मेडिकल कॉन्फ़्रेंस: मेरे संस्मरणों से
चिकित्सा शिक्षा में निरंतर उन्नयन के लिए सम्मेलनों की परंपरा कोई आज की खोज नहीं है। यह प्रथा उतनी ही पुरानी है, जितनी हमारी मेडिकल की किताबें,बस फर्क इतना है कि किताबें धीरे-धीरे पतली होती गईं और कॉन्फ़्रेंस मोटी। कॉलेज के दिनों से ही सम्मेलनों की चर्चा आम बात थी। खासकर हम हॉस्टलवासियों के लिए तो कॉमन रूम का सबसे गरमागरम विषय वही हुआ करता था,कौन-सा विभाग कब कॉन्फ़्रेंस करा रहा है और उसमें खाने का क्या इंतज़ाम है।
ये चर्चाएँ उस दिन चरम पर पहुँच जाती थीं, जिस दिन मेस बंद हो। ऐसे दिन लड़कों के झुंड अपने-अपने लीडर के पीछे ऐसे मार्च करते थे, मानो किसी अकादमिक क्रांति में भाग लेने जा रहे हों। सम्मेलन स्थल पर पहुँचकर “ज्ञानार्जन” के नाम पर अधिकारपूर्वक धक्का-मुक्की होती, और हम अंदर घुस ही जाते। कॉलेज प्रशासन हमारे इस अचानक जागे हुए बौद्धिक उत्साह से ज़्यादा खुश नहीं होता था और कई बार हमें दरवाज़े से ही धकिया देता, लेकिन हम भी कहाँ हार मानने वाले थे। येन-केन-प्रकारेण ज्ञान-पूर्ति कम और उदर-पूर्ति के इस यज्ञ में हम भाग ले ही लेते थे। अकादमिक रुचि का तो ठीक-ठीक पता नहीं, पर इतना तय था कि मेस बंद होने पर सम्मेलन हमारे लिए जीवनरक्षक सिद्ध होता था।
और हाँ, यहाँ ‘पीने’ से मेरा तात्पर्य हॉस्टल के जल बोर्ड के सड़ांधयुक्त जल से नहीं, बल्कि बिस्लेरी की बोतलबंद शुद्धता से है।
अधिकांश हॉस्टलवासियों की सम्मेलन में रुचि खाने-पीने तक ही सीमित रहती थी,और ‘पीने’ का अर्थ यहाँ शब्दशः लिया जा सकता है। फिर कॉलेज खत्म हुआ, प्रैक्टिस शुरू हुई, शादी हुई और जिम्मेदारियाँ ऐसी लदीं कि सम्मेलन से दूरी बन गई। लेकिन एक दिन श्रीमती जी ने न जाने कहाँ से सुन लिया कि मेडिकल कॉन्फ़्रेंस सिर्फ अकादमिक नहीं होते, बल्कि पूरे परिवार के मनोरंजन का भी पूरा ख्याल रखते हैं। बस फिर क्या था,श्रीमती जी ने ऐलान कर दिया, “इस बार सम्मेलन जाना है। आपकी भी ज्ञान-वृद्धि हो जाएगी।”
उनकी अचानक जागी चिंता ने मुझे चौंका दिया। इन्हें कैसे पता चला कि हम थोड़े-बहुत ‘भोंट’ हो गए हैं और दिमाग के इस सिल-बट्टे पर थोड़ी ज्ञान-घिसाई जरूरी है? जवाब उनके हाथ में पकड़े ब्रोशर में था। एक इम्प्लांट कंपनी का मैनेजर इस बार हमें सम्मेलन भेजने पर आमादा था। हमारे बार-बार टालने पर उसने सीधे श्रीमती जी को टार्गेट किया,सब्ज़बाग दिखाए, सपने सजाए और हमें राज़ी कराने का पूरा अभियान चलाया।
जहाँ सम्मेलन होना था, वह शहर हमने कभी देखा भी नहीं था। ब्रोशर में अकादमिक गतिविधियों का एक छोटा-सा पन्ना आख़िर में चिपका दिया गया था, बाकी पूरा ब्रोशर किसी ट्रैवल कंपनी का लग रहा था। आस-पास घूमने की जगहों का सचित्र वर्णन ऐसे किया गया था मानो पूरा शहर पलक-पाँवड़े बिछाकर हमारा इंतज़ार कर रहा हो।
