रेडियो साक्षात्कार –बॉक्स ऍफ़ एम् पर

रेडियो साक्षात्कार –बॉक्स ऍफ़ एम् पर

समय के साथ चिकित्सा विज्ञान में कई परिवर्तन हुए हैं, परंतु कुछ डॉक्टर ऐसे होते हैं जो केवल दवा से नहीं, बल्कि इंसानियत के जज़्बे से भी घाव भरने का काम करते हैं। ऐसी ही एक शख्सियत हैं डॉ. मुकेश चंद गर्ग, जो अपनी मेहनत और समर्पण से चिकित्सा के क्षेत्र में निरंतर नई ऊँचाइयाँ छू रहे हैं।

बॉक्स एफएम पर आज हम आपका परिचय करवा रहे हैं राजस्थान के गंगापुर सिटी से आने वाले डॉ. मुकेश चंद गर्ग से, जो अपनी सेवाओं के माध्यम से दूर-दूर तक प्रकाश फैला रहे हैं। वे न केवल राजस्थान में, बल्कि संपूर्ण ऑर्थोपेडिक क्षेत्र में एक मिसाल हैं। एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर से एमबीबीएस और पीजी करने के बाद उन्होंने चिकित्सा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान बनाई।

उनकी विशेषता सिर्फ चिकित्सा में नहीं, बल्कि हर व्यक्ति को बेहतर स्वास्थ्य और समर्थ जीवन देने के उनके सपने में भी छिपी है। उनके नए और एडवांस्ड ऑर्थोपेडिक सेंटर को न केवल बेहतरीन इलाज के लिए बल्कि विश्वसनीय संस्थान के रूप में भी जाना जाता है।

गंगापुर सिटी में सी-आर्म और एमआरआई मशीन इंट्रोड्यूस करने का श्रेय भी डॉ. गर्ग को जाता है। लेकिन जो बात सबसे अधिक दिल को छूती है, वह है गरीब और ज़रूरतमंद लोगों के लिए निःशुल्क चिकित्सा सेवा

चिकित्सा के अलावा, वे साहित्य और व्यंग्य लेखन में भी निपुण हैं। उनकी प्रमुख पुस्तकों में नरेंद्र मोदी का निर्माण” और गिरने में क्या हर्ज है” शामिल हैं। उनके लेख राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रकाशित हो चुके हैं। पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके समर्पण का उदाहरण नजीमवाला तालाब वेटलैंड प्रोजेक्ट जैसे अभियानों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

डॉ. मुकेश चंद गर्ग की कहानी यह साबित करती है कि अगर सपना बड़ा हो और इरादा मजबूत हो, तो सफलता के दरवाजे खुद ही खुल जाते हैं। जैसा कि उनकी पुस्तक का शीर्षक कहता है—गिरने में क्या हर्ज है”

आज बॉक्स एफएम स्टूडियो में उनका स्वागत करते हुए हम गर्व महसूस कर रहे हैं। तो आइए, जोरदार तालियों के साथ स्वागत करें डॉ. मुकेश चंद गर्ग का!

मुकुल गोश्वामी  (रेडियो अनाउंसर): वाह! क्या बात है! गिरने में क्या हर्ज है—सुनकर ही मज़ा आ गया। डॉ. साहब, अभिवादन! बॉक्स एफएम में आपका स्वागत है।

डॉ. मुकेश गर्ग: नमस्कार मुकुल जी! बहुत-बहुत आभार, आपने मुझे बॉक्स एफएम में आमंत्रित किया संवाद के लिए।

मुकुल गोश्वामी : आपको तो भगवान ने नेक काम के लिए चुना है, हमारी क्या बिसात कि हम आपको चुनें या न चुनें! लेकिन सच कहें तो आपके पुस्तक का शीर्षक बड़ा रोचक लगा। लोग कहते हैं, उठने में क्या हर्ज है”, और आपने लिखा गिरने में क्या हर्ज है”?

डॉ. मुकेश गर्ग: (हंसते हुए) हां, यह मेरा हाल ही में प्रकाशित व्यंग्य संग्रह है, जिसका शीर्षक गिरने में क्या हर्ज है” ही है।

मुकुल गोश्वामी : आप तो डॉक्टर हैं, लेकिन साथ में व्यंग्य लेखन भी करते हैं। इस रुचि का क्या कारण है?

