अप्रैल फूल बनाया — उनको ग़ुस्सा आया
आज अप्रैल फूल है। विदेशी संस्कृति के फुलझड़ी-फॉर्मेट में यह एक ऐसा पटाखा है, जिसे हमने इतनी श्रद्धा से अपनाया है कि अब यह त्योहार कम और ‘ट्रेंडिंग ट्रोल’ ज्यादा लगने लगा है। सुबह से ही मोबाइल की स्क्रीन पर प्रैंक-पैंतरे-प्रपंच की परेड लगी है—रीलें रेंग रही हैं, यूट्यूब उछल रहा है, और कंटेंट क्रिएटर की आत्मा एल्गोरिद्म के चरणों में लोटपोट हो रही है।
यह दिन उन चैनलों के लिए वरदान है, जो सालभर सूखे पड़े रहते हैं—आज उन पर लाइक, कमेंट और सब्सक्रिप्शन की ऐसी बरसात होती है, मानो बेरोज़गारी का बादल अचानक फट पड़ा हो। सच कहें तो आज की पीढ़ी के लिए रोजगार का एकमात्र राष्ट्रीय उद्योग बचा है—“रील-निर्माण उद्योग”। और इसमें भी उत्पादन की गुणवत्ता का पैमाना है—आप कितनी बेहूदगी के साथ कितनी जल्दी वायरल हो सकते हैं।
अप्रैल फूल को हम ऐसे मनाते हैं जैसे कोई राष्ट्रीय मूर्खता महोत्सव हो। पर जरा ठहर कर सोचिए—क्या हमें इसके लिए किसी एक दिन की ज़रूरत है? हमारे यहाँ तो यह पर्व बारहमासी है। यहाँ हर दिन ‘अप्रैल फूल’ है, बस कैलेंडर में तारीख़ बदल जाती है, मूर्खता का मौसम स्थायी रहता है। जैसे पति का हर दिन मजदूर दिवस होता है, वैसे ही जनता का हर दिन मूर्ख दिवस होता है।
देश की जनता को रोज़-रोज़ नए-नए पैकेज में मूर्ख बनाया जा रहा है—कभी योजना के नाम पर, कभी रेवड़ी के नाम पर, कभी ईएमआई की ईमानदारी में, कभी लोन माफी के लोभ में। मूर्खता अब व्यक्तिगत नहीं, संस्थागत हो चुकी है—एक संगठित उद्योग, जिसमें हर वर्ग की भागीदारी है।
‘आम जनता’ भी अब एक ब्रांड बन चुकी है—एक ऐसा लेबल, जिसे हर नेता अपने भाषण में चिपकाकर वोटों का व्यापार करता है। टीवी डिबेट में ‘आम आदमी’ पर इतनी चर्चा होती है कि लगता है जैसे यह कोई विलुप्त प्रजाति है, जिसे केवल स्टूडियो में ही देखा जा सकता है। और जो लोग यह चर्चा सुनते हैं, वे भी ‘आम’ नहीं, बल्कि ‘आम जैसे दिखने वाले खास’ लोग होते हैं—मध्यम वर्ग।
यह मध्यम वर्ग भी बड़ा मज़ेदार प्राणी है—जेब में आम, सपनों में खास। खर्च में खुरचन, इच्छाओं में इंपोर्टेड। यह वर्ग हर बार मूर्ख बनता है और फिर उसी मूर्खता को अपनी उपलब्धि समझकर गर्व से गले लगाता है।
वैसे मूर्ख बनना भी एक कला है—और मूर्ख बनाना तो उससे भी बड़ी कला। नेता जी इस कला के राष्ट्रीय प्रशिक्षक हैं। उन्हें ऐसी जनता चाहिए जो रैली में तालियाँ बजाए और मतदान केंद्र पर बिना सवाल किए मोहर लगा दे। योजनाओं की स्क्रिप्ट भी मूर्ख लिखते हैं, भाषण भी मूर्ख पढ़ते हैं, और तालियाँ भी मूर्ख बजाते हैं—लोकतंत्र का यह ‘मूर्खतंत्र’ पूरी दक्षता से संचालित हो रहा है।
राजनीति का मंच अब हास्य-रस का महाकुंभ बन चुका है—कोई आलू से सोना बना रहा है, कोई पानी से बिजली निकाल रहा है। बॉस प्रमोशन के नाम पर काम निकलवा रहा है, शिक्षक स्टूडेंट को होमवर्क देकर सह शिक्षिका के साथ प्रेम का प्रैक्टिकल कर रहे हैं। हर जगह मूर्खता का मल्टीप्लेक्स खुला है—टिकट भी आप ही खरीदते हैं और दर्शक भी आप ही हैं।
कोरोना भी शायद इसी मूर्खता से घबराकर भागा होगा। उसने देखा कि यहाँ लोग थाली-ताली-तंत्र-मंत्र से उसे मात दे रहे हैं—वह बेचारा वायरस भी सोच में पड़ गया होगा, “जब ये खुद ही इतने बड़े वायरस हैं, तो मैं क्या करूँ!”
प्रेम-प्रसंगों में भी मूर्खता की महिमा अपरंपार है। लड़कियों की शर्तें देखिए—सुंदर हो, सुशील हो, अच्छा घर हो—पर बुद्धिमान होने की कोई अनिवार्यता नहीं। क्योंकि बुद्धिमान व्यक्ति सवाल पूछता है, और मूर्ख व्यक्ति जीवनभर आदेश मानता है—और प्रेम में सवाल पूछना बेबफाई है ।
कॉलेज के दिनों की याद आती है—1 अप्रैल को प्रस्तावों की बाढ़ आ जाती थी। प्रेम का प्रपोजल और प्रतिष्ठा का प्रबंधन, दोनों साथ-साथ चलते थे। अगर बात बन गई तो प्रेम, और नहीं बनी तो “अप्रैल फूल बनाया” कहकर गिरते आत्मसम्मान को सी पी आर दे दी जाती थी ।
मीडिया ने तो मूर्खता को पूर्णकालिक पेशा बना लिया है—टीआरपी के तवे पर कुतर्क को तलकर परोसा जा रहा है। बहसें ऐसी कि लगता है कुश्ती का लाइव प्रसारण हो रहा हो। रियलिटी शो में रियल कम और रील ज्यादा है—और दर्शक अपनी मूर्खता पर मुस्कुराते हुए उसे मनोरंजन समझ लेते हैं।
खैर, मूर्ख बनना भी अब जीवन का अनिवार्य अंग हो गया है। जो एक बार मूर्ख बन गया, उसे फिर यह एहसास ही नहीं होता कि वह दोबारा भी बन रहा है। वह इसे जीवन-दर्शन मानकर आत्मसात कर लेता है।
अभी तो दिन आधा ही बीता है। मैं भी सतर्क बैठा हूँ—कहीं कोई मुझे मूर्ख बना दे, ताकि मेरा अप्रैल फूल सफल हो जाए। वरना डर है कि कहीं मैं आज भी समझदार रह गया, तो यह दिन व्यर्थ न चला जाए।
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