टंकी का बयान : एक गिरावट की आत्मकथा

टंकी का बयान : एक गिरावट की आत्मकथा

हे उद्घाटनकर्ताओं, कृपया मुझे क्षमा कीजिए। मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। मैं देख रही हूँ आप सबके उदास चेहरे—नेताजी के हाथ में कैंची है, पर वह हवा में ही अटक गई है। मुझे बेपर्दा करने से पहले ही मैं स्वयं बेपर्दा हो गई। कितनी शिद्दत से  मुझे बनाया गया, यह मैं जानती हूँ l चाहे बेबकूफ ही बनाया,बनाया तो सही  । सुना है मुझे बनाने में इक्कीस करोड़ का बजट लगा। मैं जड़ हूँ, इतनी गणित नहीं समझ पाई। सरकारी बजट की जोड़-घटाव उतनी सीधी नहीं होती, जितनी मैं समझ बैठी थी। सच कहूँ तो कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा जोड़कर ही सही, मुझे बनाया तो गया था। मेरा इतना स्वार्थी होना भी नहीं बनता था। कम से कम मुझे बनाने में जिन अफसरों और ठेकेदारों के घर बने होंगे, उनका ही ख्याल रख लेती । पर क्या करूँ—मैं सरकारी अव्यवस्था की भावनाएँ पढ़ नहीं पाई।

मैं अफसरों के लटकते चेहरे देख रही हूँ, निर्माण विभाग की शर्मिंदगी भी दिख रही है। सबकी उँगलियाँ मेरी ओर उठ रही हैं। यह शिकायत मैं सात जन्मों तक नहीं भूलूँगी। लोग कह रहे हैं—क्या हो जाता , उद्घाटन तक ही रुक जाती। मैंने गिरने में उतनी जल्दी कर दी, जितनी मेरे निर्माताओं ने बनाने में भी नहीं की थी। काश, सारा दोष मैं अपने सिर ले लेती। काश, मेरे गिरने को लोग दुर्घटना मान लेते। पर सच यही है कि मैं पानी के दबाव से ज़्यादा भ्रष्टाचार और मिलावट के दबाव को सह नहीं पाई। यह गिरना नहीं था, यह बैठ जाना था—थककर, उकता कर, व्यवस्था की इस बेरुख़ी से।

Girne mein Kya Harz Hai पेपरबैक

आम जनता ने मेरे लिए कितने सपने पाले होंगे। मुझे पानी भरना था, जनता की प्यास बुझानी थी, उद्घाटन के दिन मंच की शोभा बढ़ानी थी। पर नियति को कुछ और मंज़ूर था। मेरे जन्म से पहले ही तय हो गया था कि मुझे पानी से ज़्यादा भाषण ढोना पड़ेगा। मेरे भीतर पानी से पहले फ़ाइलें भरी गईं—टेंडर की, कमीशन की, स्वीकृति की और ‘सब ठीक है’ की। मुझे बनाने से पहले जो तैयारियाँ हुई थीं, उनसे मैं कितनी खुश थी। इंजीनियर ने मुझे नक़्शे में मज़बूत बनाया, ठेकेदार ने बिल में, और अफसर ने नोटशीट में l सौ तरह के झाडफूंक टोन-टोटके करके मेरे पैदा होने की मन्नत मांगी होगी  । अब क्या हुआ—सपने हकीकत में बदल जाएँ, ऐसा नसीब तो लिखाकर नहीं लाई थी मैं। मैं जड़ हूँ, पंचभूत भी पूरे नहीं है —मिट्टी और जल से बनी थी; मिट्टी में मिल गई, यही नियति है। इसमें रोना कैसा। पर मेरे कारण कोई और बदनाम हो—यह मुझे सहन नहीं हो रहा। हम खुद तो अपना नाम नहीं कर सके, उलटे दूसरों को बदनाम कर चले ।

मेरी मजबूती पर सवाल उठाने लाजमी हैं । लोग पूछ रहे हैं कि इक्कीस करोड़ की टंकी इतनी जल्दी कैसे गिर गई। मैं उनसे पूछना चाहती हूँ—क्या आपने कभी इक्कीस करोड़ की नीयत देखी है? नीयत खोखली हो, तो कंक्रीट को दोष देना अन्याय है। मुझे जितना सीमेंट मिला, उससे ज़्यादा समझौते मिले। जितनी रेत डाली गई, उससे ज़्यादा ‘रेट’ तय हुई। और लोहे की जितनी सरिया थी, उससे ज़्यादा नियमों की धांधलेबाजी  का लचीलापन था।

