“मंदिर की घंटियों से पहले किसी भूखे की पुकार सुनिए—शायद उसी रूप में ईश्वर आपके द्वार पर आया हो।”
हमारी कबीर भजन शृंखला के पहले गीत “मन रे, ज़रा ठहर तो सही” को श्रोताओं ने जिस आत्मीयता से स्वीकार किया, वह हमारे लिए अत्यंत सुखद और प्रेरणादायक अनुभव रहा। गीत को मिली अप्रत्याशित प्रतिक्रिया, प्रेमपूर्ण टिप्पणियों और निरंतर प्रोत्साहन के लिए आप सभी श्रोताओं का हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद।
आपके इसी स्नेह से प्रेरित होकर कबीर भजन शृंखला की दूसरी प्रस्तुति के रूप में प्रस्तुत है—
दर पे भूखा बैठा रे
यह केवल एक भजन नहीं, बल्कि हमारे आचरण, पूजा-पद्धति और धार्मिक जीवन से एक सीधा प्रश्न है। हम मंदिरों में जाते हैं, दीपक जलाते हैं, घंटियाँ बजाते हैं, व्रत रखते हैं और माला फेरते हैं; लेकिन उसी समय हमारे दरवाजे पर बैठा कोई भूखा व्यक्ति, असहाय बच्चा या बेजुबान जीव खाली हाथ लौट जाए, तो क्या हमारी पूजा वास्तव में पूर्ण कही जा सकती है?
कबीर की निर्भीक और सहज वाणी से प्रेरित यह गीत बताता है कि दया के बिना धर्म अधूरा है और सेवा के बिना साधना केवल बाहरी आडंबर बनकर रह जाती है।
गीत सुनें
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दर पे भूखा बैठा रे — सम्पूर्ण गीत
आलाप
आ… आ… रे मनवा…
राम बसे भूखे की आह में,
राम बसे दीनों की चाह में…
अल्लाह हू… राम नाम…
साईं हू… हरि नाम…
मुखड़ा
दर पे भूखा बैठा रे,
तू मंदिर-मंदिर जाए रे।
कहै कबीर सुनो भई साधो,
ये कैसी पूजा गाए रे।
दर पे बैठा बेजुबान,
तू घंटा जोर बजाए रे।
रोटी देकर देख जरा तू,
राम स्वयं मुस्काए रे।
अंतरा 1
माथे तिलक लगाए फिरता,
हाथ में माला भारी रे।
मन में दया न जागी तेरे,
फिर कैसी तैयारी रे।
भूखे बच्चे की आँखें पूछें,
कहाँ गया उपवास रे।
एक निवाला दे न पाया,
करे मोक्ष की आस रे।
कोरस
राम नहीं केवल पत्थर में,
राम नहीं दरबार में।
राम दिखेगा दीन के दिल में,
गरीबों के उपकार में।
मुखड़ा
दर पे भूखा बैठा रे,
तू मंदिर-मंदिर जाए रे।
कहै कबीर सुनो भई साधो,
ये कैसी पूजा गाए रे।
अंतरा 2
दान-पुण्य की बातें करता,
ऊँची-ऊँची वाणी रे।
दरवाजे से लौटा दी जब,
एक भूखी जिंदगानी रे।
तेरे दीप जले सौ-सौ हों,
मन का अँधियारा है।
जिस घर में करुणा मर जाए,
वह घर भी बंजारा है।
साखी
कबिरा कहे सुनो रे भाई,
प्रेम बिना सब रीति पराई।
धरम-दान सब बाद में बंदे,
पहले कर ले नेक कमाई।
अंतरा 3
कुत्ता, पंछी, गाय या कोई,
द्वार तुम्हारे आया रे।
ईश्वर ने ही रूप बदलकर,
तेरा मन आजमाया रे।
तूने झिड़का, पत्थर मारा,
धर्म अकड़ माने चला।
आँसू उसकी आँखों में थे,
तू भजन गाने चला।
कोरस
दया बिना सब धर्म अधूरा,
प्रेम बिना सब ज्ञान रे।
भूखे को जो अन्न खिलाए,
उसमें सच्चा भगवान रे।
मुखड़ा
दर पे भूखा बैठा रे,
तू मंदिर-मंदिर जाए रे।
कहै कबीर सुनो भई साधो,
ये कैसी पूजा गाए रे।
रोटी देकर देख जरा तू,
राम स्वयं मुस्काए रे।
प्यासे को जब जल पिलाए,
साईं गले लग जाए रे।
सूफियाना ब्रिज
न सोने का मुकुट चाहिए,
न चाँदी का हार रे।
एक दुआ उस भूखे की ही,
करा दे भव-पार रे।
न ऊँचे शंख, न ऊँची आरती,
न बड़ा उपवास रे।
जिसके मन में दया उतर गई,
वही सच्ची अरदास रे।
सूफी कोरस
अल्लाह-राम… अल्लाह-राम…
भूखे में है तेरा नाम।
साईं-राम… साईं-राम…
सेवा ही सबसे बड़ा धाम।
अंतरा 4
तेरे आँगन आई करुणा,
तूने पहचाना नहीं।
रूप बदलकर आया हरि था,
तूने जाना नहीं।
मंदिर की सीढ़ी क्या चढ़ना,
जब अहंकार घर कर जाए।
भूखे को तू रोटी दे दे,
तेरा जीवन तर जाए।
अंतिम मुखड़ा
दर पे भूखा बैठा रे,
तू मंदिर-मंदिर जाए रे।
कहै कबीर सुनो भई साधो,
ये कैसी पूजा गाए रे।
दया जहाँ है, धर्म वहीं है,
