ग़ालिब जयंती: “फेल्ट थॉट” का सुपरस्टार—दिल भी, दिमाग़ भी

आज 27 दिसंबर है—और तारीख़ के कैलेंडर पर यह सिर्फ़ एक “जन्म-दिवस” नहीं, एक ज़बान की धड़कन है। मिर्ज़ा असदुल्लाह ख़ाँ “ग़ालिब” का दिन। आप चाहें तो इस दिन की शुरुआत वैसे ही कीजिए जैसे मंचों पर होती है—एक आवाज़ पहले मिसरे की, और पूरा हॉल दूसरे मिसरे का इंतज़ार करता हुआ।
“है और भी दुनिया में सुख़नवर बहुत अच्छे…”
और फिर जैसे ही भीड़ जवाब देती है, एक बात साफ़ हो जाती है: ग़ालिब सिर्फ़ शायर नहीं, सामूहिक स्मृति का रिफ़्लेक्स हैं। आप उन्हें याद करने नहीं बैठते—आप बस किसी उलझन, किसी तन्हाई, किसी हैरत में पहुँचते हैं—और अचानक कोई शे’र आपके भीतर से बोल उठता है। यही उनकी “सुपरस्टार” हैसियत है; पर यह शोहरत किसी पोस्टर की चमक नहीं, अनुभव की सच्चाई से पैदा हुई रोशनी है।

ग़ालिब को याद रखने का एक सीधा-सा कारण यह है कि उनकी शायरी में “जज़्बात” भी हैं और “अक़्ल” भी—वो अजीब संतुलन जिसे किसी ने सुंदर ढंग से “फेल्ट थॉट” कहा: महसूस किया हुआ विचार। सिर्फ़ भावना हो तो बात कुछ देर बहलाती है; सिर्फ़ तर्क हो तो दिल पर दस्तक नहीं देती। ग़ालिब दोनों को एक ही साँस में रख देते हैं—कहीं नर्मी से, कहीं शरारत से, कहीं तंज़ से। इसलिए उनकी शायरी प्रेम की भी है, दर्शन की भी है, और दुनिया की राजनीति-समाजनीति को समझने की भी।

और देखिए, ग़ालिब की महानता यह नहीं कि वे “बहुत गहरे” लिखते हैं; महानता यह है कि गहराई को रोज़मर्रा के भीतर से निकाल लाते हैं। जो चीज़ हमारी आँखों के सामने है—उसमें से ऐसा अर्थ निकाल देते हैं जो हमें दिखाई नहीं देता था। आप चुनावी वादों की भीड़ देखें तो कोई शेर अचानक “खुद-ब-खुद” याद आ जाता है; आप रिश्तों की पेचीदगी देखें तो कोई दूसरा; आप अपने भीतर की बेचैनी देखें तो तीसरा। ग़ालिब का कमाल यह है कि वे मनुष्य की मनोदशा को “बड़ी वस्तु” की तरह देखते हैं—बाहर की घटनाओं से जोड़कर, भीतर की नमी बचाकर। वे दुख को रोते नहीं, दुख का विश्लेषण करते हैं; और कभी-कभी उस विश्लेषण में ऐसी लज़्ज़त भी रख देते हैं कि लोग उन्हें “अपने ग़म से खेलने” वाला शायर कह बैठते हैं। पर सच यह है कि वह खेल दुख की छोटी-छोटी सीमाओं को तोड़कर उसे समझने का खेल है—जैसे दर्द को नाम दे देने से दर्द की सत्ता थोड़ी कम हो जाती हो।

इसी रास्ते पर चलते-चलते ग़ालिब का एक और चेहरा उभरता है—उनका “फॉरवर्ड-लुकिंग” दिमाग़। वे दो सौ साल पहले भी आज की तरह बेचैन लोगों को पहचान लेते हैं: जिन्हें सचमुच कुछ पता है, जिनकी आँख खुली है, जिनकी चेतना जागती है—उनके हिस्से में अक्सर बेचैनी लिखी होती है। और जिन्हें कुछ जानना नहीं, वे मज़े में हैं। यह कोई पुराना “खयाल” नहीं—यह आज की सोशल मीडिया वाली सदी में भी उतना ही सत्य है। ज्ञान की कोई सीमा हो या न हो, नाराज़गी की सीमा तो बिल्कुल नहीं—ग़ालिब इस मानव-स्वभाव को भी पहचानते हैं। इसी कारण वे एक साथ परंपरा के भीतर भी हैं और परंपरा पर प्रश्न भी उठाते हैं; वे आदर भी करते हैं और चुनौती भी दे देते हैं; वे ईमानदारी से “काबे” की तरफ़ भी देखते हैं और मनुष्य की बनावट पर हल्की मुस्कान भी छोड़ जाते हैं।