सम्मेलन पहुँचे तो मुझसे ज़्यादा उत्साह श्रीमती जी में था। उन्होंने एक और दंपती को भी राज़ी कर लिया था और दोनों श्रीमती जी पहले ही पूरा टूर-प्लान सेट कर चुकी थीं। सम्मेलन स्थल की सजावट हाई-टेक थी,डिजिटल तकनीक, क्यूआर कोड वाले आईडी कार्ड, ताकि कोई बिना ज्ञान के अंदर न घुस सके।
श्रीमती जी तो सीधे फैमिली ज़ोन में अटक गईं,बच्चों के लिए गेम ज़ोन, महिलाओं के लिए मेहंदी, हीना, साड़ियाँ, चूड़ियाँ। फार्मा कंपनियाँ अच्छी तरह जानती हैं कि अगर डॉक्टर के प्रिस्क्रिप्शन पर असर डालना है तो रास्ता उनकी पत्नियों से होकर ही जाता है। इसलिए डॉक्टर से ज़्यादा ध्यान उनकी वाइफ पर दिया जाता है।
उसी बीच वही इम्प्लांट कंपनी का मैनेजर हमें मिल गया,बत्तीसी दिखाता, खींसे निपोरता, अपनी कूटनीति की सफलता का जश्न मनाता हुआ। बेमन से उसकी स्टॉल पर जाना पड़ा, रिव्यू बुक में पाँच सितारे ठोकने पड़े। बदले में दो चॉकलेट और एक फाउंटेन पेन पकड़ा दिया गया,ज्ञान का यही प्रतिफल था।
हर स्टॉल पर डॉक्टर लाइन में लगे थे। कहीं गेम, कहीं गिफ्ट, कहीं ब्रेकफास्ट, चाय-कुकीज़ और कॉफ़ी। कॉम्प्लिमेंटरी गिफ्ट्स की ऐसी बौछार कि श्रीमती जी के पीछे-पीछे गिफ्टों से भरे बैग ढोते डॉक्टर ऐसे लग रहे थे मानो तीर्थयात्रा से लौट रहे हों। सीनियर डॉक्टर फ्री गिफ्ट के लिए लाइनों में ऐसे खड़े थे, जैसे भंडारे में लंगर बंट रहा हो।
किसी तरह श्रीमती जी को वहाँ छोड़कर मैं ऑडिटोरियम पहुँचा। व्याख्यान चल रहा था। आगे की कुछ सीटें भरी थीं, बाकी खाली। भरी सीटों पर भी भारी नाश्ता डकार कर वरिष्ठ डॉक्टर ऊँघ रहे थे। अभी बैठा ही था कि श्रीमती जी का फोन आ गया,“भूख लगी है, पहले कुछ खा लेते हैं।”
मैं बेमन से उठा, व्याख्याता की नज़र बचाकर बाहर निकला। शायद मेरे निकलते ही उनके सब्र का बाँध टूट गया, उन्होंने व्याख्यान समेट दिया और आगे बैठे श्रोताओं ने राहत की तालियाँ बजाईं।
फूड कोर्ट का रास्ता पूछने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी। गार्ड ने इशारे से बता दिया,“जहाँ सब जा रहे हैं, बस उसी के पीछे हो लो।” बाहर श्रीमती जी कूपन हाथ में लिए इंतज़ार कर रही थीं। आते ही बोलीं,“कब से इंतज़ार कर रही थी। और सुनो, कुछ स्टॉल गिफ्ट तभी देंगे जब आप चलोगे। एक जगह तो महँगा पर्स भी मिल रहा है।”
मैंने सिर हिलाया और उनके पीछे-पीछे चल दिया।
चलते-चलते वे बताती रहीं,“शाम को सिटी टूर है, कल डे-टूर भी बुक करा लिया है, कॉन्फ़्रेंस वालों ने स्पेशल डिस्काउंट दिया है।”
मैं मन ही मन सोच रहा था,अकादमिक सेशन का हवाला देना बेकार है। चार दिन की कॉन्फ़्रेंस में दो दिन गिफ्ट और कतार में कट गए। ज्ञान का क्या है, वो तो हर साल बँटता ही रहता है। उसके लिए सीएमई की सीडी मंगवा लूँगा। अभी तो एक अच्छे पति का धर्म निभाना ज़रूरी है।
और यह सोचते हुए, मैं पूरे समर्पण भाव से अपना कूपन फूड कोर्ट के गेट पर स्कैन करवा रहा था।
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