विकास की कहानी को अगर केवल एक चूहे, एक जीन या एक प्रयोगशाला की मेज़ तक सीमित कर दिया जाए, तो वह कहानी अधूरी रह जाती है। जीवन की वास्तविक गाथा हमेशा समूह, परिस्थिति और समय के संग लिखी जाती है। यहीं से वह विचार जन्म लेता है —कि क्या परिवर्तन केवल व्यक्तिगत होते हैं या उनका स्रोत और भविष्य सामूहिक होता है। इसी धारा में यदि हम एपिजेनेटिक्स, सोशल स्पीशीज़ (चींटियाँ, मधुमक्खियाँ) और मानव समाज व सांस्कृतिक विकास को एक साथ जोड़ें, तो विकासवाद एक सूखा जैविक सिद्धांत नहीं, बल्कि एक जीवंत सामाजिक-दर्शन बन जाता है।
उन्नीसवीं सदी में Jean-Baptiste Lamarck ने यह कहकर साहस किया था कि जीवन के अनुभव अगली पीढ़ी में पहुँच सकते हैं। उनका समय विज्ञान के लिए अपरिपक्व था, इसलिए उनके विचारों को बाद में August Weismann जैसे वैज्ञानिकों ने प्रयोगों के आधार पर खारिज कर दिया। वाइसमैन का चूहा प्रयोग—जहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी पूँछ काटने पर भी पूँछवाले चूहे पैदा होते रहे—यह सिद्ध करता है कि कटना या अभ्यास सीधे जीन नहीं बदलता। पर यह प्रयोग भी एक सीमा तक ही सत्य था। उसने यह तो बताया कि acquired traits सीधे inherit नहीं होते, लेकिन यह नहीं बताया कि परिस्थिति जीन के व्यवहार को कैसे बदलती है।
यहीं से आधुनिक विज्ञान हमें एपिजेनेटिक्स की ओर ले जाता है। एपिजेनेटिक्स यह नहीं कहता कि डीएनए का अक्षर बदल गया, बल्कि यह बताता है कि उसी अक्षरमाला को पढ़ने का ढंग बदल सकता है। तनाव, भूख, तापमान, विषैले तत्व, सामाजिक दबाव—ये सब जीन के “ऑन” या “ऑफ” होने को प्रभावित कर सकते हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि ऐसे एपिजेनेटिक परिवर्तन कभी-कभी अगली एक-दो पीढ़ियों तक पहुँच भी जाते हैं। यानी लेमार्क पूरी तरह गलत नहीं थे, बस उनकी भाषा उस समय के विज्ञान से आगे थी। यहाँ परिवर्तन किसी एक जीव की इच्छा से नहीं, बल्कि पूरे समूह पर पड़े साझा दबाव से आकार लेता है।

अब यदि हम सोशल स्पीशीज़—जैसे चींटियाँ और मधुमक्खियाँ—की ओर देखें, तो यह सामूहिकता और भी स्पष्ट हो जाती है। एक अकेली चींटी लगभग कुछ भी नहीं है; उसका अस्तित्व, उसकी भूमिका, उसकी “बुद्धि” कॉलोनी से अलग सोचने पर अर्थहीन हो जाती है। रानी चींटी, सैनिक, श्रमिक—सभी का डीएनए लगभग समान होता है, फिर भी उनका व्यवहार और शरीर रचना अलग-अलग होती है। यह अंतर जीन से नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संकेतों और सामाजिक ज़रूरतों से पैदा होता है। भोजन का प्रकार, हार्मोनल सिग्नल, कॉलोनी की आवश्यकता—यही तय करते हैं कि कौन रानी बनेगी और कौन श्रमिक। यहाँ विकास व्यक्ति के स्तर पर नहीं, बल्कि पूरे समुदाय के हित में काम करता है।
मधुमक्खियों का छत्ता तो मानो “collective intelligence” का जीवित उदाहरण है। कोई केंद्रीय तानाशाह नहीं, फिर भी पूरा छत्ता निर्णय लेता है—कहाँ भोजन मिलेगा, कब स्थान बदला जाएगा, किसे क्या काम करना है। यह चेतना किसी एक मधुमक्खी के दिमाग में नहीं, बल्कि उनके आपसी संवाद और साझा अनुभव में बसती है। जैविक स्तर पर देखें तो यह भी जीन म्यूटेशन की कहानी नहीं, बल्कि जीन की अभिव्यक्ति और चयन की सामूहिक प्रक्रिया है। जो व्यवहार कॉलोनी को बचाता है, वही पीढ़ियों तक टिकता है।
अब यही धारा जब मानव समाज में प्रवेश करती है, तो उसे हम सांस्कृतिक विकास कहते हैं। मनुष्य में जैविक विकास अपेक्षाकृत धीमा है, लेकिन सांस्कृतिक विकास अत्यंत तेज़। भाषा, औज़ार, परंपराएँ, नैतिकता, ज्ञान—ये सब जीन में नहीं, संस्कृति में संचरित होते हैं। फिर भी यह संस्कृति जीन से पूरी तरह अलग नहीं है। समाज का ढाँचा, भोजन, तनाव, युद्ध, शांति—ये सभी हमारे शरीर और मस्तिष्क पर असर डालते हैं। आधुनिक शोध यह दिखा रहे हैं कि दीर्घकालिक सामाजिक तनाव या अभाव मानव समुदायों में भी एपिजेनेटिक बदलाव ला सकता है, जो अगली पीढ़ी के स्वास्थ्य और व्यवहार को प्रभावित करता है।
यहीं मूल विचार और गहराता है—कि mutation अकेले व्यक्ति की कहानी नहीं है। कोई जीन परिवर्तन किसी एक इंसान या एक चूहे में हो सकता है, लेकिन उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह परिवर्तन समुदाय की परिस्थितियों में कितना उपयोगी है। यदि वह उपयोगी है, तो वह cross breeding या सामाजिक चयन के ज़रिये फैलता है। यदि नहीं, तो वह इतिहास के अंधेरे में खो जाता है। इस अर्थ में विकास न तो पूरी तरह यादृच्छिक है, न पूरी तरह नियोजित—वह परिस्थितियों के साथ एक संवाद है।

इस पूरी यात्रा में “collective consciousness” शब्द को वैज्ञानिक सावधानी के साथ समझना चाहिए। जीवविज्ञान यह नहीं कहता कि कोई रहस्यमय सामूहिक आत्मा जीन बदलती है। लेकिन यह अवश्य मानता है कि सामूहिक परिस्थितियाँ, साझा दबाव और सामाजिक संरचनाएँ—जीन की अभिव्यक्ति, चयन और प्रसार को दिशा देती हैं। यही कारण है कि विकासवाद को केवल प्रयोगशाला की दीवारों में कैद करना उसके साथ अन्याय है।
अंततः, चाहे वह चूहों का प्रयोग हो, चींटियों की कॉलोनी हो या मानव सभ्यता का इतिहास—विकास की धारा हमेशा व्यक्ति से निकलकर समुदाय में बहती है। जीन बीज हैं, पर मिट्टी, मौसम और बाग़ पूरा समाज होता है। बीज अकेले कुछ नहीं कर सकता; फल तभी आता है जब पूरी व्यवस्था उसके अनुकूल हो। यही वह बिंदु है जहाँ लेमार्क, वाइसमैन, एपिजेनेटिक्स, सोशल स्पीशीज़ और मानव संस्कृति—सब एक ही कहानी के अलग-अलग अध्याय बन जाते हैं।
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