बाकी सब दिखलावा रे।
भूखे को जो गले लगाए,
उसने हरि को पाया रे।
समापन आलाप
आ… आ… रे मनवा…
दया कर… सेवा कर…
राम नाम मत केवल बोल,
भूखे में भी राम टटोल…
अल्लाह हू… राम नाम…
साईं हू… हरि नाम…
सच्ची पूजा का वास्तविक अर्थ
पूजा मनुष्य को संवेदनशील, विनम्र और करुणामय बनाने की प्रक्रिया है। यदि नियमित पूजा करने के बाद भी हमारे भीतर किसी भूखे की पीड़ा देखकर दया नहीं जागती, तो हमें अपने आध्यात्मिक जीवन पर पुनर्विचार करना चाहिए।
यह गीत मंदिर जाने या धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध नहीं करता। इसका संदेश यह है कि पूजा के साथ सेवा और साधना के साथ संवेदना भी आवश्यक है। मंदिर में चढ़ाया गया प्रसाद तभी सार्थक है, जब उसका कुछ अंश किसी जरूरतमंद तक भी पहुँचे।
घंटी की आवाज ईश्वर तक पहुँचे या न पहुँचे, लेकिन भूखे को दी गई रोटी उसकी आत्मा से निकली दुआ बनकर अवश्य लौटती है।
मनुष्य ही नहीं, प्रत्येक जीव में ईश्वर
गीत का एक महत्वपूर्ण अंतरा हमें पशु-पक्षियों और अन्य बेजुबान जीवों के प्रति भी संवेदनशील बनाता है—
कुत्ता, पंछी, गाय या कोई,
द्वार तुम्हारे आया रे।
ईश्वर ने ही रूप बदलकर,
तेरा मन आजमाया रे।
हमारे आसपास अनेक जीव भूख, प्यास और असुरक्षा से जूझते हैं। उनके लिए एक कटोरी पानी रखना, पक्षियों के लिए दाना डालना, किसी भूखे पशु को भोजन देना या किसी असहाय मनुष्य की सहायता करना भी पूजा का ही एक स्वरूप है।
धर्म केवल शब्दों और प्रतीकों में नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार में दिखाई देना चाहिए।
कबीर-वाणी का संदेश
संत कबीर ने अपने दोहों और साखियों में बार-बार बाहरी आडंबरों से ऊपर उठकर प्रेम, सत्य, करुणा और आत्मबोध को महत्व दिया। उनकी वाणी मनुष्य को किसी विशेष धर्म से दूर नहीं करती, बल्कि धर्म के वास्तविक उद्देश्य के निकट ले जाती है।
इसी भावना को गीत की इन पंक्तियों में व्यक्त किया गया है—
दया बिना सब धर्म अधूरा,
प्रेम बिना सब ज्ञान रे।
भूखे को जो अन्न खिलाए,
उसमें सच्चा भगवान रे।
भजन में राम, हरि, साईं और अल्लाह के नाम एक साथ आते हैं। यह विविध धार्मिक परंपराओं के बीच प्रेम, सेवा और मानवता के साझा सूत्र को रेखांकित करता है।
छोटी-सी शुरुआत भी बड़ी सेवा बन सकती है
हर व्यक्ति बड़े स्तर पर सेवा नहीं कर सकता, लेकिन छोटी शुरुआत अवश्य कर सकता है।
अपने घर के बाहर स्वच्छ पानी रखना, जरूरतमंद को भोजन कराना, बचा हुआ भोजन सुरक्षित रूप से वितरित करना, अस्पताल में किसी असहाय मरीज की सहायता करना या किसी पशु-पक्षी के लिए दाना-पानी उपलब्ध कराना—ऐसे छोटे कार्य भी समाज में करुणा की बड़ी धारा पैदा कर सकते हैं।
सच्ची सेवा प्रसिद्धि या प्रदर्शन के लिए नहीं, बल्कि किसी की पीड़ा कम करने के लिए की जाती है।
आपसे एक प्रश्न
आपके अनुसार सच्ची पूजा क्या है—केवल धार्मिक अनुष्ठान या किसी जरूरतमंद की निस्वार्थ सहायता?
अपनी भावनाएँ और विचार YouTube वीडियो के Comment Box तथा इस ब्लॉग पोस्ट के नीचे अवश्य साझा करें।
आपकी प्रतिक्रिया हमें आगे भी ऐसे ही अर्थपूर्ण, आध्यात्मिक और समाजोपयोगी गीत प्रस्तुत करने की प्रेरणा देती है।
कबीर भजन शृंखला के पहले गीत “मन रे, ज़रा ठहर तो सही” को मिले आपके प्रेम और उत्साहवर्धक समर्थन के लिए एक बार पुनः हृदय से धन्यवाद।
आशा है “दर पे भूखा बैठा रे” भी आपके हृदय को स्पर्श करेगा और हमें अपने आसपास मौजूद जरूरतमंद मनुष्यों तथा बेजुबान जीवों के प्रति अधिक संवेदनशील बनने की प्रेरणा देगा।
दया जहाँ है, धर्म वहीं है।
सेवा जहाँ है, ईश्वर वहीं है।
— Dr. Mukesh Aseemit
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