और फिर—ग़ालिब को आज के दिन याद करते हुए एक ज़रूरी शिकायत भी सुनिए: “जो ग़ालिब ने कहा नहीं, वह भी ग़ालिब के नाम से चल रहा है।” सोशल मीडिया ने ग़ालिब को ऐसा सार्वभौमिक ‘क्रेडिट-कार्ड’ बना दिया है कि हर महान पंक्ति, हर भारी-भरकम नैतिक शेर, हर ‘गुड मॉर्निंग’ वाला दर्शन—सब पर उनकी मुहर लगा दी जाती है। किसी नेता का ट्वीट हो, किसी सभा का भाषण हो—बस आख़िर में लिख दो: “—ग़ालिब”। जैसे नाम जोड़ देने से विचार का वजन बढ़ जाता हो। ग़ालिब के साथ यह अन्याय नया नहीं; उनके जीवन में भी लोग उनके नाम पर चीज़ें टाँकते रहे—और ग़ालिब ने अपनी शरारती सचाई से जवाब दिया: “अगर सच कहा है तो लानत…”। यह सिर्फ़ मज़ाक नहीं—यह साहित्यिक ईमानदारी का ऐलान है कि शायरी का भी अपना “सर्टिफिकेट” होता है: संदर्भ, भाषा, रवायत, और शायर की अपनी आवाज़।

ग़ालिब की आवाज़ का एक अद्भुत विस्तार उनके ख़तों में भी मिलता है। उन्होंने पत्र-लेखन को ‘दरबारी’ भाषा के घूंघट से बाहर खींचकर ऐसा बना दिया जैसे सामने बैठकर बात हो रही हो—जैसे ज़िंदगी ही लिख रही हो। इसलिए उनके ख़त आज भी साहित्य की तरह पढ़े जाते हैं। वही ग़ालिब, जिनकी ज़बान को उनके दौर में भी लोग “मुश्किल” कहते थे, वही ग़ालिब आम आदमी के दिल तक ऐसे पहुँचते हैं कि कभी-कभी अर्थ समझ में न भी आए—मगर असर सीधा पड़ता है। और यहीं से एक और दिलचस्प बात खुलती है: ग़ालिब की शायरी हिंदुस्तान के अलावा कहीं और “वैसी” हो ही नहीं सकती थी। इस मिट्टी की तहज़ीब—जहाँ सूफ़ी का नर्म सुर भी है, अद्वैत की दार्शनिक छाया भी, और गलियों की हँसी भी—ग़ालिब की शायरी में एक साथ सांस लेती है। “था कुछ तो ख़ुदा था…” जैसे शे’र सिर्फ़ धार्मिक कथन नहीं, एक बौद्धिक-आध्यात्मिक अनुभव हैं—जैसे ईश्वर और अस्तित्व पर सवाल भी है, और स्वीकार भी।

तो आज 27 दिसंबर को ग़ालिब को याद करना सिर्फ़ एक ‘महान शायर’ को सलाम करना नहीं है। यह अपने भीतर उस भाषा को बचाना है जो नफ़रत को धीमा करती है, जो संवेदना को तेज़ करती है, जो तर्क को दिल के पास बैठाती है। अगर आप सचमुच ग़ालिब मनाना चाहते हैं, तो एक काम कीजिए—एक असली शेर चुनिए, उसका संदर्भ पकड़िए, उसे धीरे-धीरे चखिए, और फिर देखिए: आपको लगेगा कि यह दो सौ साल पहले नहीं लिखा गया—यह अभी-अभी, आपके ही भीतर, कहीं लिखा जा रहा है। ग़ालिब की जन्मतिथि हर साल आती है; पर ग़ालिब का “जन्म” तब होता है जब कोई बेचैन मन, किसी एक शे’र में, अपना पूरा संसार पा लेता है।

डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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