वैलेंटाइन घाट पर ढेंचू-ढेंचू प्रेमकथा
फरवरी की गुलाबी ठंडक थी। नदी किनारे वाले पुराने घाट का नाम इन दिनों बदलकर “वैलेंटाइन घाट” पड़ गया था। वजह यह कि गाँव के प्रेमी युगल अब वहीं आकर मोबाइल में रील बनाते, गुलाब पकड़ाते और प्रेम का भोंडा प्रदर्शन करते। घाट की सीढ़ियाँ, जो कभी कपड़े धोने और धूप सेंकने के काम आती थीं, अब दिल के आकार वाले पोज़ और “लव यू जान” की गूँज से आबाद थीं।
इसी घाट पर एक गधा और गधी भी आया करते थे। यूँ तो संतों को जैसे कहाँ सीकरी सू काम”, वैसे ही इन गधों को भी इनसानी झमेलों से क्या काम! वे चुपचाप अपनी गधा-पच्चीसी में मग्न रहते। कहने का मतलब—पूरे के पूरे गधे थे। गधा, जो पेशे से धोबी का सर्वहारा श्रमिक था, सुबह से कपड़ों की गठरी ढो-ढोकर गधों के वंश में अपना नाम अमर कर चुका था। उसका नाम था “ढेंचूराम”। और गधी—जिसे पूरे गाँव में “गुलबदन ढेंचू” कहा जाता था—वह भी साथ आती, काम में हाथ बँटाती।
लेकिन एक दिन गुलबदन ने काम से ध्यान हटाकर घाट पर आए प्रेमी जोड़ों को देखने की ठान ली। न जाने कहाँ से उसके गधीपन में इंसानी गुण आ गए। वह चुपके-चुपके ताक-झाँक करने लगी। उसने देखा कि आज घाट पर कुछ ज्यादा ही प्रेम उमड़ा हुआ है। वह ढेंचूराम के पास गई, उसका बोझ उतरवाते हुए प्रेम में अपना पूर्ण गधीत्व प्रदर्शित करती हुई गायन के समवेत स्वर में पूछ बैठी—“ए जी, ओ जी ,सुनो जी आज कोई त्योहार है क्या? घाट पर जबरदस्त भीड़ है!”
ढेंचूराम ने पसीना पोंछते हुए कहा—“अरी, तू क्यों इन इंसानों के ख़ट-कर्म में अपना ध्यान भटकाती है? ये इंसानी लोचे हैं। इन पर ध्यान मत लगा, अपना काम कर।अगर घर पहुँचने में लेट हो गए तो मालिक का डंडा पड़ेगा। आज चारा कम खिलाएगा ससुरा सो अलग ! और देख तू हैं पेट से..अगर कहीं गलत जगह ठोका ठाकी कर दी तेरी न तो बड़ी मुश्किल हो जायेगी l ”
पर गुलबदन नहीं मानी। तिरिया हठ जी l आखिर ढेंचूराम को बताना पड़ा—“कुछ वैलेंटाइन डे जैसा मना रहे हैं सब।”
“ए जी, हम भी मनाएँगे वैलेंटाइन!” गुलबदन ने ठुनकते हुए घोषणा की।
ढेंचूराम ने कान हिलाए, पूँछ से मक्खी हटाई और गंभीर स्वर में बोला—“देखो गधेश्वरी, हम गधे हैं। हमारा काम धोबी की गठरी उठाना, दुलत्ती झाड़ना और सुबह शाम ढेंचू-ढेंचू करना है।यही काम हामरे पुरखे करती आये और यही हमें सिखाया भी है l ये रोज डे-प्रपोज डे हमारे बस का चारा नहीं। मैं कह रहा हूँ, अपना ध्यान मत भटका। फिर हम इतने गए गुजरे गधे भी नहीं की प्रेम प्रदर्शन में इन इंसानी ताम झाम का सहारा लें l बता कहाँ कमी मेरे प्यार में ? इसी के साथ गधे ने प्यार से गधी के पेट में पल रहे बच्चे की तरफ इशारा किया l ”
गधी थोड़ी शर्मा गयी l लेकिन आज इस बहाने गधे के प्रेम की परिक्षा भी हो जाए यही सोचकर गधी ने वापस अपना पैंतरा बदला l
गुलबदन ने नाक फुलाते हुए कहा—“दस बरस हो गए साथ ढोते-ढोते। तुमने कभी मेरे लिए घास का हार तक नहीं बनाया। मुझे तो संदेह है कि तुम सामने वाली चरवाही गधी से चुपचाप ढेंचू-वार्ता करते हो!”
ढेंचूराम चौंका—“अरे, मुझे तो लगता है किसी इंसान से तुम्हारा चक्कर चल रहा है! तभी आजकल इंसानों जैसा शक करने लगी हो!”
इतने में घाट की सीढ़ियों पर धोबी प्रकट हुआ—कंधे पर गीले कपड़ों की गठरी, चेहरे पर साजिशी मुस्कान। उसने देखा कि गधा-गधी दोनों काम छोड़कर पास में कानाफूसी कर रहे हैं। “कामचोर कहीं के! अच्छा, मैं लेता हूँ खबर।”
वह गरजा—“ओए ढेंचूराम!” एक लाठी गधे की कमर पर पड़ते-पड़ते बची। ढेंचूराम देर तक ढेंचू-ढेंचू का विलाप करता रहा। इधर गधी मौके की नजाकत समझ करवहां से खिसक ली l
भला हो धोबी का—उसने एक बड़ा काम किया। कम से कम दो गधों को इंसान बनने से रोक दिया। अब गधा इतना भी गधा नहीं कि मालिक की बात न समझे। इंसानों पर यह वश नहीं चलता। वहाँ अगर कोई गधा बनना चाहे, तो कोई माई का लाल उन्हें रोक नहीं सकता।
— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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