भगवान बचाए ऐसे रिश्तेदारों से!
मेरे इन समस्त दयालु, कृपालु, शंकालु और सर्वज्ञ रिश्तेदारों से हाथ जोड़कर निवेदन है कि कृपया मुझे मेरे हाल पर छोड़ दें। आपने हाल-चाल पूछ-पूछकर जो मुझे बेहाल किया है, सच पूछिए तो भगवान से यही शिकायत है कि पहले तो मुझे बीमार ही क्यों किया, और अगर करना ही था तो चुपचाप कर देते—इन रिश्तेदारों को सूचना देने की क्या आवश्यकता थी। मैं तो अस्पताल से चुपचाप मुँह छुपाकर घर आया हूँ, अपने ही घर में ऐसे घुसा जैसे कोई चोर सीसीटीवी से बचते हुए प्रवेश करता है। मेरी पूरी कोशिश थी कि पड़ोसियों को भनक न लगे, लेकिन ये रिश्तेदार तो जैसे किसी अदृश्य सूचना तंत्र से जुड़े होते हैं—पड़ोसी को बाद में पता चलता है, इन्हें पहले खबर मिल जाती है।
अस्पताल में भर्ती था तब तो एक भी रिश्तेदार हाल पूछने नहीं आया, वहाँ इन्हें डर था कि यार कहीं खून न देना पड़ जाए या कहीं बिल का भुगतान उन्हें न करना पड़ जाए। घर पर हालचाल पूछना सुरक्षित रहता है—एक तो यह सुनिश्चित हो जाता है कि बंदा सही सलामत लौट आया है, बात करने लायक है; वहाँ बेहोश पड़ा हो तो कैसे पता लगे कि कौन आया मिलने। फिर अस्पताल में चाय की व्यवस्था कैसी होगी, यह भी चिंता रहती है; ऊपर से वहाँ की गंध और माहौल—कहीं खुद ही बीमार न पड़ जाएँ। घर पर सब ठीक है—इत्मीनान से समाचार लिए जा सकते हैं और अगर संबंधों की बात करनी हो, किसी सिफारिश का जुगाड़ बैठाना हो तो वह भी साथ-साथ हो जाए। फिर सुना है मकान में अच्छा पैसा लगाया है, कोई इंटीरियर वाला जानकार है उनका—लगे हाथ देख भी लेंगे, कुछ आइडिया मिल जाएगा।
तो मित्र, अब जैसे ही घर पहुँचा हूँ, रिश्तेदारों का तांता लगने वाला है। घर में पहले से ही “हाल-चाल महाकुंभ” की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं—सोफे के कवर बदल गए हैं, रसोई में दूध की थैलियों की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित कर ली गई है, नमकीन-चटपटे का भंडार जमा हो चुका है। ऐसा लग रहा है मानो मेरी मूर्ति प्रतिष्ठित कर दी जाए, जिसके दर्शन के लिए तीर्थयात्री आने वाले हैं।
मैंने भी समझदारी दिखाते हुए अपनी बीमारी की एक पूरी कहानी तैयार कर ली है—कैसे हुआ, कब हुआ, क्यों हुआ—क्योंकि जब तक आप रिश्तेदारों को बीमारी की पूरी पटकथा नहीं सुनाते, वे चैन से नहीं बैठते। वे उस जांच अधिकारी की तरह होते हैं जो बीमारी की तह तक जाना चाहते हैं, मानो यह कोई रहस्यमयी अपराध हो। “आखिर आप बीमार हुए कैसे?” “और भाई, बीमार होने से पहले हमें खबर क्यों नहीं की?” सही बात है, यह तो निर्लज्जता की बात हुई कि आप बीमारी पाल लेते हैं और रिश्तेदारों को पूर्व सूचना तक नहीं देते। । दस दिन पहले बीमार हुआ, इलाज भी करवा आया, अब जाकर इन्हें पता चला है—और इनके वश में होता तो मुझे फिर से बीमार कर देते, ताकि अपनी पसंद के अस्पताल में भर्ती करवा सकें।
