माटी की गगरी: कबीर-दर्शन से पर्यावरण संरक्षण तक — माटी बचे तो हम बचें
हम विकास की दौड़ में बहुत आगे निकल आए हैं। ऊँची इमारतें हैं, तेज़ रफ्तार गाड़ियाँ हैं, स्क्रीन पर पूरी दुनिया समाई हुई है और डेटा के महल लगातार ऊँचे होते जा रहे हैं। लेकिन इसी यात्रा में कहीं पीछे छूटती जा रही है वह माटी, जिससे हमारा शरीर बना है; वह जल, जिसके बिना जीवन संभव नहीं; वे जंगल, जो हमारी साँसों के मौन रक्षक हैं; और वह हवा, जिसे हमने विकास के धुएँ से इतना भर दिया है कि अब साँस लेना भी कई शहरों में एक चुनौती बनता जा रहा है।
इसी बेचैनी और इसी प्रश्न से जन्मी है मेरी नई संगीत-काव्य प्रस्तुति — “माटी की गगरी”।
यह केवल एक भजन नहीं है। यह कबीर की निर्गुण चेतना के सहारे आज के मनुष्य से किया गया एक संवाद है—जिस धरती पर हमारा जीवन टिका है, यदि वही नहीं बची तो हमारा विकास, हमारा वैभव, हमारा डेटा और हमारी पहचान आखिर किस काम की रह जाएगी?
“माटी की गगरी” के पीछे की कहानी
संत कबीर बार-बार मनुष्य को उसकी क्षणभंगुरता का बोध कराते हैं। उनके दर्शन में माटी केवल मिट्टी नहीं है; वह मनुष्य के अहंकार को आईना दिखाने वाली एक विराट उपमा है।
मनुष्य माटी से बना है और अंततः माटी में ही मिल जाना है। फिर यह अहंकार किस बात का?
यहीं से मेरे मन में एक दूसरा प्रश्न उठा—
यदि मनुष्य की देह माटी की गगरी है, तो क्या हमारी पृथ्वी भी एक विशाल गगरी नहीं है?
एक मिट्टी का घड़ा बाहर से कितना भी सुंदर क्यों न दिखाई दे, उसकी दीवार में एक छोटी-सी दरार भी धीरे-धीरे उसका सारा जल बहा सकती है। ठीक उसी प्रकार पृथ्वी के पर्यावरण में पड़ती छोटी-बड़ी दरारें—जंगलों की कटाई, जल का अंधाधुंध दोहन, प्रदूषण, कार्बन उत्सर्जन, अत्यधिक उपभोग और प्राकृतिक संसाधनों का अनियंत्रित इस्तेमाल—एक दिन पूरे जीवन-तंत्र को संकट में डाल सकती हैं।
इसी विचार से पंक्ति उभरी—
“माटी की गगरी धीरे रखना रे,
धरती की चादर साफ ही रखना रे।”
और फिर कबीर की आध्यात्मिक प्रतीक-भाषा आधुनिक पर्यावरणीय चिंता से जुड़ती चली गई।
कबीर भजन के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश
पर्यावरण पर बहुत-से भाषण दिए जाते हैं। आँकड़े प्रस्तुत किए जाते हैं। सम्मेलनों में कार्बन फुटप्रिंट, जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और सस्टेनेबिलिटी जैसे शब्द बार-बार सुनाई देते हैं।
लेकिन कभी-कभी आँकड़ों से अधिक प्रभावी एक गीत होता है।
कभी कोई इकतारा वह बात कह देता है, जो सौ पन्नों की रिपोर्ट नहीं कह पाती।
इसीलिए “माटी की गगरी” में पर्यावरण संरक्षण का संदेश किसी उपदेश की तरह नहीं, बल्कि कबीर की सहज लोकभाषा और निर्गुण दर्शन के माध्यम से रखने का प्रयास किया गया है।
गीत हमें याद दिलाता है—
जल केवल वस्तु नहीं—जीवन है।