डॉ. मुकेश गर्ग: देखिए, चिकित्सा पेशा लोगों के दुख-दर्द से जुड़ा हुआ है। जब मरीज मेरे पास आते हैं, तो आधे तो वैसे ही अपने दर्द से परेशान होते हैं। लेकिन जब वे मेरे पास आते हैं और उनके चेहरे पर एक हल्की मुस्कान आ जाए, तो उनका आधा दर्द खुद-ब-खुद कम हो जाता है।

मुकुल गोश्वामी : बिल्कुल सही! मुस्कान और व्यंग्य का असर होता ही है। अब ज़रा पीछे चलते हैं, आपके बचपन की ओर। पढ़ाई कैसी रही? मेडिकल में जाने का सपना कैसे आया?

डॉ. मुकेश गर्ग: बचपन से ही मेरी पढ़ाई में रुचि थी। मेरा गाँव काफ़ी छोटा था, और तब वहाँ बोर्ड परीक्षा की सुविधा भी नहीं थी। फिर भी मैंने प्रथम श्रेणी में पास किया। उसके बाद मैंने सीनियर सेकेंडरी गंगापुर सिटी से पूरी की और कोटा में कोचिंग ली। वहाँ भी राजस्थान में टॉप किया और फिर एसएमएस मेडिकल कॉलेज, जयपुर में दाखिला मिला। उस समय मेडिकल में जाना बहुत कठिन था, लेकिन मुझे परिवार से पूरा सहयोग मिला।

मुकुल गोश्वामी : मेडिकल कॉलेज का अनुभव कैसा रहा?

डॉ. मुकेश गर्ग: एसएमएस मेडिकल कॉलेज देश-विदेश में अपनी पहचान रखता है। वहाँ पढ़ाई का माहौल बहुत अच्छा था। हमारे प्रोफेसर डॉ. काबरा सर जैसे लोग थे, जिनके मार्गदर्शन में हमने बहुत कुछ सीखा। हॉस्टल लाइफ भी यादगार थी। हम गाँव से आए छात्र थोड़े संकोची रहते थे, लेकिन धीरे-धीरे हमने अपनी पहचान बनाई।

मुकुल गोश्वामी : डॉक्टर बनने के बाद आप जयपुर या दिल्ली में बस सकते थे, लेकिन आपने गंगापुर को ही चुना। क्यों?

डॉ. मुकेश गर्ग: जी, मैं अपने माता-पिता का इकलौता बेटा हूँ। उनके प्रति मेरी जिम्मेदारी थी, इसलिए मैंने अपने शहर में ही रहकर सेवा करने का फैसला किया। मुझे रेलवे में और यूपीएससी के ज़रिए कई नौकरी के अवसर मिले, लेकिन मैंने निजी प्रैक्टिस को प्राथमिकता दी। शुरुआत एक छोटे से क्लिनिक से की, धीरे-धीरे सुविधाएँ बढ़ाईं।

मुकुल गोश्वामी : आपने कहा कि जब आपने ऑर्थोपेडिक्स में शुरुआत की, तब गंगापुर में इस क्षेत्र की स्थिति बहुत अलग थी।

डॉ. मुकेश गर्ग: बिल्कुल! जब मैंने 25 साल पहले प्रैक्टिस शुरू की, तब यहाँ कोई ऑर्थोपेडिक डॉक्टर नहीं था। प्लास्टर का भी कॉन्सेप्ट नया था, और लोग इसे स्वीकारने में झिझकते थे। वे देसी इलाज पर ज़्यादा भरोसा करते थे। लेकिन धीरे-धीरे लोगों को आधुनिक चिकित्सा का महत्व समझ में आया।

मुकुल गोश्वामी : आपने गंगापुर में पहली सी-आर्म और एमआरआई मशीन लगाई। यह तकनीक कितनी महत्वपूर्ण है?

डॉ. मुकेश गर्ग: सी-आर्म मशीन एक तरह का लाइव एक्स-रे होता है, जिससे हड्डी की स्थिति तुरंत देखी जा सकती है। इससे ऑपरेशन में सटीकता बढ़ती है और कम समय में बेहतरीन परिणाम मिलते हैं।

मुकुल गोश्वामी : पहले हड्डी टूटने पर सिर्फ प्लास्टर होता था, लेकिन अब ऑपरेशन ज्यादा होते हैं। ऐसा क्यों?

