वैलेंटाइन डे: एक भारतीय परिप्रेक्ष्य
क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद कम हो रहा है?
अभी सुबह-सुबह, डेस्कटॉप के की-बोर्ड पर उँगलियाँ ऐसे थिरक रही थीं मानो मैं कोई महान साहित्यिक क्रांति रच रहा हूँ। स्मृतियों के उल्टे-सीधे पन्नों को करीने से जमाकर स्क्रीन पर उकेर ही रहा था कि रसोईघर से धर्मपत्नी की वह शाश्वत, कालजयी और निरंकुश अलोकतांत्रिक आवाज़ गूँजी—
“नाश्ता ठंडा हो रहा है!”
और उसके पीछे हल्का-सा व्यंग्य तीर की तरह—
“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?”
मैंने अपने भीतर बैठे विवेक को जो अपने आपको ज्ञानपीठ पुरस्कार विजेता मानता है को जगाया और आत्मविश्वास से कहा—
“हाँ, बिल्कुल याद है! फरवरी का दूसरा वीक चल रहा है… बजट अभी पारित हुआ है ।
बसंत पंचमी अभी अभी गई है । मार्च क्लोजिंग आने वाली है । कोई शक?”
पत्नी ने जो दृष्टि मुझ पर डाली, वह किसी एक्स-रे मशीन से कम नहीं थी। उस एक नज़र में यह स्पष्ट हो गया कि मेरी जानकारी उतनी ही उपयोगी है जितना संसद में विपक्ष का माइक।
“वैलेंटाइन वीक चल रहा है,” उन्होंने शब्दों को चबा-चबाकर कहा, मानो मैं कक्षा पाँच का छात्र हूँ जिसने गृहकार्य करना भूल गया हो।
मैंने तत्काल अपनी डिफॉल्ट नासमझी पर खेद प्रकट किया। तुरंत एक सर्व-उपयोगी अभिवादन उछाल दिया—“हैप्पी… जो भी आज है!” और नाश्ते की टेबल की ओर ऐसे बढ़ा जैसे अपराधी जमानत पर बाहर आया हो।
टेबल पर जो दृश्य था, वह किसी पाक-कला प्रतियोगिता का फाइनल राउंड लग रहा था। “विशेष वैलेंटाइन डिश” मेरे सामने ससम्मान रखी गई। दिल के आकार की—इतनी परिपूर्ण कि मुझे अपने धड़कते दिल पर संदेह होने लगा। साथ में आलू की लंबी-लंबी चिप्स—जिन्हें हम भारतीय अपनी ही भूमि पर विदेशी पासपोर्ट देकर “फ्रेंच फ्राइज़” कहकर सम्मानित करते हैं।
लेकिन असली ट्विस्ट तो तब दिखा जब मैंने देखा—डिश के एक कोने में माचिस की तीलियाँ भी ससम्मान घुसी हुई थीं!
मैंने क्षण भर को सोचा—क्या यह प्रेम का प्रतीक है या युद्ध की घोषणा? कहीं यह “दिल जले तो जले” थीम पर आधारित कोई प्रायोगिक व्यंजन तो नहीं?
पत्नी ने गर्व से बताया—“स्पेशल है। खुद बनाया है।”
मैंने मन ही मन अपनी स्वाद-कलिकाओं को सेना की तरह सजग किया। ऐसा लग रहा था मानो यह कोई “फटने वाला स्वाद बम” है, जो मेरी जिह्वा पर अपना अग्निपरीक्षा अभियान शुरू करेगा। माचिस की तीलियाँ शायद सजावट थीं, या संकेत कि अगर स्वाद फीका लगे तो खुद आग लगा लेना।
पहला कौर मुँह में रखा। स्वाद ने जैसे मेरे अंदर छुपे सारे पुराने वादे याद दिला दिए। मैं मुस्कराया—वह मुस्कान जो पति वर्षों के अनुभव से सीखता है—जिसमें सच्चाई, डर और कूटनीति तीनों का संतुलन हो।
“कैसा है?” पत्नी ने पूछा।
यह वह क्षण था जहाँ मेरा जवाब राष्ट्रों का भविष्य बदल सकता है। मैंने तुरंत उत्तर दिया—
“दिल से बनाया है, स्वाद भी दिल को छू रहा है।”
पत्नी की भौंहें थोड़ी ढीली हुईं। मैंने राहत की साँस ली।
यह वैलेंटाइन वीक भी अजीब चीज़ है। कभी रोज़ डे, कभी प्रपोज़ डे, कभी चॉकलेट डे। शादी के बाद वैलेंटाइन के लिए घर की बनी एक अदद रेसिपी खिला देना ही क्या प्यार का सबसे सच्चा इज़हार नहीं हो सकता? फूल मुरझा जाते हैं, चॉकलेट पिघल जाती है, लेकिन रसोई में पसीने से बना प्रेम—वह सीधे पेट के रास्ते दिल तक पहुँचता है।
