यह साल किसी कैलेंडर की तरह नहीं बीता, बल्कि किसी अधूरी डायरी की तरह—जिसके हर पन्ने पर स्याही कम और धड़कन ज़्यादा थी। बीते बारह महीनों में घटनाएँ इतनी तेज़ी से बदलीं कि कई बार लगा, समय दौड़ रहा है और हम बस हाँफते हुए उसके पीछे-पीछे चल रहे हैं। यह साल हमें लगातार कुछ न कुछ सोचने, डरने, उबलने और कभी-कभी चुप रहने पर मजबूर करता रहा।
साल की शुरुआत ही आशंकाओं से भरी थी। कश्मीर की वादियाँ, जो अक्सर पर्यटन और सुकून के पोस्टर में कैद रहती हैं, एक बार फिर गोलियों की आवाज़ से कांप उठीं। पहलगाम की घटना केवल एक आतंकी हमला नहीं थी, वह भरोसे पर किया गया सीधा प्रहार थी। एक ऐसा हमला, जिसमें मारे गए लोग सिर्फ़ आंकड़े नहीं थे, बल्कि घर लौटने की अधूरी योजनाएँ थे। देश ने फिर एक बार महसूस किया कि आतंकवाद का सबसे क्रूर चेहरा यह है कि वह सामान्य जीवन को असामान्य डर में बदल देता है। गुस्सा था, शोक था, और हमेशा की तरह सवाल भी थे—लेकिन जवाब फिर धुँधले।
इसी पृष्ठभूमि में भारत–पाक तनाव ने सिर उठाया। सीमाओं पर हलचल बढ़ी, और स्टूडियो में राष्ट्रवाद का तापमान। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ जैसे नामों ने भावनाओं को और तीखा कर दिया। युद्ध की आशंका एक बार फिर हमारे ड्रॉइंग रूम तक आ पहुँची। हालांकि असली लड़ाई सीमा पर थी, लेकिन उसका शोर मोबाइल स्क्रीन और टीवी बहसों में ज़्यादा सुनाई दिया। इस साल ने यह साफ़ कर दिया कि युद्ध अब सिर्फ़ सैनिकों का मामला नहीं रहा, वह नागरिक मानसिकता का भी युद्ध बन चुका है—जहाँ डर, गर्व और प्रचार एक साथ परोसे जाते हैं।
वैश्विक स्तर पर भी यह साल बेचैन रहा। भारत और अमेरिका के रिश्तों को लेकर चर्चाएँ कभी मुस्कान के साथ आईं, कभी संदेह के साथ। व्हाइट हाउस की बैठकों से ज़्यादा, उनके बाद होने वाली व्याख्याएँ सुर्खियों में रहीं। कौन किसके कितना करीब है, कौन किससे कितना दूर—इन सब पर अटकलें चलती रहीं। यह साल बताता रहा कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति अब केवल नीति से नहीं, इमेज और संकेतों से भी चलती है।
इसी बीच टैरिफ़ वॉर और वैश्विक आर्थिक खींचतान ने आम आदमी को यह एहसास कराया कि दुनिया की बड़ी लड़ाइयों का असर सीधा उसकी जेब तक आता है। महँगाई, अनिश्चितता और रोज़गार की चिंता—ये शब्द इस साल फिर आम बोलचाल का हिस्सा बने। अर्थव्यवस्था की भाषा कठिन थी, लेकिन असर बेहद साधारण और सीधा—कम में ज़्यादा निभाने की मजबूरी।
सांस्कृतिक मोर्चे पर यह साल बहसों का साल रहा। स्टैंडअप कॉमेडी, जो कभी हल्के-फुल्के व्यंग्य का माध्यम मानी जाती थी, अचानक मर्यादा और अश्लीलता की बहस में फँस गई। मंच से बोले गए शब्द अदालतों और सड़कों तक पहुँचे। सवाल उठे—हँसी की सीमा क्या है, और अभिव्यक्ति की आज़ादी कहाँ खत्म होती है? यह बहस जरूरी थी, क्योंकि यह सिर्फ़ कॉमेडी की नहीं, समाज की संवेदनशीलता की परीक्षा थी।
आस्था के स्तर पर महाकुंभ ने फिर साबित किया कि भारत में विश्वास एक जीवित अनुभव है। करोड़ों लोगों की मौजूदगी ने यह दिखाया कि आस्था कितनी विशाल हो सकती है, लेकिन साथ ही यह भी उजागर हुआ कि व्यवस्थाएँ अक्सर इस विशालता के सामने छोटी पड़ जाती हैं। भीड़, प्रबंधन और सुरक्षा—तीनों के बीच संतुलन इस साल भी चुनौती बना रहा।
इन सबके बीच सोशल मीडिया पूरे साल एक समानांतर देश की तरह सक्रिय रहा। हर घटना तुरंत राय में बदल गई, हर दुख ट्रेंड बन गया। संवेदना और सनसनी के बीच की रेखा और पतली होती गई। ऐसा लगा जैसे हम घटनाओं को जीने से पहले उन्हें पोस्ट करने लगे हैं। यह साल हमें यह असहज सच्चाई देकर गया कि तकनीक ने हमें जोड़ा भी है और थोड़ा सुन्न भी।
साल के अंत तक आते-आते यह साफ़ हो गया कि यह समय केवल घटनाओं का नहीं, प्रतिक्रियाओं का भी है। हम क्या सोचते हैं, कैसे सोचते हैं, और कब चुप रहते हैं—यह सब उतना ही महत्वपूर्ण हो गया जितना कि खुद घटनाएँ। यह साल हमें कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं देकर गया, बल्कि सवालों की एक लंबी सूची छोड़ गया।
जब नया साल आएगा, तो शायद नई उम्मीदें होंगी, नई बहसें होंगी, नई घटनाएँ होंगी। लेकिन यह बीता साल हमें यह याद दिलाकर जा रहा है कि इतिहास केवल तारीखों से नहीं बनता, वह हमारे सामूहिक विवेक और संवेदना से बनता है। सवाल यह नहीं कि साल कैसा बीता, सवाल यह है कि इस साल ने हमें अंदर से कितना बदला।
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