शक संवत और विक्रम संवत : दो घड़ियाँ, एक सभ्यता की

शक संवत और विक्रम संवत : दो घड़ियाँ, एक सभ्यता की

हम अक्सर तारीख़ देखते हैं, पर तारीख़ के पीछे छिपी बुद्धि को नहीं देखते। दीवार पर टंगा कैलेंडर हमें बस इतना बताता है कि आज कौन-सी तारीख़ है; लेकिन यह बहुत कम लोग सोचते हैं कि यह तारीख़ बनी कैसे, और एक देश में एक से अधिक संवत एक साथ क्यों चलते हैं। यहीं से वह जिज्ञासा जन्म लेती है, जो कई बार विवाद का रूप भी ले लेती है—जब हमारे अधिकांश धार्मिक पर्व-त्योहार विक्रम संवत के हिसाब से तय होते हैं, तो भारत ने राष्ट्रीय कैलेंडर के रूप में शक संवत को क्यों अपनाया? क्या यह केवल राजनीतिक फैसला था, या इसके पीछे कोई व्यावहारिक और वैज्ञानिक सोच भी थी? इस प्रश्न का उत्तर थोड़ा धैर्य मांगता है, क्योंकि कैलेंडर केवल पन्नों का बंडल नहीं, समय को साधने की मनुष्य की सबसे पुरानी कोशिश है।

सबसे पहले एक सरल बात समझ लीजिए—दुनिया के लगभग सभी कैलेंडर दो आकाशीय गतियों पर टिके होते हैं: सूर्य और चंद्रमा। सूर्य के आधार पर वर्ष समझ में आता है, क्योंकि पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। चंद्रमा के आधार पर महीना समझ में आता है, क्योंकि चंद्रमा पृथ्वी के चारों ओर घूमता है और उसके घटने-बढ़ने से अमावस्या, पूर्णिमा, शुक्ल पक्ष, कृष्ण पक्ष जैसी स्थितियाँ बनती हैं। अब समस्या यह है कि सूर्य का वर्ष और चंद्रमा के बारह महीने आपस में बिल्कुल बराबर नहीं बैठते। यही असमानता कैलेंडर विज्ञान की असली शरारत है। मनुष्य ने समय को समझने की कोशिश की, तो उसे पता चला कि आकाश बहुत अनुशासित है, पर मनुष्यों की सुविधा के हिसाब से नहीं चलता। इसी असमानता को संभालने के लिए कहीं शुद्ध सौर कैलेंडर बने, कहीं शुद्ध चंद्र कैलेंडर, और कहीं लूनी-सोलर अर्थात चंद्र-सौर कैलेंडर।

विक्रम संवत मूलतः एक लूनी-सोलर परंपरा से जुड़ा संवत है—अर्थात इसमें चंद्रमास भी है, तिथियाँ भी हैं, पक्ष भी हैं, और साथ ही वर्ष को ऋतुओं से जोड़े रखने का प्रयास भी है। इसी कारण इसमें अधिक मास जैसी व्यवस्था आती है। साधारण भाषा में कहें तो चंद्रमा के हिसाब से 12 महीने पूरे कर लेने पर वर्ष, सूर्य-वर्ष से लगभग 11 दिन छोटा पड़ जाता है। अगर इसे यूँ ही छोड़ दिया जाए, तो कुछ वर्षों बाद चैत्र कभी फरवरी में पहुँच जाएगा, कभी जनवरी में; और फिर होली, दीपावली, नवरात्र जैसे पर्व अपनी ऋतु-संगति खो देंगे। इसलिए भारतीय पंचांग-परंपरा ने बड़ी चतुराई से अतिरिक्त मास जोड़ने की व्यवस्था बनाई, ताकि त्योहार मौसम और खगोलीय क्रम से बहुत दूर न भागें। यही कारण है कि विक्रम संवत की दुनिया में तिथि, नक्षत्र, पक्ष, अधिकमास, क्षयमास, मुहूर्त जैसी चीज़ें अर्थपूर्ण हो जाती हैं। यह केवल “दिन गिनने” का तंत्र नहीं, बल्कि धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का सूक्ष्म मानचित्र है।

