वाह रे ज़माना — डिज़ाइनर बेबी का
एक रोचक ख़बर चीन से टपकती हुई मेरे मोबाइल में आ गिरी। सूचना यह कि अब माता-पिता डिज़ाइनर बेबी पैदा कर सकेंगे। और सच कहें तो ऐसी ख़बर चीन से ही आनी थी। आख़िर बेबी-प्रोडक्शन के मामले में चीन पहले से ही नंबर वन रहा है। ज़ाहिर है, यह कोई पायलट प्रोजेक्ट होगा, या कह लीजिए डिज़ाइनर बेबी का स्टार्ट-अप—और स्टार्ट-अप भी चीन से नहीं निकलेगा, तो कहाँ से निकलेगा?
अब तक माता-पिता बच्चे को भगवान की देन मानते थे। भगवान भी राहत की साँस लेते होंगे कि चलो, कम से कम इस मामले में तो इंसान उन्हें श्रेय देता है। लेकिन विज्ञान ने धीरे-धीरे भगवान के इस कॉपीराइटेड डिपार्टमेंट में भी सेंध लगा दी—डिज़ाइनर बेबी। अब बच्चा भगवान की मर्ज़ी से नहीं, माता-पिता की पसंद से आएगा। कोख अब भावनाओं की जगह एक कस्टमाइज़्ड फैक्ट्री बन जाएगी, जहाँ डिलीवरी से पहले ही सारे फ़ीचर फाइनल कर लिए जाएँगे।
कितना शानदार विचार है कि अब माता-पिता अपने मनचाहे गुण बच्चों में इंस्टॉल कर सकेंगे। ज़िंदगी भर जिन अंगूरों तक उनके अपने हाथ नहीं पहुँचे,और जिन्हें आप खट्टे घोषित करते रहे, अब वही अंगूर वे अपने बच्चे के हाथों तुड़वा लेंगे। बच्चा पैदा होते ही इंजीनियर, डॉक्टर या बैंकर निकले—गले में स्टेथोस्कोप, हाथ में लैपटॉप। आँखों का रंग ऐसा कि इंस्टाग्राम फ़िल्टर की ज़रूरत न पड़े। हाइट इतनी कि बास्केटबॉल चैंपियन बनने का ऑफ़र बचपन में ही आ जाए। दिमाग़ ऐसा कि नर्सरी में कदम रखते ही कोचिंग संस्थान ऑफ़र लेटर भेज दें। स्वस्थ रहना, पूरा वज़न होना—ये तो अब बहुत छोटी माँगें होंगी। असली सवाल यह होगा—
“ब्लू आईज़ वाला पैकेज किस स्लैब में आएगा?”
डिज़ाइनर बेबी का विचार आते ही समाज तीन हिस्सों में बँट गया है। एक हिस्सा कहता है—“वाह! विज्ञान ने कमाल कर दिया।” दूसरा हिस्सा घोषणा करता है—“ये सब पश्चिमी देशों की साज़िश है।” और तीसरा, जो सबसे बड़ा हिस्सा है, चुपचाप कैलकुलेटर निकालकर हिसाब लगाने लगता है—अगर सब करवा रहे हैं, तो हम क्यों पीछे रहें? यही हमारा नैतिक स्टैंड है—जब तक पड़ोसी न करे, हम विरोध में हैं; जैसे ही पड़ोसी करे, हम कंसल्टेशन में पहुँच जाते हैं।
वैसे भी हमारा समाज डिज़ाइन का शौकीन रहा है। घर डिज़ाइनर, कपड़े डिज़ाइनर, शादी डिज़ाइनर—यहाँ तक कि दुख भी अब डिज़ाइनर हो चुका है, सोशल मीडिया के लिए। फिर बच्चा ही क्यों सरप्राइज़ पैकेज बना रहे? जब सब कुछ चुना जा सकता है, तो संतान क्यों न चुनी जाए?
पहले बच्चे का रंग-रूप पूरे परिवार की सामूहिक स्मृति होता था—“नाना पर गया है”, “नाक फूफा जैसी है”, “स्वभाव मामा वाला है।” अब ये सब बातें पुरानी फ़ाइलों में डाल दी जाएँगी। नया ज़माना गर्व से कहेगा—“ये फ़ीचर हमने खुद चुना था।” अब न बाप क्रेडिट ले पाएगा, न माँ। बच्चे का आईक्यू इस बात से तय होगा कि आपने कौन-सा पैकेज अफ़ॉर्ड किया।
डिज़ाइनर बेबी का सबसे बड़ा फ़ायदा यह बताया जा रहा है कि इससे बीमारियों से बचाव होगा। बीमारियों से बचाव तो ठीक है, लेकिन अगर साथ में कुछ बोनस भी मिल जाए तो क्या बुरा है? थोड़ा हमारे लालच का भी ध्यान रखिए, मित्र। हम चाहते हैं कि वैवाहिक विज्ञापनों में लिखी हर बात सौ प्रतिशत सच हो—सुंदर, सुशील, संस्कारी, गृह-कार्य में दक्ष, गेहूँआ रंग, सुडौल नाक-नक्श, इत्यादि-इत्यादि।
कल्पना कीजिए, कल को विवाह-विज्ञापन कुछ ऐसे होंगे—
“आवश्यकता है एक डिज़ाइनर फीमेल बेबी को —गेहूँआ रंग, आईआईटी-प्रिडिक्टेड ब्रेन वाला । संपर्क केवल डिज़ाइनर मेल बेबी वाले ही करें।”
और स्कूल में बच्चों का परिचय कुछ यूँ होगा—
“ये आर्यन है—लेटेस्ट वर्ज़न DB-2.0, डिज़ाइनर। और ये रवि है—पुराना मॉडल, नैचुरल बर्थ।”
सबसे असहज स्थिति तब आएगी जब बच्चा अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरेगा। तब माता-पिता उसे नहीं, डिज़ाइनर को कोसेंगे। बच्चा रोते-रोते कहेगा—“मुझसे गलती हो गई।” और माता-पिता जवाब देंगे—“गलती तुम्हारी नहीं, हमारी थी—हमने मीडियम पैकेज क्यों लिया?”
यह हमारी अधीरता है, मित्र। हमें प्रकृति का धैर्य नहीं चाहिए, हमें इंस्टेंट रिज़ल्ट चाहिए—इंस्टेंट नूडल की तरह। विज्ञान अपना काम कर रहा है—चुपचाप, सीमाओं के भीतर। हल्ला हम मचा रहे हैं। नैतिकता की दुहाई भी हम ही दे रहे हैं और क्यू-आर कोड स्कैन करने को भी तैयार हम ही हैं।
असल डर यह नहीं कि बच्चा डिज़ाइनर हो जाएगा। असल डर यह है कि इंसान मशीन से पहले खुद को मशीन समझने लगेगा। क्योंकि जब बच्चा डिज़ाइन से बनेगा, तो गलती की गुंजाइश कहाँ बचेगी? और जहाँ गलती की गुंजाइश नहीं होती, वहाँ इंसान नहीं—सिर्फ़ उत्पाद होते हैं।
और उत्पाद चाहे कितना भी सुंदर क्यों न हो—
उसमें मासूमियत की वारंटी आप ढूँढ रहे हैं … आप भी..,खयाली पुलाव पकाना बंद कीजिये ।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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