हालात काबू में हैं —
चीखें हवा में तैर रही थीं, पर सायरनों की तेज़ आवाज़ ने उन्हें ढँक लिया—व्यवस्था का संगीत शुरू हो चुका था। एम्बुलेंस, पुलिस और मीडिया—तीनों अपने-अपने किरदार में सक्रिय थे। कैमरे ऐसे कोण तलाश रहे थे जहाँ लाशें और रोते परिजन एक साथ फ्रेम में आ जाएँ—दर्द का पूरा ‘विज़ुअल पैकेज’ बन सके।
कुछ शव बेतरतीब पड़े थे, मगर अनुशासन मृत्यु के बाद भी लागू हुआ। एक पुलिस अधिकारी ने उन्हें लाइन में सजा दिया। सफेद कफन ओढ़ाए गए—सरकारी खर्चे के। जीते-जी न मिला कपड़ा, मरने के बाद पूरा इंतजाम था।
तभी मंत्री जी का काफिला आ पहुँचा। भीड़ का रोना क्षण भर को थम गया—दर्शन का अवसर जो मिला था। चार साल बाद दिखे चेहरे को देखने की ललक, त्रासदी से भी बड़ी थी।
मंत्री जी लाशों के पास खड़े हुए, दुख का अभ्यास किया गया भाव चेहरे पर लाए। कैमरे तैयार थे, पर उन्होंने इशारा किया—“सीन तैयार करो।”
कुछ लाशें और उनके परिजन ‘चयनित’ किए गए, बाकी को हटा दिया गया। जैसे ही आँखों से दो बूँदें टपकीं—या टपकने का संकेत मिला—कैमरों के फ्लैश चमक उठे।
मुआवजे की घोषणा हुई। परिजनों की आँखों में आँसू और उँगलियों पर गणित साथ-साथ चलने लगा।
तभी डीएम ने पूछा—“कुछ घायल और मर सकते हैं, उनके लिए ?”
मंत्री जी बोले—“चार दिन रुक जाओ, फिर एक साथ देख लेंगे।”
डॉक्टर को चेतावनी दी गई—“अब जो मरेगा, वह अस्पताल की जिम्मेदारी होगी।”
फिर काफिला आगे बढ़ गया—अगली संवेदना की ओर।
पुलिस भीड़ को कण्ट्रोल करने में फिर जुट गयी ।
इधर सरकारी प्रवक्ता ने कागज से पढ़ा—
“हालात काबू में हैं।”
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