वन केवल लकड़ी नहीं—हमारी श्वास हैं।
माटी केवल जमीन नहीं—हमारी देह का भविष्य है।
हम प्रकृति के मालिक नहीं हैं। हम उसी प्रकृति की एक क्षणभंगुर संतान हैं।
पृथ्वी हमें विरासत में मिली संपत्ति मात्र नहीं है; यह आने वाली पीढ़ियों का भी अधिकार है।
इसलिए गीत का मूल संदेश बेहद सरल है—
कम उपभोग करें।
प्रकृति से उतना ही लें, जितना वह पुनः उत्पन्न कर सके।
जल, जंगल, जमीन और माटी को आने वाली पीढ़ियों के लिए बचाएँ।
और सबसे महत्वपूर्ण—
माटी बचे तो हम भी बचेंगे।
यह संत कबीर की मूल रचना नहीं है
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि “माटी की गगरी” संत कबीर की कोई मूल अथवा प्रामाणिक रचना नहीं है।
यह कबीर-दर्शन, निर्गुण भक्ति परंपरा और कबीर की प्रतीकात्मक काव्य-भाषा से प्रेरित एक मौलिक संगीत-काव्य प्रस्तुति है।
कबीर की “माटी”, “गगरी”, “माया”, “चदरिया”, क्षणभंगुर देह और अहंकार-विरोध जैसी आध्यात्मिक अवधारणाओं को वर्तमान समय की पर्यावरणीय चुनौतियों से जोड़ने का एक रचनात्मक प्रयास इसमें किया गया है।
संगीत की शैली और Genre
“माटी की गगरी” को किसी एक पारंपरिक संगीत शैली में सीमित करना कठिन है। इसे मोटे तौर पर इस प्रकार परिभाषित किया जा सकता है—
Kabir-inspired Nirgun Folk | Spiritual Folk Fusion | Environmental Musical Poetry | Ambient Folk Soundscape
इस प्रस्तुति में पाँच तत्व एक साथ चलते हैं—
संवाद + काव्य + निर्गुण भजन + लोकसंगीत + आधुनिक साउंडस्केप
गीत की जड़ें भारतीय लोक एवं निर्गुण परंपरा में हैं, लेकिन उसकी ध्वनि-यात्रा वर्तमान समय तक आती है।
पारंपरिक वाद्य
रचना में लोक एवं आध्यात्मिक वातावरण के लिए—
- तानपुरा
- इकतारा
- बांसुरी
- रबाब
- मृदंग
- खड़ताल
- मिट्टी के घड़े की थाप
जैसी ध्वनियों का उपयोग इसकी आत्मा को भारतीय माटी से जोड़ता है।
आधुनिक Soundscape
दूसरी ओर—
सूखी धरती के चटकने की आवाज़,
दूर चलती मशीनों की गूँज,
फैक्ट्रियों का औद्योगिक शोर,
डिजिटल नोटिफिकेशन,
हवा, वर्षा और पक्षियों की प्राकृतिक आवाज़ें
सिर्फ background effects नहीं हैं।
वे भी गीत के पात्र हैं।
औद्योगिक और डिजिटल ध्वनियाँ आधुनिक मनुष्य की माया, उपभोग और कार्बन पदचिह्न का प्रतीक बनती हैं, जबकि वर्षा, हवा, नदी और पक्षियों की आवाजें उस प्राकृतिक संसार की स्मृति कराती हैं जिससे हम धीरे-धीरे दूर होते जा रहे हैं।
“झीनी चदरिया” से धरती की चादर तक
कबीर की आध्यात्मिक भाषा में “चदरिया” मनुष्य की देह और जीवन की पवित्रता का प्रतीक बनती है।
इसी प्रतीक को इस रचना में पृथ्वी और उसके वायुमंडल से जोड़ते हुए कहा गया है—
“झीनी-झीनी धरती चादर,
नीला इसका ताना,
हवा, नदी और वन के धागे,
बुनते जीवन गाना।”
यह पृथ्वी भी एक झीनी चादर है।
उसका वातावरण सीमित है।
उसका जल सीमित है।
उसकी उपजाऊ माटी सीमित है।
