तीर चल दिया मां — इस बार तुक्का नहीं था
रोहित भागता हुआ घर में घुसा… सीधे मां से लिपट गया।
“मां… देखो मैंने कर दिया… मां अब मैं बच्चा नहीं रहा… मैंने तीर चला दिया… सब कह रहे थे—इस बार तीर चल गया… ये तुक्का नहीं था!”
चलिए, इस दृश्य की पृष्ठभूमि में थोड़ा पीछे चलते हैं—
फ्लैशबैक में…
अब रोहित… आप पहचान ही गए होंगे—वही “कोई मिल गया” वाला रोहित।
जिसे दुनिया ने कभी ठीक से समझने की कोशिश नहीं की।
उसकी क्लास के बच्चे उसे मंदबुद्धि कहकर चिढ़ाते… हँसते…
हाँ, कुछ थे उसके “गुट” के बच्चे—जो सामने तो उसकी जी-हुजूरी करते,
लेकिन पीठ पीछे वही सबसे ज़ोर से ठहाके लगाते।
रोहित कई दिनों से जिद कर रहा था—
“मां, देखो ना… सब तीर-कमान से खेलते हैं… मुझे क्यों नहीं देते… मैं भी खेलूंगा…”
मैं हर बार टाल देती—
“अरे तू अभी बच्चा है रे… उम्र में और शरीर में भले बड़ा हो गया हो,
लेकिन दिमाग से अभी तेरी हरकतें बच्चों जैसी हैं…
कहीं तीर उल्टा चला दिया तो अपना या अपने ही किसी साथी का अहित कर बैठेगा…
पहले ढंग से जुबान तो चलाना सीख ले…”
लेकिन उसके गुट के बच्चे उसे चढ़ाते रहते—
“तू कर सकता है रोहित… तू कर सकता है…”
और फिर… एक दिन…
पहली बार उसे धनुष-बाण मिल ही गया।
बड़े कौतूहल से उसने उसे देखा…
धीरे-धीरे तीर चढ़ाया…
फिर सबके सामने उसे इधर-उधर दिखाकर छेड़ने लगा—
“छोड़ूं…? तुम पे छोड़ूं…? अरे अंकल… अंकल… डाल दूं क्या…?”
सब हँस रहे थे…
रोहित खुद अपने ही खेल में मगन था—
“छोड़ूं… छोड़ूं…”
और तभी…
फुर्र से तीर कमान से निकल गया।
“ओह! चल गया… तीर चल गया…!
लो… मैंने चला दिया…!”
वह उछल पड़ा… और भागता हुआ घर आ गया…
अपनी हर “उपलब्धि” सबसे पहले मां से साझा करनी होती है न…
“देखो मां… मैंने कर दिया… मुझसे हो गया…!”
उसकी आँखों में चमक थी—
जैसे उसने कोई खेल नहीं, बल्कि कोई ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया हो।
तीर कहीं भी गया हो—पेड़ पर, ज़मीन पर या हवा में ही कहीं खो गया हो—
पर रोहित के लिए वह “सफल प्रक्षेपण” था।
मां उसे समझने की कोशिश कर रही थी…
उसने वह वीडियो भी देखा था—
निहायत बच्चों जैसा खेल… वही हावभाव…
कोई सुधार नहीं दिख रहा था…
लेकिन मां भी क्या करे…
हर मां को अपना बेटा प्यारा होता है…
रोहित अब भी उछल रहा था—
“मैं अब बड़ा हो गया हूं… अब मैं बच्चा नहीं रहा… देखो, मैंने तीर चला दिया!”
“देखो मां… तुम कभी मुझे समझोगी नहीं… मैं तुमसे कट्टी…”
फिर अचानक सीना फुलाकर बोला—
“देखो मां… मुझे ‘कलियुग का अर्जुन’ बुला रहे हैं सब!”
मां ने हल्की झुंझलाहट में कहा—
“अरे बेटा… ये जीभ निकाल-निकाल कर ऐसी बचकानी हरकतें मत कर…”
रोहित तुरंत तर्क लेकर तैयार—
“मां… लेकिन वो कह रहे हैं—ये तो कृष्ण लीला की याद दिला रहा है!
जब मैया यशोदा ने कृष्ण से माटी खाने पर जीभ दिखाने को कहा था…
और मैंने जीभ निकाली तो सब मेरे गुट वाले कह रहे थे—
उन्होंने तो साक्षात ब्रह्मांड देख लिया… इस कलियुग में मां!”
मां ने सिर पकड़ लिया—
“लेकिन दूसरे गुट वालों को मौका मिल गया तेरी हरकत से…
वो तो इसे फिर से तुक्का ही बता रहे हैं…”
खैर… मां-बेटे में ये अनगिनत बहसें चलती रहेंगी…
दरअसल—
मसला रोहित का नहीं है…
मसला यह है कि हमने हर ऐसे रोहित को या तो देवता बना दिया है…
या मसखरा।
और ऐसे न जाने कितने रोहित…
इसी तरह हवा में तीर चलाते रहेंगे…
तुक्के को उपलब्धि समझते रहेंगे…
हर बार कोई रोहित अपने बाल भ्रम में माँ से लिपट कर कहता रहेगा
“मां… आज मैंने तीर चलाया… बहुत मजा आया…
देखो, सब लोग मेरे लिए ताली बजा रहे थे…
मैं बड़ा हो गया न?”
मां मुस्कुरा देगी—
जैसे हर मां मुस्कुराती है—
जब बच्चा पहली बार बिना गिरे चल लेता है।
लेकिन असली सवाल यह है—
क्या हमने रोहित को सच में “चलना” सिखाया है…
या सिर्फ हर बार गिरने पर ताली बजाना?
क्योंकि—
ताली और ठहाके… दोनों में एक समानता है—
दोनों सोचने से बचाते हैं।
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