अब ज़रा शक संवत की ओर आइए। यहाँ एक भ्रम अक्सर पैदा होता है। लोग मान लेते हैं कि शक संवत भी वही चीज़ है जो पारंपरिक पंचांगों में चलती है। जबकि भारत का राष्ट्रीय शक कैलेंडर, जिसे 1957 से सरकारी उपयोग में अपनाया गया, दरअसल एक सुधारित सौर नागरिक कैलेंडर है। इसका उद्देश्य धार्मिक अनुष्ठानों का प्रतिस्थापन नहीं था, बल्कि प्रशासनिक एकरूपता लाना था। इसमें चैत्र पहला महीना है; सामान्य वर्ष में 1 चैत्र 22 मार्च को पड़ता है और लीप वर्ष में 21 मार्च को। इसके बाद वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ आदि महीनों की लंबाई तय रहती है—पहले कुछ महीने 31 दिन, बाद के 30 दिन। यानी यहाँ वह लचीलापन नहीं है जो तिथि-आधारित पारंपरिक पंचांगों में होता है। इस राष्ट्रीय रूप वाले शक कैलेंडर को इसलिए बनाया गया कि सरकारी दफ्तर, राजपत्र, अखिल भारतीय प्रसारण और सार्वजनिक संचार में एक समान, पूर्वानुमेय और स्थिर तारीख़-प्रणाली इस्तेमाल की जा सके।

यहीं से असली उत्तर जन्म लेता है—विक्रम संवत और राष्ट्रीय शक संवत का प्रयोजन अलग-अलग है। विक्रम संवत हमारे धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन की धड़कन है; राष्ट्रीय शक संवत सरकारी नागरिक उपयोग का औज़ार है। दोनों को एक-दूसरे का दुश्मन समझना वैसा ही है जैसे कोई कहे कि घर की रसोई और अस्पताल की प्रयोगशाला में एक ही बर्तन क्यों नहीं चलता। दोनों में “समय” है, पर समय का उपयोग अलग है। जहाँ पर्व-त्योहार के लिए तिथि, नक्षत्र, मुहूर्त और पक्ष ज़रूरी हैं, वहाँ विक्रम संवत और परंपरागत पंचांग स्वाभाविक रूप से अधिक उपयुक्त हैं। लेकिन जहाँ रेलवे टाइमटेबल, राजपत्र, सरकारी आदेश, अखिल भारतीय संचार और स्थिर प्रशासनिक रिकॉर्ड की बात हो, वहाँ एक निश्चित, सौर और पूर्वानुमेय कैलेंडर अधिक सुविधाजनक पड़ता है।

अब प्रश्न उठता है कि आज़ाद भारत ने यह फैसला कैसे लिया। स्वतंत्रता के बाद भारत में अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग पंचांग चल रहे थे। एक ही पर्व की तिथि कई जगह अलग निकल आती थी। यह केवल धार्मिक समस्या नहीं थी; नागरिक जीवन में भी एकरूपता का प्रश्न था। इसी पृष्ठभूमि में 1952 में CSIR के अंतर्गत कैलेंडर सुधार समिति बनी, जिसके अध्यक्ष प्रख्यात वैज्ञानिक मेघनाद साहा थे। समिति का काम था—देश में प्रचलित विविध कैलेंडरों का अध्ययन करना और एक ऐसा वैज्ञानिक, एकरूप नागरिक कैलेंडर सुझाना जो पूरे भारत के लिए उपयोगी हो। जवाहरलाल नेहरू ने भी इस आवश्यकता को “वैज्ञानिक दृष्टिकोण” से जोड़कर देखा। समिति ने 1955 में अपनी रिपोर्ट दी और उसके बाद सरकार ने शक-आधारित राष्ट्रीय कैलेंडर अपनाया। इसका आधिकारिक उपयोग 22 मार्च 1957 से शुरू हुआ।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात साफ कर देना ज़रूरी है: शक संवत को राष्ट्रीय कैलेंडर बनाना, विक्रम संवत को नकारना नहीं था। भारत सरकार ने कहीं यह नहीं कहा कि धार्मिक कार्यों, पर्व-त्योहारों या पारंपरिक संस्कारों में विक्रम संवत या स्थानीय पंचांगों का उपयोग बंद कर दिया जाए। वास्तव में व्यवहार में आज भी यही स्थिति है—सरकारी काग़ज़ों में शक और ग्रेगोरियन दिखाई दे सकते हैं, लेकिन धार्मिक जीवन में विक्रम संवत, विभिन्न क्षेत्रीय पंचांग, अमांत-पूर्णिमांत परंपराएँ और स्थानीय गणनाएँ जीवित हैं। इसलिए यह कहना अधिक सही होगा कि राष्ट्रीय शक कैलेंडर “प्रशासनिक सुविधा” का साधन बना, जबकि विक्रम संवत “सभ्यता की परंपरा” का संवाहक बना रहा।

