नंदी बेसहारा, व्यवस्था बेखबर
, डॉ. मुकेश ‘असीमित’
सुबह टहलने निकलता हूँ तो मेरे अस्पताल के मुख्य द्वार पर अक्सर एक विशालकाय सांड विराजमान मिलता है। उसे देखकर प्रथम दृष्टया यही लगता है कि भगवान शिव ने अस्पताल की सुरक्षा का दायित्व सीधे नंदी महाराज को सौंप दिया है। अंतर बस इतना है कि कैलाश वाले नंदी शांत भाव से बैठे रहते हैं, जबकि हमारे ये स्थानीय नंदी कब किसे सींग पर उठाकर कैलाश-दर्शन करा दें, इसका कोई भरोसा नहीं।
अस्पताल खोलना हो तो पहले नंदी महाराज से निवेदन करना पड़ता है,“महाराज, थोड़ा मार्ग दें। मरीज अंदर आना चाहते हैं।”
कभी कर्मचारी उन्हें हाँकते हैं, कभी मैं स्वयं सुरक्षित दूरी बनाकर समझाता हूँ। काफी मान-मनुहार के बाद वे उठते हैं। उनकी चाल और भाव देखकर लगता है कि अस्पताल हमारा हो सकता है, पर मुख्य द्वार का पट्टा उन्हीं के नाम है।
सामने की सड़क से रोज एक बुजुर्ग महाशय साइकिल पर आते हैं। न जाने सांड से उनका कौन-सा पुराना अनुबंध है,जेब से बिस्कुट निकालते हैं, श्रद्धापूर्वक खिलाते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। बिस्कुट खाने के बाद सांड मेरी ओर ऐसे देखता है, मानो कह रहा हो,“शरण तुम्हारे अस्पताल के सामने ले रखी है और नाश्ता कोई दूसरा करा रहा है। संसार में अच्छे लोग अभी शेष हैं!”
हमारे यहाँ पशु-प्रेम का सबसे सुविधाजनक तरीका यही है,चारा अपने घर के सामने नहीं, पड़ोसी के दरवाजे पर डालिए। सुबह-सुबह कुछ धर्मप्रेमी आते हैं, किसी सांड को दो बिस्कुट, एक टोस्ट या मुट्ठीभर आटा खिलाकर अपने दिनभर के पुण्य का ऑनलाइन न सही, आध्यात्मिक रिचार्ज करा लेते हैं। पशु ने बाद में किसकी बाइक गिराई, किस बुजुर्ग को दौड़ाया या किस दुकान के आगे डेरा डाला,यह नगर पालिका और पड़ोसी के कर्मों का फल है।
छोटे शहरों में आवारा पशु अब सामान्य दृश्य नहीं, गंभीर सार्वजनिक-सुरक्षा संकट बन चुके हैं। सड़कों पर झुंड में घूमती गायें, लड़ते हुए सांड और रात में बीच सड़क पर बैठे काले गोवंश किसी चलते-फिरते ‘ब्लैक स्पॉट’ से कम नहीं। वाहन चालकों को वे कई बार तब दिखाई देते हैं, जब ब्रेक लगाने का समय समाप्त और दुर्घटना का समय प्रारंभ हो चुका होता है।
विशेषकर वर्षा ऋतु में हालात और खराब हो जाते हैं। सड़क के दोनों ओर कीचड़ और पानी भर जाता है, इसलिए पशु सूखी और अपेक्षाकृत गर्म सड़क पर आकर बैठ जाते हैं। एक ओर बरसात में बने गड्ढे चालक की परीक्षा लेते हैं, दूसरी ओर सड़क पर बैठे पशु उसके भाग्य की। बीच में वाहन चालक सोचता रह जाता है,गड्ढा बचाऊँ, सांड बचाऊँ या स्वयं को बचाऊँ!
