ऊर्जा का आवेशन

Ram Kumar Joshi Apr 2, 2026 व्यंग रचनाएं 1

“ऊर्जा स्वयं न पाजिटिव होती है न नेगेटिव—वह तो मात्र साधन है। फर्क सिर्फ इतना है कि उसे साधु साधे या ‘साहिब’ साधे।”

आनंदमठ : भूख, भक्ति, बगावत और भारतमाता का महाकाव्यात्मक उपन्यास

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 22, 2026 Book Review 0

आनंदमठ केवल एक कथा नहीं, एक चेतना है—जहाँ भूख विद्रोह को जन्म देती है, भक्ति शक्ति में बदल जाती है और मातृभूमि एक भाव नहीं, एक पुकार बन जाती है। बंकिमचंद्र का यह उपन्यास हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र केवल मानचित्र नहीं, त्याग और तपस्या से निर्मित एक जीवित अनुभव है।

फागुन में दिलों की कश्तियाँ

Shakoor Anvar Mar 21, 2026 गजल 0

फागुन आते ही दिल के तार अपने आप झनझना उठते हैं— यादें रंग बनकर लौटती हैं, मोहब्बत कश्तियों की तरह पार लगती है, और कहीं भीतर एक हल्की-सी चिंता भी सिर उठाती है— कि ये रंग, ये रिश्ते, और ये व्यवस्थाएँ… टिकें भी रहेंगी या नहीं?

नव संवत्सर गीत

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 19, 2026 हिंदी कविता 0

“छंटे कुहासा, सूरज निकले, मन का हर अंधकार पिघले… नव विचारों के साथ यह संवत्सर केवल तिथि नहीं, बल्कि चेतना का एक नया उदय है।”

साहित्य: जीवन, संस्कृति और समाज का रचनात्मक दर्पण

डॉ मुकेश 'असीमित' Mar 10, 2026 शोध लेख/विमर्श 1

साहित्य केवल शब्दों का संग्रह नहीं बल्कि मनुष्य के अनुभवों, संवेदनाओं और समाज की चेतना का जीवित दस्तावेज़ है। यह लेख साहित्य की अवधारणा, कला-संस्कृति और समाज से उसके संबंध तथा हिंदी साहित्य के प्रमुख वादों—छायावाद, प्रगतिवाद, प्रयोगवाद और नई कविता—को रोचक और प्रवाहपूर्ण ढंग से समझाता है।

अनुवाद: शब्दों से परे संस्कृतियों का सेतु

डॉ मुकेश 'असीमित' Feb 18, 2026 आलोचना ,समीक्षा 0

अनुवाद शब्दों का यांत्रिक स्थानांतरण नहीं, बल्कि सभ्यताओं का संप्रेषण है। यह वह पुल है, जिस पर चलते हुए हम एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं, बल्कि एक संस्कृति से दूसरी संस्कृति में प्रवेश करते हैं। अनुवादक शब्दों के पीछे छिपे समय, समाज और संवेदना को पढ़ता है—और उन्हें नए पाठक के हृदय में पुनर्जन्म देता है।

मेरा नाम करेगा रोशन

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 21, 2026 व्यंग रचनाएं 0

बेटा पैदा करने की ज़िद में परिवार ने इतिहास नहीं, मानसिकता की केस-स्टडी लिख दी। नौ बेटियाँ जैसे प्राकृतिक आपदा और बेटा जैसे एनडीआरएफ की टीम। ‘काफ़ी’ और ‘माफ़ी’ बेटियों के नाम नहीं, समाज के लिए छोड़े गए मूक नोट्स हैं। समाज आज भी प्रसव-कक्ष के बाहर खड़ा पूछ रहा है—“लड़का हुआ या फिर…?”

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 10, 2026 Poems 0

यह रचना हिंदी को “राजभाषा” के तमगे से बाहर निकालकर दफ़्तर, घर, गली और मनुष्य के बीच खड़ी दीवार पर सवाल करती है— क्या भाषा सिर्फ़ एक दिन का उत्सव है या रोज़ की साँस?

नया साल : कैलेंडर नहीं, चेतना का उत्सव

डॉ मुकेश 'असीमित' Jan 5, 2026 Darshan Shastra Philosophy 0

नया साल समय के बदलने का नहीं, सोच के बदलने का उत्सव है। प्रकृति जहाँ निरंतरता में जीती है, वहीं मनुष्य हर साल खुद से पूछता है—क्या मैं यही रहना चाहता हूँ? यह लेख नए साल के उत्साह, मनुष्य की अनुकूलन क्षमता और पशु-प्रवृत्तियों से आगे बढ़ने की मानवीय बेचैनी पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि डालता है।

“AI हर जगह है” — एक व्यंग्य

Wasim Alam Jan 2, 2026 व्यंग रचनाएं 0

तकनीक जितनी स्मार्ट होती जा रही है, इंसान उतना ही अपने सवालों से भागता जा रहा है। AI जवाब दे रहा है— पर सवाल पूछने वाला अब खुद नहीं सोच रहा।