प्रेम वाकई अब कैलेंडर की तारीख़ों पर निर्भर हो गया है। जैसे बिजली का बिल—समय पर जमा नहीं किया तो कटौती तय। एक दिन भूल जाइए, तो अगले तीन दिन तक ताने की सप्लाई बिना रुकावट जारी रहती है।
मैंने प्लेट में रखी बाकी दिलदार डिश को देखा। विवाह भी कुछ ऐसा ही तो है—ऊपर से फ्रेंच फ्राइज़ जैसा कुरकुरा, भीतर से तीखा-मीठा मिश्रण, और कभी-कभी तीलियों जैसा विस्फोटक तत्व भी मौजूद। फर्क बस इतना है कि यहाँ हर विस्फोट के बाद समझौते की फायर ब्रिगेड भी घर में ही उपलब्ध रहती है।
पत्नी ने अगला वाक्य छोड़ा—
“आज शाम बाहर चलेंगे… वैलेंटाइन स्पेशल।”
मैंने मन में बैंक बैलेंस की स्मृति को प्रणाम किया। फरवरी का महीना वैसे ही कर-कटौती और स्कूल फीस से जर्जर रहता है। लेकिन प्रेम दिवस है, तो भले ही ईएमआई पर ही मनाना पड़े—मनाना तो पड़ेगा। आखिर विवाह नामक संस्था में भावनाएँ नकद नहीं, किश्तों में चुकानी पड़ती हैं।
मैंने आखिरी फ्रेंच फ्राइज़ उठाई और मुस्कराकर अपना आखिरी और एकमात्र कामदेव का बाण छोड़ा—
“देखो, मुझे तो हर वीक तुम्हारे साथ वैलेंटाइन वीक ही लगता है…।”
पत्नी ने हल्की-सी मुस्कान दी। वह मुस्कान किसी सरकारी योजना की तरह थी—कम दिखती है, पर जब मिलती है तो राहत देती है।
और मैं समझ गया—इस “स्वाद बम” का विस्फोट सफल रहा। जिह्वा जली नहीं, संबंध गरम हुए हैं—वो भी नियंत्रित तापमान पर।
की-बोर्ड पर लिखी जा रही स्मृतियाँ अब रसोई की भाप से मिल चुकी थीं। स्क्रीन पर शब्द थे, जीवन—दोनों के बीच संतुलन साधता हुआ—अपने ढंग से मुस्करा रहा था।
अब हास-परिहास से हटकर ज़रा गंभीर विचार करते हैं। वैलेंटाइन डे का वह उन्माद, जो कभी हमारे देश के दिशाहीन, कर्महीन युवा वर्ग के दिलों पर छा जाया करता था, अब फीका पड़ता जा रहा है। लगभग सभी लोग इसे भूल चुके हैं।
अब फेसबुक टाइमलाइन पर उन अनगिनत संदेशों की भरमार नहीं दिखती, जो इस सप्ताह के उन्माद में लाल रंग के दिलों की धड़कती धड़कनों वाले इमोजी और प्रेम-महाकाव्य से उद्धृत अनमोल रचनाओं से भर जाते थे। कभी-कभी तो ये रचनाएँ कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् को भी एक बार तेजहीन कर देती थीं और पूरा टाइमलाइन क्रैश करने की स्थिति में आ जाता था!
जितनी चॉकलेट पूरे देश में सालभर में बिकती, उससे अधिक की खपत अकेले फेसबुक टाइमलाइन में एक दिन में हो जाती थी। लेकिन अब यह दीवानगी शायद धूमिल पड़ गई है।
बाजार भी अब समझ चुका है कि इस युवा वर्ग का रुख बदल चुका है। वे पश्चिमी संस्कृति के इस भंवर-जाल में अब उनके मार्केटिंग मोहरे नहीं बन सकते। यह सदियों पुरानी परंपराओं को अपनाने का एक सकारात्मक संकेत है, जो हमारी जड़ों की ओर एक बदलाव को दर्शाता है।
दिलचस्प बात यह है कि साल दर साल यह तथाकथित “जीवंत त्योहार” और भी निरर्थक होता दिख रहा है। बसंत पंचमी भी लगभग इसी समय आती है, जो शायद एक मजबूत, नवीनीकृत भारत की ओर बढ़ने का संकेत है। एक ऐसा भारत, जहां पारंपरिक त्योहार सांस्कृतिक गौरव के साथ प्रेम का मिश्रण करते हुए अपने आकर्षण और महत्व को पुनः प्राप्त कर रहे हैं।
तो इस बार क्या मनाएँगे—वैलेंटाइन डे या बसंत पंचमी?
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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