फिर कभी दो सांडों के बीच अचानक ‘बुल फाइट’ प्रारंभ हो जाती है। इसके लिए न टिकट लगता है, न दर्शक-दीर्घा बनाई जाती है। बाजार, सब्जी मंडी या मुख्य सड़क ही अखाड़ा बन जाती है और राहगीर, साइकिल सवार, ठेले वाले तथा सड़क किनारे खड़े वाहन अनचाहे प्रतिभागी बन जाते हैं। सांड आपस में लड़ते हैं, लेकिन चोट मनुष्यों को लगती है और हिसाब अस्पताल के खाते में आता है।
यह समस्या मेरे लिए केवल समाचारों या सोशल मीडिया के वीडियो तक सीमित नहीं है। वर्ष 2000 के आसपास जब मैं बीकानेर में था, तब भी वहाँ आवारा सांडों का विशेष आतंक था। हमारी ऑर्थोपेडिक ओपीडी में लगभग प्रतिदिन कोई न कोई बुजुर्ग सांड के हमले में घायल होकर आता था। किसी की कलाई टूटी होती, किसी का कूल्हा, किसी की पसलियाँ और किसी के सिर में गंभीर चोट होती। हमने कैजुअल्टी में ऐसे हमलों के कारण अनेक मौतें भी देखीं।
उस बात को अब लगभग छब्बीस वर्ष हो चुके हैं। शहर बदले, सरकारें बदलीं, नगर निकाय बदले और सड़कों पर वाहनों की संख्या कई गुना बढ़ गई; लेकिन सांड वहीं खड़ा है,पहले से अधिक आत्मविश्वास के साथ। बल्कि अब बीकानेर में उस समय दिखाई देने वाली समस्या से भी अधिक आतंक मुझे अपने शहर में देखने को मिल रहा है।
इस आतंक के सबसे आसान शिकार हमारे बुजुर्ग हैं। भारतीय परिवार में सेवानिवृत्त बुजुर्ग की एक प्रमुख घरेलू जिम्मेदारी प्रायः सब्जी लाना होती है। उन्हें भी लगता है कि परिवार में उनकी उपयोगिता बनी हुई है। वे सुबह थैला लेकर सब्जी मंडी जाते हैं,एक हाथ में सब्जी और दूसरे में घर का सम्मान लेकर लौटते हैं। लेकिन रास्ते में सांड मिल जाए तो वह न आयु देखता है, न पेंशन और न पारिवारिक उपयोगिता। जिस बुजुर्ग ने जीवनभर परिवार का भार उठाया, उसे एक दिन सांड अपने सींगों पर उठा लेता है।
दुर्भाग्य यह है कि इन दुर्घटनाओं का कोई व्यवस्थित और अद्यतन सरकारी हिसाब हमारे सामने नहीं है।
भारत सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत 20वीं पशुधन गणना के अनुसार वर्ष 2019 में राजस्थान में 12,72,277 आवारा गोवंश दर्ज थे। पूरे देश में इनकी संख्या 50,21,587 थी। अर्थात देश के लगभग प्रत्येक चार आवारा गोवंश में से एक राजस्थान में था।
तत्कालीन जिलावार गणना में नागौर में 1,03,611, जोधपुर में 92,642, बीकानेर में 90,680, भीलवाड़ा में 73,062, जयपुर में 69,424, सवाई माधोपुर में 26,378 तथा करौली में 20,719 आवारा गोवंश दर्ज थे। गंगापुर सिटी अलग जिला नहीं है , इसलिए वर्तमान गंगापुर सिटी क्षेत्र के आँकड़े तत्कालीन सवाई माधोपुर और करौली जिलों में सम्मिलित थे।
लेकिन ये आँकड़े वर्ष 2019 की पशुधन गणना के हैं। उसके बाद राजस्थान में आवारा पशुओं की वर्तमान संख्या तथा उनसे होने वाले हमलों, सड़क दुर्घटनाओं, मौतों और घायलों का कोई अद्यतन, समेकित सरकारी आँकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं दिखाई देता।
राजस्थान हाईकोर्ट के संज्ञान में आए विवरण के अनुसार वर्ष 2018 में राज्य में आवारा पशुओं से संबंधित घटनाओं में 185 से अधिक मौतों का उल्लेख था। इसके बाद के वर्षों के समेकित सरकारी आँकड़े प्रस्तुत नहीं किए गए। एक हालिया मीडिया रिपोर्ट में पिछले पाँच वर्षों में आवारा पशुओं से छह हजार से अधिक सड़क दुर्घटनाएँ, बारह सौ से अधिक मौतें और चार हजार से अधिक घायल होने की बात कही गई है। परंतु इन संख्याओं को आधिकारिक सरकारी आँकड़ा नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इनकी पुष्टि करने वाला कोई एकीकृत सरकारी डेटाबेस सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है।
वास्तविक संख्या संभवतः इससे कहीं अधिक होगी। कई दुर्घटनाओं में पुलिस रिकॉर्ड में केवल “वाहन अनियंत्रित होकर गिरा” लिखा जाता है। यह दर्ज नहीं होता कि वाहन सड़क पर बैठे पशु को बचाने के प्रयास में अनियंत्रित हुआ था। अस्पताल में भी मामला सामान्य सड़क दुर्घटना के रूप में दर्ज हो जाता है। मामूली चोट, बाइक की टूट-फूट या सांड द्वारा दौड़ाए जाने की घटनाएँ तो थाने और अस्पताल तक पहुँचती ही नहीं।
इन आँकड़ों को सूचना के अधिकार,आरटीआई,के माध्यम से जुटाया जा सकता है। पुलिस विभाग से पशुओं के कारण हुई सड़क दुर्घटनाओं, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग से संबंधित चोटों और मौतों, नगर निकायों से प्राप्त शिकायतों एवं पकड़े गए पशुओं तथा परिवहन विभाग से पशुजनित दुर्घटनाओं की जानकारी माँगी जानी चाहिए। सभी विभागों के उत्तरों को मिलाकर ही समस्या का वास्तविक आकार सामने आ सकता है। संभव है कि आरटीआई का उत्तर यह मिले कि “सूचना इस स्वरूप में संधारित नहीं की जाती।” यदि ऐसा होता है तो वह भी अपने आप में एक बड़ा तथ्य होगा,जिस समस्या में लोग मर रहे हैं, सरकार उसका अलग रिकॉर्ड तक नहीं रख रही।
मूल प्रश्न यह भी है कि इतने पशु सड़कों पर आए क्यों?
