वैलेंटाइन डे: एक भारतीय परिप्रेक्ष्य
क्या भारत में वैलेंटाइन डे का उन्माद कम हो रहा है?
अभी सुबह, डेस्कटॉप के की-बोर्ड की लेखनी से कुछ उलटे-सीधे स्मृतियों के पन्नों को करीने से व्यवस्थित करते हुए, डेस्कटॉप स्क्रीन पर उकेर ही रहा था कि रसोई से धर्मपत्नी की स्वाभाविक आवाज में नाश्ते के लिए बुलावा आ गया। साथ ही, एक कटाक्ष भरा वाक्य भी सुनने को मिला—
“पता है, कौन सा वीक चल रहा है?”
मैंने भी अपनी डिफॉल्ट आवाज में खुश होते हुए अपनी जानकारी उँड़ेल दी—
“हाँ, याद है! फरवरी का दूसरा वीक चल रहा है, कोई शक?”
एक संशय भरी नज़रों से मैंने देखा तो पाया कि पत्नी के चेहरे के भाव मेरे जवाब से संतुष्ट नहीं होकर और बिगड़ गए थे। मुझे याद दिलाया गया कि वैलेंटाइन वीक चल रहा है। मैंने अपनी डिफॉल्ट नासमझी पर खेद व्यक्त करते हुए तुरंत इस अवसर के लिए बना-बनाया डिफॉल्ट अभिवादन किया और नाश्ते की टेबल की ओर कदम बढ़ा दिए। पता चला कि पत्नी ने इस सप्ताह को अपने अंदाज़ से यादगार बनाने के लिए कुछ विशेष व्यंजन तैयार किया है।
“विशेष वैलेंटाइन डिश” मेरे सामने टेबल पर परोसी गई, जो कलात्मक रूप से दिल के आकार की बनी हुई थी। साथ में आलू की लंबी-लंबी चिप्स थीं, जिन्हें अभारतीय सभ्यता में कुछ लुभावने नाम—फ्रेंच फ्राइज़—से संबोधित किया जाता है। एक ट्विस्ट इस डिश में और भी था—माचिस की तीलियाँ भी इस डिश के एक कोने में घुसी हुई थीं!
लग रहा था, यह कोई मज़बूत “फटने वाला स्वाद बम” है, जो निश्चित ही मेरी जिह्वा पर अपने जलवे से अग्नि प्रज्वलित करने वाला है। मैंने अपनी स्वाद कलिकाओं को इस संभावित विस्फोट के लिए पहले ही तैयार कर लिया।
अब थोड़ा गहराई से सोचते हैं…
अब हास-परिहास से हटकर ज़रा गंभीर विचार करते हैं। वैलेंटाइन डे का वह उन्माद, जो कभी हमारे देश के दिशाहीन, कर्महीन युवा वर्ग के दिलों पर छा जाया करता था, अब फीका पड़ता जा रहा है। लगभग सभी लोग इसे भूल चुके हैं।
अब फेसबुक टाइमलाइन पर उन अनगिनत संदेशों की भरमार नहीं दिखती, जो इस सप्ताह के उन्माद में लाल रंग के दिलों की धड़कती धड़कनों वाले इमोजी और प्रेम-महाकाव्य से उद्धृत अनमोल रचनाओं से भर जाते थे। कभी-कभी तो ये रचनाएँ कालिदास रचित अभिज्ञान शाकुंतलम् को भी एक बार तेजहीन कर देती थीं और पूरा टाइमलाइन क्रैश करने की स्थिति में आ जाता था!
जितनी चॉकलेट पूरे देश में सालभर में बिकती, उससे अधिक की खपत अकेले फेसबुक टाइमलाइन में एक दिन में हो जाती थी। लेकिन अब यह दीवानगी शायद धूमिल पड़ गई है।
बाजार भी अब समझ चुका है कि इस युवा वर्ग का रुख बदल चुका है। वे पश्चिमी संस्कृति के इस भंवर-जाल में अब उनके मार्केटिंग मोहरे नहीं बन सकते। यह सदियों पुरानी परंपराओं को अपनाने का एक सकारात्मक संकेत है, जो हमारी जड़ों की ओर एक बदलाव को दर्शाता है।
दिलचस्प बात यह है कि साल दर साल यह तथाकथित “जीवंत त्योहार” और भी निरर्थक होता दिख रहा है। बसंत पंचमी भी लगभग इसी समय आती है, जो शायद एक मजबूत, नवीनीकृत भारत की ओर बढ़ने का संकेत है। एक ऐसा भारत, जहां पारंपरिक त्योहार सांस्कृतिक गौरव के साथ प्रेम का मिश्रण करते हुए अपने आकर्षण और महत्व को पुनः प्राप्त कर रहे हैं।
तो इस बार क्या मनाएँगे—वैलेंटाइन डे या बसंत पंचमी?
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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