मैं जैसे ही कहता हूँ कि अब ठीक हूँ, तुरंत प्रतिवाद आ जाता है—“ऐसे कैसे ठीक हो गए? इतनी जल्दी? और वो भी इस अल्लू-चप्पू अस्पताल में? हर्गिज़ नहीं!” फिर शुरू होता है अस्पतालों का तुलनात्मक अध्ययन—“फलाँ अस्पताल क्यों नहीं गए?” मैं कहता हूँ कि वह महँगा था और मेरा इंश्योरेंस इसी अस्पताल में चलता था, लो उनका निर्णय आ ही गया—“अरे गर्ग साहब, सस्ते इलाज में पड़ गए आप! ये इंश्योरेंस वाले तो फुकरे अस्पतालों से ही टाई-अप रखते हैं।”
इसके बाद पूछताछ का असली सत्र आरंभ होता है—कैसे हुआ, कब हुआ, पहले क्या खाया था, उससे पहले क्या सोचा था, सोने से पहले क्या सपना आया था। ऐसा प्रतीत होता है मानो मैं जानबूझकर बीमार हुआ हूँ और ये लोग मेरे इरादों की जांच कर रहे हैं। मैं उनके सामने बैठा मुख्य आरोपी हूँ और वे स्वयं को किसी जांच एजेंसी का अधिकारी समझकर मेरी जिंदगी के हर पन्ने को उलट-पुलट रहे हैं। मैं धीरे से कहता हूँ—“बस हल्का बुखार है”—तो वे उछल पड़ते हैं, “हल्का? इसे हल्के में मत लो! हमारे पड़ोसी के मामा के देवर को भी ऐसा ही ‘हल्का’ था… फिर क्या हुआ, मत पूछो।” कहने का आशय यह कि उनका पूरा इरादा है कि अभी-अभी मिले इस हल्के बुखार को वे यहीं बैठकर हार्ट अटैक में अपग्रेड करके ही मानेंगे।
फिर निष्कर्ष निकलता है कि गलती मेरी ही है—मैंने चाय देर से पी, समय पर नहीं सोया, मोबाइल ज्यादा चलाया, एसी चलाया, हीटर नहीं लगाया। हर बीमारी का मूल कारण सर्द-गरम का चिरस्थायी द्वंद्व घोषित कर दिया जाता है। अब मुझे लगने लगा है कि वायरस-वायरस कुछ नहीं होता, असली कारण मौसम विभाग की चेतावनी को नजरअंदाज करना है। यदि मैं समय रहते बादलों से अनुमति लेकर चलता, तो शायद यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।
डॉक्टर ने जो दवा दी है वह तो मात्र औपचारिकता है, असली इलाज तो अब शुरू होता है—“देखिए, आपने सस्ते डॉक्टर से इलाज करवा लिया, अब हमारी सलाह मानिए।” हल्दी वाला दूध, गिलोय, और किसी बाबा का नंबर—ऊपरी हवा, निचली हवा, झाड़-फूँक—सभी विकल्प मेरे सामने परोसे जा रहे हैं। मैं भीतर ही भीतर घबराने लगता हूँ, पसीना आने लगता है, और उधर रिश्तेदार संतुष्ट—मेरी हालत देखकर उनके चेहरे पर संतोष का भाव मुखर हो उठता है कि उनका आना सफल हुआ।
इसी बीच मैं पत्नी को आवाज लगाता हूँ कि चाय इतनी देर क्यों हो गई, शर्मा जी बैठे हैं—“अरे भाभी जी, चाय रहने दीजिए, मैंने चाय छोड़ दी है… आप भी छोड़ दीजिए… नींबू पानी पीजिए।”
श्रीमती जी चाय की ट्रे वापस ले जा रही हैं, नीचे स्टाफ को नींबू लाने का आदेश दे दिया गया है… और मैं शर्मा जी के साथ अभी आधा घंटा और अपनी बीमारी की पोस्टमार्टम रिपोर्ट सुनाने के लिए विवश हूँ।
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