टेस्टिंग के नाम पर मुझमें पानी भरा गया। कहा जा रहा है कि पानी भारी था—हो सकता है सामान्य पानी की जगह ‘हेवी वॉटर’ भर दिया गया हो। मुझे पंर पर नहीं उससे ज्यादा पानी पर दया आ रही है। क्या पानी पर भी जाँच बैठेगी? मित्रों, पानी तो टंकियों में ही नहीं, अफसरों के घरों के दाना-पानी  भरने के काम भी आता है ना ।

गिरकर भी कुछ तो हासिल हुआ। देखिए न—रील चली, ब्रेकिंग न्यूज़ आई। विपक्ष ने मेरी टंकी के मलबे और पानी से मुद्दों की खिचड़ी पका डाली। एक तरफ सत्तर साल पुरानी टंकी का गौरवगान, दूसरी तरफ मेरी ताज़ा गिरावट का मातम। मेरे गिरने में तीन मज़दूर घायल हुए। उनके परिवार वाले मुआवज़े की रकम से मुँह बंद करने को बेचैन हैं।

सरकारी मशीनरी का कोई दोष नहीं बताया जा रहा। मशीनरी दरअसल बहुत चुस्त है—जब बिल पास करने हों, भुगतान रोकना हो, ज़िम्मेदारी नीचे की ओर धकेलनी हो, तब देखिए कैसी बंदर जैसी फुर्ती दिखाती है। थक गई है मशीनरी भी—आख़िर मशीन है, इंसान थोड़े ही। पर जब गुणवत्ता जाँचने की बारी आती है, तो वह ध्यान में चली जाती है। मीन-मेख निकालना इंसानों का काम है, सरकारी मशीनरी का नहीं।

अब कहा जा रहा है कि मैंने सरकार को शर्म से पानी-पानी कर दिया। मैं सोचती हूँ—सरकार तो पहले ही भ्रष्टाचार के गड्ढे में गले तक डूबी हुई है; मेरे गिरकर बहाए गए उन्नीस लीटर पानी का योगदान भला कितना होगा?

मुझसे यह भी कहा जा रहा है कि कम से कम उद्घाटन तक तो खड़ी रहती। सच है—देखिए न, कितनी भली लग रही होती। गिरी तो कोई नेता-अफसर पास नहीं खड़ा हुआ। अगर खड़ी रहती, तो बड़े सलीके से बेपर्दा होती—नेता-अफसरों के साथ सेल्फ़ी खिंचती, अख़बार के पन्नों में शान से दमकती। ख़ैर, छप तो अब भी रही हूँ, पर मेरे मलबे के पास फटकने को कोई तैयार नहीं।

मैं सरकार से क्षमा चाहती हूँ। मुझे नहीं पता था कि मेरी मजबूती से ज़्यादा आपकी असहजता उजागर हो जाएगी। मैं समझ बैठी थी कि बड़े बजट के साथ बड़ी ज़िम्मेदारी भी आती है। मुझसे यह भूल हो गई। अगली बार ध्यान रखूँगी।

मैं गिरकर खामोश होना चाहती हूँ। मेरे मलबे में सवाल दबे हैं—कोई उन्हें न निकाले। पड़े रहने दीजिए मुझे। मलबा हटेगा, तो सवाल भी उछलकर बाहर आ जाएँगे। आप चाहें तो नई टंकी बना लीजिए—और ज़रूर बनाइए। लेकिन एक सुझाव है, जो बिना टेंडर के दे रही हूँ—इस बार टंकी में पानी भरने से पहले व्यवस्था में थोड़ी ईमानदारी भरिए। वरना कोई गारंटी नहीं कि ये टंकियाँ भी भारतीय रुपये और अमेरिकी  टेरिफ्फ़-दादा  की तरह गिरने की हद से भी ज्यादा गिर जाएँ।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 0)

Join the conversation and share your thoughts

No comments yet

Be the first to share your thoughts!