनित उद्धरणों के सहारे यह दिखाने का प्रयास है कि कैसे लेखक हास्य को साधन बनाकर गंभीर सामाजिक प्रश्न उठाते हैं।
यह संग्रह पाठकों के साथ-साथ व्यंग्यकारों के लिए भी एक पाठशाला की तरह है, जहाँ शिल्प, संवेदना और सरोकार का संतुलन सीखने को मिलता है। ‘बाराखड़ी’ आज के समय को समझने के लिए एक अनिवार्य व्यंग्य-पाठ है।
Prem Chand Dwitiya
Feb 4, 2026
व्यंग रचनाएं
1
पद्म पुरस्कारों की सूची ने एक बार फिर साबित किया कि नाम पहले नहीं, काम पहले आता है। जो लोग जिंदगी भर गुमनाम रहकर समाज की सफाई, शिक्षा, पर्यावरण और संवेदना की नींव मजबूत करते रहे—वही एक दिन नाम बन गए। असल में नाम कोई पदक नहीं, वह गुमनामी से निकलकर कर्मों की पहचान बन जाता है।
Prem Chand Dwitiya
Jan 20, 2026
व्यंग रचनाएं
1
“कुत्ते पाल लो, मुगालते पाल लो—
लेकिन सफेद हाथी मत पालो,
उसके दाँत अच्छे-अच्छों को पसीना ला देते हैं।”
डॉ मुकेश 'असीमित'
Jan 16, 2026
व्यंग रचनाएं
0
“जो लिखा है, वही होगा—बाक़ी सब तर्क अतिरिक्त हैं।”
“किस्मत ने परमानेंट मार्कर से लिखा है साहब।”
“इंसान से सहमति नहीं ली गई, फिर भी संविधान लागू है।”
“कुछ लोग फूल लिखाकर लाए, कुछ काँटे समेटते रह गए।”