कृषि के मशीनीकरण के बाद बैलों की उपयोगिता लगभग समाप्त हो गई। खेतों में हल की जगह ट्रैक्टर ने ले ली। गाय जब तक दूध देती है, तब तक परिवार की सदस्य रहती है; दूध बंद होते ही कई बार वह अर्थव्यवस्था से बाहर और सड़क की नागरिक बन जाती है। नर बछड़े और सांड तो आरंभ से ही अनुपयोगी समझे जाने लगे हैं।
गायों के लिए गौशालाएँ अवश्य हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर उनकी क्षमता सीमित है। व्यावहारिक स्तर पर दूध देने वाली अथवा अपेक्षाकृत उपयोगी गाय को आश्रय मिलने की संभावना अधिक रहती है, जबकि बूढ़े, बीमार और नर गोवंश को स्वीकार करना कठिन माना जाता है। परिणाम यह है कि जिन बैलों और सांडों के लिए अब खेत में काम नहीं है, उनके लिए शहर की सड़क ही स्थायी पता बन गई है।
हमारे धर्म में गाय पूजनीय है और सांड को भगवान शिव के वाहन नंदी का स्वरूप माना जाता है। जब गायों के लिए गौशालाएँ हो सकती हैं तो अनुपयोगी नर गोवंश के लिए पर्याप्त संख्या में नंदीशालाएँ क्यों नहीं खोली जानी चाहिए? धार्मिक आस्था का अर्थ केवल बिस्कुट खिलाकर आगे बढ़ जाना नहीं हो सकता। सच्चा पशु-प्रेम वह होगा जिसमें पशु को सुरक्षित आश्रय, चारा, पानी और चिकित्सा मिले तथा मनुष्य भी उसके कारण घायल न हो।
प्रशासन कभी-कभी अभियान चलाकर कुछ पशुओं को पकड़ता है। फोटो खिंचते हैं, प्रेस नोट जारी होता है और अभियान पूरा मान लिया जाता है। कुछ दिनों बाद पशु फिर सड़क पर और फाइल फिर अलमारी में मिलती है। राजनेताओं का ध्यान भी तब जाता है, जब कोई बड़ी दुर्घटना समाचारों में आ जाए। दो दिन चिंता व्यक्त होती है, फिर अगली समस्या आने तक सांड और नागरिक अपना-अपना संघर्ष जारी रखते हैं।
समाधान असंभव नहीं है। प्रत्येक नगर निकाय को पशुओं की वास्तविक गणना, टैगिंग, मालिक की पहचान, परित्याग पर जुर्माना, पर्याप्त नंदीशालाएँ, रात्रिकालीन पशु-पकड़ दल, हेल्पलाइन, दुर्घटना-प्रवण स्थानों की निगरानी और पशुओं पर रिफ्लेक्टिव कॉलर जैसी व्यवस्थाएँ करनी होंगी। पुलिस, अस्पताल, परिवहन विभाग और नगर निकाय के बीच पशुजनित दुर्घटनाओं का साझा डेटाबेस भी बनाया जाना चाहिए।
आवारा पशु का प्रश्न केवल पशु-कल्याण का नहीं, मनुष्य और पशु दोनों के जीवन का प्रश्न है। सड़क पर बैठा सांड अपराधी नहीं है। अपराधी वह व्यवस्था है जिसने पहले उसकी उपयोगिता समाप्त की, फिर उसका आश्रय छीना और अंत में उसे यातायात के बीच छोड़कर स्वयं आँखें बंद कर लीं।
फिलहाल नंदी महाराज मेरे अस्पताल के सामने बैठे हैं। श्रद्धालु उन्हें बिस्कुट खिलाकर पुण्य कमा रहे हैं, कर्मचारी उन्हें हटाकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं और प्रशासन शायद किसी नई जनगणना की प्रतीक्षा कर रहा है।
बस, अगली गणना तक यह पता नहीं कि कितने नंदी गिने जाएँगे और कितने नागरिक उनकी भेंट चढ़ चुके होंगे।
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