तीन रोटियों की माँ”(कमी, ममता और संघर्ष)

अस्पताल की उस सफ़ेद दीवारों वाली इमारत में, जहां हर कोई अपने अपने दर्द के इलाज के लिए आया था, मैं भी अपनी माँ के साथ एक चेकअप के लिए पहुँचा था। गर्मी के दिन थे, लेकिन अस्पताल के भीतर की सफ़ाई देखते ही बन रही थी — फर्श चमक रहा था, कूड़ेदान खाली थे और हवा में ताजगी थी।

इसी सफाई में झुकी हुई थी एक औरत — उम्र रही होगी कोई 26-27 साल, माथे पर पसीना और चेहरे पर थकान की परछाइयाँ। पर पहनावे से और चाल-ढाल से साफ़ था कि वो सिर्फ एक कामवाली नहीं, बल्कि ज़िंदगी से रोज़ लड़ने वाली एक जांबाज़ औरत है।

मेरी माँ ने सहजता से पूछा,
“बेटी, कहाँ रहती हो?”
वो रुकी, झाड़ू का डंडा पकड़े कुछ पल सोचती रही, फिर हल्की सी मुस्कान के साथ बोली,
“यहाँ पास ही, अस्पताल के पीछे वाली बस्ती में।”

बात आगे बढ़ी। माँ ने फिर पूछा,
“घर में और कौन-कौन है? आदमी क्या करते हैं?”
उसने धीरे से गर्दन झुकाई, मानो कोई भारी जवाब हो…
“पति काम करते हैं, पर बस इतना कमाते हैं कि उनका ही गुज़र-बसर हो पाए। घर चलाने, दवा-दूध, सबके लिए मुझे ही कुछ करना पड़ता है।”

अब माँ के चेहरे पर चिंता की झलक थी।
“बच्चे हैं?”
“जी, तीन हैं… तीनों छोटे हैं।”
“फिर इतने छोटे बच्चों को छोड़कर यहाँ कैसे आती हो?”

उसके चेहरे पर एक थरथराहट सी आई। उसने आँखे झुका लीं, फिर बोली —
“बच्चे मेरी माँ के पास रहते हैं… अपने नानी के घर। जब तक मैं साफ़-सफाई कर के लौटती हूँ, माँ ही देखती हैं। कभी दिल करता है दौड़ के अभी देख आऊँ, पर पेट की आग पहले है, माँ का दूध बाद में…”

मैं स्तब्ध था।

उस औरत की कहानी में कोई शोर नहीं था, कोई शिकायत नहीं थी — बस एक खामोश संघर्ष था, जिसे वो हर सुबह आँख खोलते ही गले लगाती थी। जिस उम्र में लड़कियाँ सपने देखती हैं, उस उम्र में वो तीन बच्चों की माँ बन चुकी थी। और अब — एक थकी हारी पत्नी, जो सिर्फ़ दूसरों के गंदगी को साफ़ नहीं करती थी, बल्कि अपने घर की गरीबी को भी हर दिन बुहारती थी।

उस दिन मुझे पहली बार समझ आया —
गरीबी सिर्फ़ पैसे की कमी नहीं होती, बल्कि वो वक़्त की मार है, जो एक औरत से उसका बचपन, उसकी जवानी और उसके सारे सपने छीन लेती है… और फिर भी, वो मुस्कुराकर कहती है — “सब ठीक है…”

नोट :-
यह कहानी एक सच्चे अनुभव पर आधारित है, जिसे मैंने एक सामान्य अस्पताल में महसूस किया। यह सिर्फ़ एक कामवाली औरत की बात नहीं है, बल्कि उन लाखों महिलाओं की आवाज़ है, जो बिना शिकायत किए अपने परिवार, बच्चों और घर की ज़िम्मेदारी उठाती हैं। उनकी खामोशी ही उनका संघर्ष है।

यह रचना समाज में मौन पड़ी उस ममता और मज़बूरी को स्वर देने की कोशिश है, जो हर दिन सफ़ाई करती है… लेकिन अपने जीवन की गंदगी को कभी किसी से नहीं कहती।

लेखक परिचय:

वसीम आलम
जिला सिवान, बिहार

Wasim Alam

Content Writer at Baat Apne Desh Ki

Wasim Alam is a passionate writer who shares insights and knowledge about various topics on Baat Apne Desh Ki.

Comments ( 2)

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Kadir hussain

6 months ago

Jab mehnat kiye hai to ''inshallah,, yakin rakhiye ap "khuda,, pe sab alhamdulillah hoga !!

All the best 🤞🤞

Pan mohd

6 months ago

Wooo
Kya soch hai
Insha Allah kamyabi jarur milegi