जब कोई कहता है कि “आज अष्टमी है”, तो आधुनिक मन तुरंत उलझ जाता है। उसे लगता है कि अष्टमी कोई धार्मिक शब्द है, शायद किसी व्रत या पूजा से जुड़ा हुआ। वह उसे उसी मानसिक दराज़ में रख देता है जहाँ शुभ–अशुभ, मुहूर्त और पंडित बैठते हैं। लेकिन असल समस्या अष्टमी में नहीं, हमारी समझ में है। क्योंकि अष्टमी कोई आस्था नहीं है, अष्टमी एक मापन है।
हमने समय को मापने के लिए दिन को आधार मान लिया है—चौबीस घंटे का एक गोल टुकड़ा। सूरज उगा, दिन शुरू हुआ; सूरज डूबा, दिन समाप्त। यह सौर दिन है। ग्रेगोरियन कैलेंडर इसी सौर दिन पर खड़ा है। लेकिन पंचांग का आधार यह नहीं है। पंचांग समय को दिन से नहीं, गति से मापता है।
यहीं से तिथि का जन्म होता है।
तिथि को अगर अंग्रेज़ी के “डेट” में अनुवाद करने की कोशिश की जाए, तो भ्रम पैदा होना तय है। क्योंकि तिथि का कोई अंग्रेज़ी समानार्थक शब्द है ही नहीं। तिथि एक पूरी तरह भारतीय अवधारणा है, और पूरी तरह वैज्ञानिक भी। तिथि का अर्थ है—सूर्य और चंद्रमा के बीच कोणीय दूरी का एक निश्चित मान।
अब इसे धीरे-धीरे समझिए।
आकाश में सूर्य और चंद्र दोनों गतिमान हैं। पृथ्वी से देखने पर चंद्रमा हर दिन सूर्य के सापेक्ष अपनी स्थिति बदलता है। जब चंद्रमा सूर्य से बिल्कुल एक ही दिशा में होता है, तो अमावस्या होती है। जब वह ठीक विपरीत दिशा में होता है, तो पूर्णिमा। इस पूरे चक्र में चंद्रमा सूर्य के सापेक्ष 360 डिग्री का कोणीय भ्रमण करता है।
अब प्रश्न यह है कि इस 360 डिग्री को कैसे बाँटा जाए?
पंचांग का उत्तर बड़ा सुंदर है—इसे 30 बराबर हिस्सों में बाँट दो।
360 डिग्री को 30 से भाग दीजिए, तो एक हिस्सा बनता है 12 डिग्री का। यही एक तिथि है। जैसे ही चंद्रमा सूर्य से 12 डिग्री आगे बढ़ता है, एक तिथि पूर्ण हो जाती है। अगले 12 डिग्री पर दूसरी तिथि, फिर तीसरी—और इस तरह 30 तिथियों में पूरा चंद्रमास।
यानी तिथि समय नहीं, कोण है।
घंटे नहीं, डिग्री।
यही कारण है कि तिथि कभी सुबह पाँच बजे बदलती है, कभी दोपहर में, कभी रात को। क्योंकि चंद्रमा की गति स्थिर नहीं है। वह कभी तेज चलता है, कभी धीमा। इसलिए तिथि का अंत और आरंभ 24 घंटे की घड़ी से बँधा नहीं है। और यहीं से वह भ्रम पैदा होता है कि “आज तिथि दो बार क्यों पड़ गई” या “आज तिथि गायब क्यों हो गई”।
असल में तिथि न तो दो बार पड़ती है, न गायब होती है। वह बस हमारी घड़ी से मेल नहीं खाती।
यह समझना बहुत ज़रूरी है कि पंचांग में जिसे हम दिन कहते हैं, वह भी दो प्रकार का होता है। एक होता है सौर दिन—सूर्योदय से अगले सूर्योदय तक। दूसरा होता है तिथि—चंद्र और सूर्य के बीच 12 डिग्री की दूरी तक की अवधि। जब हम इन दोनों को एक ही समझ लेते हैं, तब समस्या पैदा होती है।
इसीलिए दीपावली कभी शाम को खत्म होती है, कभी सुबह। इसीलिए दशमी कभी सूर्योदय के बाद तक रहती है, कभी पहले ही समाप्त हो जाती है। यह पंचांग की गड़बड़ी नहीं है, यह उसकी ईमानदारी है। वह प्रकृति के साथ समझौता नहीं करता, हमारी घड़ी से नहीं।
अब ज़रा सोचिए—अगर कोई कहता है “पौष शुक्ल अष्टमी”, तो वह क्या सूचना दे रहा है?
वह बता रहा है कि चंद्रमा सूर्य से लगभग 84 से 96 डिग्री की दूरी पर है। यह कोई अनुमान नहीं, सीधा गणित है। आप चाहें तो किसी भी आधुनिक एस्ट्रोनॉमी सॉफ्टवेयर में इसे जाँच सकते हैं। वही परिणाम मिलेगा। यानी हजारों साल पहले जिस गणना को शब्दों में बाँधा गया, वह आज भी खगोलशास्त्र के सॉफ्टवेयर से मेल खाती है।
अब यहाँ एक और दिलचस्प बात समझिए। पंचांग केवल चंद्र को नहीं देखता। वह सूर्य को भी उतनी ही गंभीरता से लेता है। इसलिए वह न पूरी तरह चंद्र कैलेंडर है, न पूरी तरह सौर। वह दोनों का संतुलन है—लूनी-सोलर कैलेंडर।
यही कारण है कि पंचांग में अधिक मास आता है।
चंद्र वर्ष लगभग 354 दिन का होता है, जबकि सौर वर्ष लगभग 365 दिन का। हर साल लगभग 11 दिन का अंतर पड़ता है। अगर इस अंतर को न सुधारा जाए, तो ऋतुएँ खिसकने लगेंगी। पर्व धीरे-धीरे गर्मी से सर्दी में और सर्दी से बारिश में चले जाएँगे। पंचांग इस अंतर को पहचानता है और हर कुछ वर्षों में एक अतिरिक्त मास जोड़कर सूर्य और चंद्र को फिर से तालमेल में ले आता है।
यह कोई अव्यवस्था नहीं, बल्कि अत्यंत सूक्ष्म व्यवस्था है।
विडंबना यह है कि हम इसी को “कन्फ्यूज़िंग” कहते हैं, और उस कैलेंडर को “साइंटिफिक” मानते हैं जिसमें फरवरी कभी 28 दिन की होती है, कभी 29, और उसका कारण केवल एक मोटा-सा 1/4 का अनुमान है।
तिथि हमें यह सिखाती है कि समय को देखने के दो तरीके हो सकते हैं—एक घड़ी से, दूसरा आकाश से। आधुनिक दुनिया ने पहला तरीका चुना है, भारतीय परंपरा ने दूसरा। दोनों उपयोगी हैं, लेकिन दोनों एक नहीं हैं।
जब तक हम तिथि को “डेट” समझते रहेंगे, पंचांग जटिल लगता रहेगा। लेकिन जिस दिन हम समझ लेंगे कि तिथि दरअसल एक खगोलीय भाषा है, उस दिन पंचांग अचानक सरल, तार्किक और बेहद सुंदर हो जाएगा।
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