राजनीतिक पहलू की बात करें तो विवाद प्रायः यहीं पैदा होता है कि “जब अपना पारंपरिक संवत था तो दूसरा क्यों?” लेकिन इस सवाल में एक छिपी हुई भूल है—हम “विक्रम संवत” को केवल भावनात्मक पहचान के रूप में देख लेते हैं, जबकि सरकार को एक ऐसा कैलेंडर चाहिए था जिसे प्रशासनिक रूप से पूरे देश में, स्पष्ट और स्थिर रूप में लागू किया जा सके। विक्रम संवत की पारंपरिक गणना क्षेत्रीय रूपों में मिलती है; कहीं अमांत, कहीं पूर्णिमांत, कहीं वर्षारंभ का व्यवहार अलग। ऊपर से त्योहार तिथियों और मुहूर्तों पर चलते हैं, जिनका ग्रेगोरियन तिथियों से सीधा स्थिर तालमेल नहीं बैठता। नागरिक प्रशासन को ऐसी प्रणाली चाहिए थी जहाँ 1 चैत्र हर साल लगभग तय तारीख़ पर आए और महीनों की लंबाई निश्चित हो। इसलिए राष्ट्रीय शक कैलेंडर का चयन अधिक “व्यवहारिक प्रशासनिक निर्णय” प्रतीत होता है, न कि केवल सांस्कृतिक प्रतिस्पर्धा का मामला।

हाँ, यह भी सच है कि राष्ट्रीय शक कैलेंडर जनता के रोज़मर्रा जीवन में बहुत लोकप्रिय नहीं हो पाया। आम भारतीय के जीवन में तीन परतें साथ-साथ चलती रहीं—ऑफिस में ग्रेगोरियन, धर्म-कर्म में विक्रम संवत या स्थानीय पंचांग, और सरकारी प्रतीक के रूप में कहीं-कहीं शक संवत। इसलिए शक संवत का सार्वजनिक प्रभाव सीमित रहा। यह मान लेना चाहिए कि किसी कैलेंडर का वैज्ञानिक या प्रशासनिक रूप से उपयुक्त होना और उसका जनजीवन में भावनात्मक रूप से स्वीकृत हो जाना—दो अलग बातें हैं। घड़ी बिल्कुल सही हो सकती है, पर अगर वह घर की दीवार पर लोगों को अपनी न लगे, तो लोग जेब से पुरानी घड़ी ही निकालते रहेंगे।

एक और छोटी-सी सावधानी भी ज़रूरी है। हम कभी-कभी सभी हिंदू पर्वों को “सिर्फ विक्रम संवत” पर आधारित कह देते हैं, जबकि व्यवहार अधिक जटिल है। भारतीय समय-परंपरा में चंद्र, सौर, नाक्षत्र, और क्षेत्रीय गणनाओं का सम्मिलित संसार है। जैसे कई पर्व तिथि-आधारित हैं, जबकि कुछ संक्रांति-आधारित पर्व सौर गणना से जुड़े होते हैं। इसलिए भारतीय कैलेंडर परंपरा को एक ही डिब्बे में बंद नहीं किया जा सकता। यही इसकी कठिनाई है, और यही इसकी सुंदरता भी।

इसे हम सरल भाषा में समझें तो विक्रम संवत हमारे त्योहारों, व्रतों, तिथियों, मुहूर्तों और सांस्कृतिक स्मृति का संवत है। शक संवत, अपने राष्ट्रीय रूप में, भारत के प्रशासनिक और नागरिक उपयोग के लिए चुना गया संवत है। एक का जन्म परंपरा की लंबी सांस्कृतिक यात्रा से हुआ, दूसरे का आधुनिक राष्ट्र-राज्य की व्यावहारिक ज़रूरत से। एक हमारे घर-आंगन की घड़ी है, दूसरा दफ्तर की दीवार पर टंगा मानक कैलेंडर। दोनों को समझने पर विवाद कम होता है और सभ्यता की परिपक्वता अधिक दिखाई देती है। आखिर एक प्राचीन देश को कभी-कभी एक से अधिक समय-भाषाएँ बोलनी पड़ती हैं—एक आत्मा के लिए, एक व्यवस्था के लिए। और भारत जैसा देश तो वैसे भी एक ही समय में कई सदियों में जीता है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

Comments ( 1)

Join the conversation and share your thoughts

डॉ मुकेश 'असीमित'

4 minutes ago

जब त्योहार विक्रम संवत से चलते हैं, तो राष्ट्रीय कैलेंडर शक संवत क्यों बना? इसी दिलचस्प सवाल का सरल और रोचक विश्लेषण।