उसके जंगल सीमित हैं।
हमने धुएँ से इस चादर में छेद किए हैं और लोभ के दाग उस पर लगातार गहरे करते गए हैं।
आने वाली पीढ़ी जब हमसे प्रश्न करेगी कि उन्हें कैसी पृथ्वी देकर गए, तब शायद हमारे पास केवल विकास के आँकड़े पर्याप्त उत्तर नहीं होंगे।
गीत की अध्यायबद्ध यात्रा
🎵 पूरा वीडियो YouTube पर देखें
00:00 — माटी का अभिमान और हमारा अस्तित्व
मनुष्य के अहंकार, माया और माटी से बने उसके क्षणभंगुर अस्तित्व से कथा आरंभ होती है।
02:26 — विकास की दौड़ में छूटे कार्बन के निशान
विकास, प्रदूषण, जंगलों की कटाई और कार्बन फुटप्रिंट पर सवाल उठाए जाते हैं।
04:32 — डाटा के महल और वीरान होता मन
डिजिटल उपलब्धियों के बीच प्रकृति और मनुष्य के भीतर बढ़ते खालीपन की बात।
05:32 — पुरानी बुद्धि में छिपा समाधान
कम उपभोग, सादगी, जल-जंगल-जमीन के सम्मान और पूर्वजों की जीवन-दृष्टि की ओर लौटने का संदेश।
10:29 — रेत पर सपनों की नगरी का अंत
अंततः मनुष्य के अहंकार और क्षणभंगुर संसार का बोध—मुट्ठी बाँधकर आए थे, खाली हाथ जाना है।
“माटी की गगरी” — गीत के पूरे बोल
माटी का घरौदा
माटी का घरौदा रे,
माटी का घरौदा रे।
माटी का घरौदा रे मनवा,
काहे करे घमंड।
पल भर की ये छाँव रे,
माया का पाखंड।
माटी का घरौदा रे,
माटी का घरौदा रे।
माटी की गगरी
माटी की गगरी तन हमारा,
काहे इतना मान रे।
एक दरार में जल बह जाए,
कहाँ रहे अभिमान रे।
माटी से ही देह बनाई,
माटी से संसार।
माटी को ही राख कर डाला,
लोभ हुआ सरदार।
माटी की गगरी, माटी की गगरी,
टूटेगी एक दिन रे।
धरती की गगरी, धरती की गगरी,
सूख रही हर दिन रे।
हमने अपने पाँव के नीचे कार्बन के निशान छोड़े,
पर हमें लगा वे दिखाई नहीं देते।
हमने जंगल काटे,
नदियाँ बाँधीं,
पर्वत खोदे
और आकाश को धुएँ से भर दिया।
फिर भी हम स्वयं को सभ्य कहते रहे।
यह केवल नीति की विफलता नहीं है।
यह स्मृति की विफलता है।
हम भूल गए—
हम प्रकृति के स्वामी नहीं,
उसी माटी की क्षणभंगुर संतान हैं।
कार्बन के निशान
पग-पग काला चिन्ह है छोड़ा,
धरती पूछे बात।
कितना और जलाओगे तुम,
कितनी काली रात।
लोहे की गाड़ी दौड़ रही है,
साँस हुई लाचार।
हवा खरीदी, जल भी बेचा,
कैसा यह व्यापार!
कैसा यह व्यापार!
काँच की दुनिया कहती फिरती—
मैं हूँ बड़ी महान।
माटी हँसकर धीरे बोली—
क्षण भर का मेहमान।
चित्र बचेंगे, नाम बचेंगे—
ये भी झूठा ज्ञान।
धरती ही जब शेष न होगी,
किस काम की पहचान?
डाटा के ऊँचे महल बनाए,
मन का घर वीरान।
धरती रोई, हमने समझा—
बजता है तूफान।
झीनी-झीनी धरती चादर
झीनी-झीनी धरती चादर,
नीला इसका ताना।
हवा, नदी और वन के धागे,
बुनते जीवन गाना।
धुएँ ने इसमें छेद किए हैं,
लोभ लगा है दाग।
साँस-साँस यह चादर फटती,
कौन सुने अनुराग।
साफ मिली थी चादर हमको,
मैली कर दी आज।
आने वाली पीढ़ी पूछे—
किसने बेची लाज?