डॉ. मुकेश गर्ग: प्लास्टर की अपनी सीमाएँ हैं—जैसे हड्डी सही से सेट न होना, संक्रमण की संभावना आदि। ऑपरेशन से हड्डी जल्दी जुड़ती है, मरीज जल्दी चल-फिर सकता है, और जॉइंट जाम नहीं होते। अब तो बायोडिग्रेडेबल स्क्रू भी आ गए हैं, जो शरीर में घुल जाते हैं।

मुकुल गोश्वामी : वाकई, चिकित्सा जगत बहुत आगे बढ़ चुका है! डॉ. साहब, आपकी सेवा, लेखन और समर्पण से समाज को बहुत प्रेरणा मिलती है।

डॉ. मुकेश गर्ग: बहुत-बहुत धन्यवाद! मेरा हमेशा यही प्रयास रहेगा कि मैं अपने ज्ञान और अनुभव से समाज को अधिक से अधिक लाभ पहुँचा सकूँ।

रेडियो साक्षात्कार

मुकुल गोश्वामी : नमस्कार श्रोताओं! आप सुन रहे हैं बॉक्स एफएम, और मैं हूं आपका मेज़बान मुकुल गोश्वामी । आज हमारे साथ मौजूद हैं एक जाने-माने चिकित्सक, लेखक और समाजसेवी, डॉ. मुकेश चंद्र गर्ग ‘असीमित’। डॉक्टर साहब, आपका हमारे स्टूडियो में हार्दिक स्वागत है।

डॉ. मुकेश गर्ग: धन्यवाद मुकुल जी, बहुत खुशी हो रही है आपसे और अपने श्रोताओं से रूबरू होकर।

मुकुल गोश्वामी : डॉक्टर साहब, चिकित्सा जगत में आपकी 25 वर्षों की सेवा प्रशंसनीय है। आपने अपने शहर में 30-बेड का अस्पताल स्थापित किया, लेकिन अक्सर डॉक्टरों पर व्यावसायिकता का आरोप लगता है। लोग सोचते हैं कि अस्पताल में जाने का मतलब भारी भरकम बिल। इस धारणा को आप कैसे देखते हैं?

डॉ. मुकेश गर्ग: देखिए, एक पुरानी कहावत है – “जंगल में नाचा मोर, किसने देखा?” यदि हमने कोई काबिलियत हासिल की है, तो उसका लाभ अपने ही समाज को देना चाहिए। धन उपार्जन ही किसी डॉक्टर का एकमात्र लक्ष्य नहीं होता, बल्कि समाज में पहचान और लोगों का विश्वास भी महत्वपूर्ण होता है। मैंने अपने शहर में 22 साल बिताए हैं और यहाँ के लोगों से सिर्फ धन नहीं, बल्कि प्रेम और सम्मान भी पाया है।

मुकुल गोश्वामी : बहुत सुंदर विचार। लेकिन फिर भी लोग अक्सर कहते हैं कि छोटे शहरों के अस्पतालों में लूट होती है। इस पर आपकी क्या राय है?

डॉ. मुकेश गर्ग: देखिए, हर जगह कुछ गलत करने वाले लोग होते हैं, लेकिन उनका दोष पूरे चिकित्सा जगत पर नहीं लगाया जा सकता। छोटे शहरों के अस्पताल सीमित संसाधनों में बेहतर सेवाएँ देने की कोशिश करते हैं। मेरे अस्पताल को 30-बेडेड रखना एक मजबूरी थी ताकि सरकारी योजनाओं के अंतर्गत अधिक से अधिक मरीजों को निःशुल्क इलाज मिल सके। लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि हमने शुल्क बढ़ा दिए या अनावश्यक जाँचें करवाईं। हमारा क्षेत्र आर्थिक रूप से पिछड़ा है, इसलिए हमारी प्राथमिकता उचित और किफायती इलाज देना है।

मुकुल गोश्वामी : वाकई, यह एक महत्वपूर्ण पहलू है। डॉक्टरों के प्रति मरीजों का विश्वास बहुत मायने रखता है। क्या कभी ऐसा हुआ कि मरीजों ने आपके प्रति विशेष विश्वास और स्नेह दिखाया हो?

