शादी ब्याह का सीजन है ..तंदूरी रोटी के संदर्भ में हास्य-व्यंग्य कविता प्रस्तुत है
वीर तुम डटे रहो ..वीर तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो। वीर तुम डटे रहो,
छप्पन भोग सजाए हैं,
मिठाइयाँ भरमाये हैं,
पापड़ की खनक लुभाएगी,
चटनी की खुशबू भटकाएगी,
हो न जाना विकल ,
होगा तू वीर सफल
आज नहीं तो कल
वीर, तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो।
भीड़ तुम्हें धकाएगी,
लाइन से हटाएगी,
कोई तुम्हे गरियायेगा ,
कोई तुम्हे लातियायेगा ।
पर याद रखो, यह युद्ध है,
अपने ही तेरे विरुद्ध है।
वीर, तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो।
सब्जी आंख्ने मीन्चेंगी ,
सुगंध तुम्हें खींचेगी।
प्लेट तुम्हारी खाली होगी,
भरी दुसरे की थाली होगी।
बस दुनिया की उल्टी रीत है,
पक्की तुम्हारी जीत है।
वीर, तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो।
दुल्हे का जीजा आएगा,
तुम्हें लाइन से हटाएगा।
दो रोटियां ले जाएगा ,
तुम्हे ठेंगा दिखा जायेगा ।
दिल पर नहीं लेना है ,
सबको हिसाब ऊपर देना है ।
वीर, तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो।
जो वीर रोटी पायेगा ,
वह इतिहास बना जाएगा ।
जन-जन में नाम होगा,
महफिल में सलाम होगा।
तंदूरी रोटी की इस जंग में,
जो विजयी, वही रंग में।
तो वीर, तुम डटे रहो,
तंदूर से सटे रहो।

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’
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