समाधान शायद नई वस्तुओं में नहीं
शायद समाधान नई वस्तुओं में नहीं,
पुरानी बुद्धि में है।
कम लेने में।
अधिक बाँटने में।
धरती से उतना ही माँगने में
जितना वह फिर से उगा सके।
हमारे पुरखे जानते थे—
जल केवल वस्तु नहीं, जीवन है।
वन केवल लकड़ी नहीं, श्वास है।
माटी केवल जमीन नहीं,
हमारी देह का भविष्य है।
सादगी त्याग नहीं है।
सादगी पृथ्वी के प्रति प्रेम है।
फिर से माटी हाथ लगाएँ
फिर से माटी हाथ लगाएँ,
फिर बीजों से बात।
नदी बहे तो राह न रोकें,
वन को दें सौगात।
जितना चाहें उतना लेना—
यह व्यवहार अब छोड़।
लोभ की इस लंबी रस्सी को,
आज यहीं पर तोड़।
पूर्वज की वह सीख बुलाती—
सादा रख व्यवहार।
धरती माँ की गोद बचाना,
सबसे बड़ा त्योहार।
हम भी गगरी, धरती भी गगरी
माटी की गगरी हम भी हैं,
धरती भी गगरी है।
एक दरार अगर बढ़ जाए,
साँस कहाँ फिर ठहरी है।
झीनी चादर मिली नभ की,
रखना इसे सँभाल।
कम उपभोग और सरल जीवन,
यही समय की ढाल।
नदियाँ बचें तो गीत बचेंगे,
वन बचें तो संसार।
माटी बचे तो हम भी बचेंगे—
इतना सत्य विचार।
धरती कोई वस्तु नहीं।
धरती अपना प्राण है।
प्रकृति कोई संपत्ति नहीं।
आने वाली संतति का अधिकार है।
कम में सुख।
सादगी में मुक्ति।
धरती में शिव,
हर जीवन में भक्ति।
माटी की गगरी धीरे रखना रे
माटी की गगरी धीरे रखना रे,
धरती की चादर साफ ही रखना रे।
हम तो चार दिनों के राही,
पीछे जीवन रखना रे।
माटी से आए, माटी में जाएँ,
पर जाने से पहले—
माटी को जीवित छोड़ जाएँ।
पुनः — माटी का घरौदा
माटी का घरौदा रे,
माटी का घरौदा।
माटी का घरौदा रे मनवा,
काहे करे घमंड।
पल भर की ये छाँव रे,
माया का पाखंड।
माटी का घरौदा रे,
माटी का घरौदा।
रेत पर सपनों की नगरी
रेत पे सपनों की नगरी,
कितनी बार बनाई।
पहली बारिश आई तो मनवा,
सब ही धूल समाई।
जिसको अपना मान रहा था,
वो झूठा पाखंड।
माटी का घरौदा रे मनवा,
काहे करे घमंड।
फीका रस, साँस उधारी,
तन भी है उधारी।
झूठा जग का नाता सारा,
किस बात की तैयारी।
माटी का घरौदा रे मनवा,
काहे करे घमंड।
पल भर की ये छाँव रे,
माया का पाखंड।
मुट्ठी बाँध के आया जग में,
खाली हाथ ही जाना।
जिसको अपना कहता फिरता,
उसने भी क्या माना।
एक दिन सब ही झूठ है जाना,
देह धरे को दंड।
माटी का घरौदा रे मनवा,
काहे करे घमंड।
माटी का घरौदा रे…
आखिर में एक छोटी-सी बात
हम जलवायु परिवर्तन की चर्चा अक्सर पृथ्वी को बचाने के संदर्भ में करते हैं। लेकिन शायद सच थोड़ा अलग है।
पृथ्वी अपने ढंग से हमारे बाद भी बनी रह सकती है।
वास्तव में हमें पृथ्वी से अधिक स्वयं को बचाना है।
माटी समाप्त होगी तो अन्न कहाँ उगेगा?
नदियाँ सूखेंगी तो सभ्यताएँ कहाँ बसेंगी?
जंगल समाप्त होंगे तो साँस कहाँ से आएगी?
इसलिए “माटी की गगरी” का संदेश डर पैदा करना नहीं है।
यह स्मृति जगाने का प्रयास है।
उस स्मृति का कि—
हमारी जड़ें माटी में हैं।
हमारी साँसें जंगलों में हैं।
हमारा रक्त नदियों के जल से बना है।
और हमारा भविष्य उसी धरती की सेहत से जुड़ा है जिस पर आज हम खड़े हैं।
कम उपभोग करें।
सरल जीवन अपनाएँ।
जल बचाएँ।
जंगल बचाएँ।
जमीन और माटी बचाएँ।
क्योंकि अंततः—
“माटी बचे तो हम भी बचेंगे।”
🎵 “माटी की गगरी” — Kabir-inspired Nirgun Environmental Musical Poetry
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— डॉ. मुकेश असीमित
Dr. Mukesh Aseemit Creations | Music with Mukesh
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