डॉ. मुकेश गर्ग: हाँ, कई बार ऐसा हुआ। कई मरीज बार-बार लौटकर आते हैं, उनके परिवार के सदस्य भी मेरे पास इलाज करवाने आते हैं। एक बार मैं डेढ़ महीने के लिए शहर से बाहर था, और जब लौटा तो देखा कि कुछ मरीजों ने इलाज ही नहीं करवाया, सिर्फ मेरे लौटने का इंतज़ार किया। यह विश्वास मेरे लिए सबसे बड़ा सम्मान है।

मुकुल गोश्वामी : यह तो वाकई गर्व की बात है। अब एक सवाल – अक्सर लोग बड़े शहरों के अस्पतालों को प्राथमिकता देते हैं, छोटे शहरों के डॉक्टरों पर भरोसा नहीं करते। इस मानसिकता के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे?

डॉ. मुकेश गर्ग: यह सच है कि मरीजों में यह धारणा होती है कि बड़े शहरों के डॉक्टर ही बेहतर हैं। लेकिन हमें यह समझना चाहिए कि हर अस्पताल की अपनी सीमाएँ होती हैं। अगर किसी मरीज को सेकंड ओपिनियन लेना है, तो मैं खुद सलाह देता हूँ कि वे दूसरे डॉक्टर से भी राय लें। लेकिन विश्वास का भी एक महत्व होता है। मरीज जब पूर्ण विश्वास के साथ आपके पास आता है, तो यह डॉक्टर की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह उसकी पूरी निष्ठा से सेवा करे।

मुकुल गोश्वामी : बहुत सही कहा। मरीज डॉक्टर पर जितना विश्वास करता है, डॉक्टर को भी उतनी ही ईमानदारी से उसका इलाज करना चाहिए। अब अंत में, चिकित्सा से जुड़े हमारे श्रोताओं को कोई विशेष संदेश देना चाहेंगे?

डॉ. मुकेश गर्ग: बिल्कुल। मेरा सभी श्रोताओं से आग्रह है कि किसी भी असामान्य लक्षण को नज़रअंदाज न करें। मैंने एक 14-15 साल की बच्ची का मामला देखा था, जिसके घुटने में सूजन थी। मैंने परिवार को सुझाव दिया कि यह ट्यूमर हो सकता है, लेकिन उन्होंने इसे हल्के में लिया। कुछ महीनों बाद यह कैंसर में बदल गया और दुर्भाग्यवश उस बच्ची का निधन हो गया। इसलिए, अगर डॉक्टर कोई सलाह देते हैं, तो उसे गंभीरता से लें। स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही भारी पड़ सकती है।

मुकुल गोश्वामी : बहुत महत्वपूर्ण संदेश दिया आपने। डॉक्टर साहब, आपकी बातें सुनकर हमें बहुत कुछ सीखने को मिला। हम आधे घंटे से आपके चिकित्सा जीवन पर चर्चा कर रहे थे, अब अगले हिस्से में हम आपकी साहित्यिक यात्रा के बारे में बात करेंगे।

डॉ. मुकेश गर्ग: अवश्य, यह मेरे लिए भी आनंददायक रहेगा।

मुकुल गोश्वामी : तो श्रोताओं, बने रहिए हमारे साथ। कुछ ही पलों में हम डॉक्टर मुकेश चंद्र गर्ग ‘असीमित’ से उनकी लेखनी और व्यंग्य साहित्य पर चर्चा करेंगे। बॉक्स एफएम पर ‘व्यंग्य के रंग प्रभात के संग’ में लौटते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद।

बॉक्स एफएम पर खास मुलाकात: डॉ. मुकेश गर्ग से बातचीत 🎙️

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) नमस्कार श्रोताओं! आप सुन रहे हैं बॉक्स एफएम और मैं हूं मुकुल गोश्वामी , लेकर आया हूं आपके लिए एक बेहद खास बातचीत। आज हमारे साथ हैं जाने-माने अस्थि रोग विशेषज्ञ, लेखक और व्यंग्यकार – डॉ. मुकेश गर्ग। इनका जीवन जितना रोचक है, उतनी ही दिलचस्प है इनकी लेखनी! डॉक्टर साहब, आपका स्वागत है बॉक्स एफएम पर।

(डॉ. मुकेश गर्ग) बहुत-बहुत धन्यवाद मुकुल जी! आपसे और आपके श्रोताओं से मिलकर खुशी हो रही है।

डॉक्टर और मरीज के रिश्ते पर बेबाक चर्चा

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) डॉक्टर साहब, आमतौर पर यह धारणा बनी हुई है कि मेडिकल प्रोफेशन में मरीज को अतिरिक्त दवाइयां लिखना या अनावश्यक टेस्ट कराना एक ट्रेंड बन गया है। क्या आपको लगता है कि डॉक्टर और मरीज के बीच का यह रिश्ता कहीं न कहीं प्रभावित हो रहा है?

