ठोस ,द्रव और गैस तीनों में महंगाई !
डॉ प्रेमचंद द्वितीय
गांव की चौपाल पर बैठे-बैठे लोग बात कर ही रहे थे कि पं शिवनारायण जी बोले पूरा देश महंगाई की शरण में चला गया है ।हर दिन हर माह किसी न किसी वस्तु के भाव बढ़ जाते हैं और बड़े हुए भाव इतना भाव खाते हैं कि वह गिरने का नाम नहीं लेते हैं।आने वाले कल में कौन भाव खा जाए यह पता ही नहीं चलता है। फिर भी महंगाई खुद ही अपने आप आकर के ऐसी जमती है कि उठने और कम होने का नाम नहीं लेती है। ऐसे में अच्छे दिन तो पता नहीं कहां चले गए ,महंगे दिन आ गए !
पंडित जी के इस महंगाई की महिमा के बयान को सुनकर सुनील भैया बोले अरे इस बार तो त्यौहार फीके हो गए है । शक्कर सत्तर तक पहुंची और तेल की धार धुआंधार हो गई है ।एक बार फिर ,,खा गए शक्कर पी गए तेल ,,नारा बुलंद हो गया है ।पर हर कोई तो कहता है और डॉक्टर नेता तक भी कहते हैं कि मीठा मत खाओ शक्कर छोड़ो नहीं तो पूरा देश प्रीडायबीटिक हो जाएगा। उधर तला गला खाने से रोक के बावजूद तेल इतना महंगा है कि तेल देखो और तेल की धार देखो । वह बोले शक्कर तेल से तो प्याज अच्छे हैं जिनके भाव बढ़ने पर ये सरकार को चलता कर देते हैं। जब-जब चुनाव आते हैं प्याज के भाव बढ़ जाते हैं और वे आम आदमी के ही नहीं सरकार के आंसू तक बहा देते हैं और सरकार को सरका कर घर बैठा देते हैं ।शक्कर तेल की महंगाई प्याज की महंगाई के आगे बौनी है ।प्याज के आगे कहीं भी कोई महंगाई नहीं लगती है।
इस पर झोला छाप डॉक्टर के यहां अक्सर बैठने वाले अखिलेश जी बोले झोला डाक साहब के यहां जो भी मरीज जाते हैं वे कहते हैं कि मीठा कम करो ,तला गला जंक फूड कम खाने का कहते है लेकिन वे खुद किसी के यहां जीमने जाते हैं तो कहते हैं साले ने एक ही मिठाई बनाई और वह नमकीन तो तेल चढ़ा बना दिया और नाक भौं सिकोडते हैं पर उन्हें नहीं मालूम कि महंगाई मीठे और नमकीन पर ही सवारी करके आती है। झोलाछाप के झोल भरे रवैया से मरीज में जानने लगे कि वह मीठा नमकीन बंद करने का कहेंगे पर उन्हें क्या पता सरकार ने ही शकर तेल को महंगाई के तेल में तल दिया। चाहते हुए भी नहीं खा सकते है और न हीं खिला सकते हैं ।इस पर महंगाई की मार की चर्चा में भाग लेते हुए नरेंद्र स्वामी जी बोले बढ़ती महंगाई की आग से आखिर कैसे बचे । ,,महंगाई डायन खाए जात ,, नारा लगाने और हाय महंगाई करने से महंगाई की हाय हाय नहीं मिटेगी ।महंगाई के कारण ग्रहस्थ बाजार से सामान खरीदने से डरने लगा है। घर से निकले कि गाड़ी की टंकी महंगे पेट्रोल डीजल के कारण सुरसा की तरह मुंह फाड़ती है। डीजल पेट्रोल से बचने की सोचो तो इलेक्ट्रिक गाड़ी का बिजलो का करंट और बिल इतना आता है कि भरने के काबिल ही नहीं होते हैं ।कही बाहर जाना हो तो बस का किराया डीजल से इतना है कि बस में बैठने से, बस, करना पड़ता है और वापस घर आओ तो श्रीमती कहती है गैस की टंकी का नंबर लगा देना ,दुर्गंध मारने लग गई है। टंकी गई तो इंडक्शन चलाने पर बिजली का बिल भी तिल का ताड हो जाएगा ।इस पर मैंने कहा गैस की टंकी की दुर्गंध तो तब से आ रही है जब तीन सौ चार सौ सेषहजार तक पहुंच गई थी । अरे यह सरकार है जिसने ठोस, द्रव गैस तीनों को महंगाई के पाश में जकड़ लिया है ।ठोस में शक्कर, द्रव में पेट्रोल डीजल और तेल और गैस में घरेलू गैस की महंगाई इतनी है कि इस महंगाई का,, गेस ,,लगाना भी मुश्किल हो गया है ।वे बोले महंगाई लोगों की कमर तोड़ रही है और सरकार जीडीपी बढ़ने से महंगाई का आकलन कर कह रही है कि महंगाई कहां बढ़ी है। इस पर नारायण सिंह जी बोले गरीबी, महंगाई, महंगी, भूखमरी ,बेरोजगारी ,महंगी शिक्षा ,महंगा इलाज और गरीबों का शोषण इन सब पर सरकार इन्हें कम करने और सुविधा देने पर सरकती नहीं है ।
इस बीच हिंदी के रिटायर्ड प्रोफेसर मदनलाल बोले महंगाई इतनी बेशर्म तरीके से बढ़ी है की पुरानी महंगाई की कहावतें दोहे, पैरोडी, फिल्मी गाने, शायरी तक शर्माने लगी हैं ।महंगाई पहले कहावत में कमर तोड़ती है अब तो वह आम आदमी की हड्डी पसली भी तोड़ने पर उतारू है। शकर के भाव इतने बढ़ गए है कि मिठाई दुकानों के पकवान फीके लगने लगे हैं । महंगाई पहले तिल के ताड़ बनाती है अब तो हर एक वस्तु की महंगाई के झाड़ पनप रहे हैं। राई के पर्वत को महंगाई को सुरसा के मुंह बढ़ने जैसी महंगाई ने राई के परवत बना दिए है ।हर आम आदमी, गरीब गृहस्थ बाजार में खड़ा है और महंगाई इधर-उधर वस्तुओं में दबे पांव आकर अपना रुतबा बता रही है । इसी कारण अच्छे दिन भी महंगाई ने महंगे कर दिए हैं इसलिए किसी ने कहा है कि ,,महंगाई का दौर है साहब रिश्ते अब सिर्फ मुनाफा देखते हैं।
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