(डॉ. मुकेश गर्ग) देखिए, यह सच है कि कई बार मरीजों को यह संदेह होता है कि डॉक्टर ने ज्यादा दवाइयां लिख दीं या कुछ गैरजरूरी जांचें सुझा दीं। लेकिन असल में, कई बार यह मरीज की मनोवृति भी होती है। अगर डॉक्टर ने सिर्फ एक दवा लिखी, तो मरीज को लगता है कि शायद डॉक्टर को बीमारी की गहराई समझ नहीं आई! दूसरी ओर, अगर डॉक्टर ज्यादा दवाइयां लिखता है, तो उसे ‘कमर्शियल’ समझ लिया जाता है।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) बिल्कुल सही कहा आपने! यह तो ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना’ वाला मामला हो गया! (हंसते हुए)

(डॉ. मुकेश गर्ग) जी हां, और कई बार मरीज खुद ही कहते हैं, “डॉक्टर साहब, पिछली बार जो दवा दी थी, वो इस बार क्यों नहीं लिखी?” या फिर, “15 दिन की बजाय, एक महीने की दवा लिख दीजिए, बार-बार कौन आए?” ऐसे में डॉक्टर भी मरीज की सोच को ध्यान में रखते हुए निर्णय लेता है।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) तो कह सकते हैं कि डॉक्टर पर सिर्फ फार्मा कंपनियों का ही नहीं, बल्कि मरीजों का भी दबाव होता है!

(डॉ. मुकेश गर्ग) बिल्कुल! यह सिर्फ डॉक्टर की नहीं, बल्कि समाज की मानसिकता का भी विषय है।

जब डॉक्टर बना व्यंग्यकार

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) अब बात करते हैं आपकी दूसरी पहचान की – एक लेखक और व्यंग्यकार के रूप में! डॉक्टर साहब, चिकित्सा के क्षेत्र से व्यंग्य लेखन की दुनिया में कैसे आना हुआ?

(डॉ. मुकेश गर्ग) लेखन की शुरुआत तो मैंने कोरोना काल में की थी, जब अचानक से समय मिला। पहले ब्लॉग लिखता था, फिर संस्मरण लिखने लगा और धीरे-धीरे व्यंग्य की तरफ आया। मेरे लेखन में रोजमर्रा की घटनाओं, समाज की विसंगतियों और राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों की झलक मिलती है।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) बहुत रोचक! और आपके व्यंग्य का एक शानदार उदाहरण है “गिरने में क्या हर्ज़ है!” इस पर कुछ बताइए?

(डॉ. मुकेश गर्ग) (हंसते हुए) ये शीर्षक मैंने रुपये के डॉलर के मुकाबले गिरने पर लिखा था, लेकिन इसका ‘गिरना’ और ‘उठना’ मेडिकल भाषा में भी खूब इस्तेमाल होता है – जैसे, “कोई हड्डी टूट जाए तो कोई गम नहीं, अस्पताल है न!”

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) (हंसते हुए) बिल्कुल सही कहा! यह तो अस्पताल का बढ़िया स्लोगन बन सकता है!

नरेंद्र मोदी पर लिखी बायोग्राफी

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) आपने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी पर भी एक पुस्तक लिखी है, इस पर कुछ प्रकाश डालें?

(डॉ. मुकेश गर्ग) यह कोई साधारण बायोग्राफी नहीं है, बल्कि मैंने मोदी जी के व्यक्तित्व निर्माण को भगवद गीता के श्लोकों के माध्यम से परखा है। इसमें उनके आपातकाल, मुख्यमंत्री कार्यकाल, गुजरात मॉडल और प्रधानमंत्री बनने तक की घटनाओं का विश्लेषण किया गया है।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) लेकिन जब कोई लेखक किसी बड़े नेता पर लिखता है, तो उसकी आलोचना भी होती है। आपको कभी इस तरह की प्रतिक्रिया मिली?

(डॉ. मुकेश गर्ग) जी हां, इस पर स्वाभाविक रूप से मिश्रित प्रतिक्रियाएं आईं। कुछ ने इसे समर्थन दिया, तो कुछ ने इसे पक्षपातपूर्ण माना। लेकिन मेरा उद्देश्य किसी व्यक्ति की प्रशंसा या आलोचना नहीं, बल्कि उनके व्यक्तित्व के निर्माण की प्रक्रिया को समझना था।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) बहुत बढ़िया! एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से लिखा गया एक अद्भुत प्रयास।

समय प्रबंधन: डॉक्टर और लेखक दोनों बने रहना कैसे संभव हुआ?

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) एक डॉक्टर के तौर पर व्यस्त जीवन के बावजूद लेखन के लिए समय कैसे निकालते हैं?

(डॉ. मुकेश गर्ग) मैं सुबह 5:30 से 9:30 बजे तक का समय लेखन के लिए समर्पित करता हूं। यह मेरा रूटीन बन चुका है। हां, इमरजेंसी हो तो बात अलग है, लेकिन ज्यादातर मैं इसी समय में लिखता हूं।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) यानी लेखन आपका जुनून भी है और अनुशासन भी!

(डॉ. मुकेश गर्ग) बिल्कुल! लेखन मेरा पैशन है, और मुझे लगता है कि हर व्यक्ति को अपने काम के साथ-साथ एक पैशन जरूर रखना चाहिए – यही जीवन को सार्थक बनाता है।

अंतिम शब्द

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) डॉक्टर साहब, बॉक्स एफएम के श्रोताओं को क्या संदेश देना चाहेंगे?

(डॉ. मुकेश गर्ग) मैं बस इतना कहूंगा कि स्वस्थ रहें, मस्त रहें और अपने पैशन को जिंदा रखें! काम के साथ-साथ कुछ ऐसा करें जो आपके दिल को सुकून दे।

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) वाह! बहुत ही प्रेरणादायक शब्द। डॉ. मुकेश गर्ग जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने हमारे श्रोताओं से इतनी बेबाक बातचीत की।

(डॉ. मुकेश गर्ग) बहुत-बहुत धन्यवाद मुकुल जी और बॉक्स एफएम परिवार का!

(एंकर: मुकुल गोश्वामी ) श्रोताओं, यह थी एक शानदार बातचीत डॉ. मुकेश गर्ग के साथ। अगले हफ्ते फिर मिलेंगे एक नई शख्सियत के साथ। तब तक के लिए, खुश रहिए, स्वस्थ रहिए और बॉक्स एफएम सुनते रहिए! 🎧📻

— डॉ. मुकेश ‘असीमित’

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डॉ मुकेश 'असीमित'

डॉ मुकेश 'असीमित'

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी,…

लेखक का नाम: डॉ. मुकेश गर्ग निवास स्थान: गंगापुर सिटी, राजस्थान पिन कोड -३२२२०१ मेल आई डी -thefocusunlimited€@gmail.com पेशा: अस्थि एवं जोड़ रोग विशेषज्ञ लेखन रुचि: कविताएं, संस्मरण, व्यंग्य और हास्य रचनाएं प्रकाशित  पुस्तक “नरेंद्र मोदी का निर्माण: चायवाला से चौकीदार तक” (किताबगंज प्रकाशन से ) काव्य कुम्भ (साझा संकलन ) नीलम पब्लिकेशन से  काव्य ग्रन्थ भाग प्रथम (साझा संकलन ) लायंस पब्लिकेशन से  अंग्रेजी भाषा में-रोजेज एंड थोर्न्स -(एक व्यंग्य  संग्रह ) नोशन प्रेस से  –गिरने में क्या हर्ज है   -(५१ व्यंग्य रचनाओं का संग्रह ) भावना प्रकाशन से  प्रकाशनाधीन -व्यंग्य चालीसा (साझा संकलन )  किताबगंज   प्रकाशन  से  देश विदेश के जाने माने दैनिकी,साप्ताहिक पत्र और साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित रूप से लेख प्रकाशित  सम्मान एवं पुरस्कार -स्टेट आई एम ए द्वारा प्रेसिडेंशियल एप्रिसिएशन  अवार्ड  ”

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